
ज़ोधपुर. मेहरानगढ़ दुर्ग का स्थापत्य मध्यकालीन एवं मुगल स्थापत्य कला से पूर्णतया प्रभावित है जो मूलतया ईरानी शैली से प्रभावित रहा है। फिर भी स्थापत्य के निर्माता कारीगरों ने दुर्ग को भव्यता प्रदान करते समय अपनी भारतीय शैली का पुट देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। प्रत्येक महल का निर्माण करते समय उसमें सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा गया है। महलों के अन्दर थोड़ा भूल-भूलैया सा है। ताकि यदि शत्रु किसी तरह महलों में प्रवेश कर जाए तो वह आसानी से बाहर न निकल सके। राजमहल में प्रवेश एक द्वार में होकर करते हैं जिसे सूरज पोल कहते हैं। इसका निर्माण महाराजा सूरसिंह ने 16 वीं शताब्दी में करवाया। सूरज पोल में प्रवेश कर खुले चौक में आते हैं जहां संगमरमर की शृंगार चौकी निर्मित है। यह वह स्थान है जहां मारवाड़ के शासकों का राजतिलक होता है। प्रारम्भ में यह चौकी लाल घाटू के पत्थर की बनी हुई थी। सन 1752 में महाराजा बखतसिंह ने इसे सफेद संगमरमर से बनवाया। कुर्सीनुमा यह राज्याभिषेक स्थल दूर से अत्यन्त सुन्दर दिखाई देता है। यहां से दुर्ग के राजमहलों में प्रवेश करते हैं। वैसे मेहरानगढ़ दुर्ग में कई महल बने हुए हैं लेकिन उनमें से कुछ अपनी विशेषताओं के कारण अधिक प्रसिद्ध हैं।