
सुरेश व्यास/जोधपुर। उम्र के 83 सावन देख चुके जोधपुर के प्रोफेसर जहूर खां मेहर का दिल आज भी बचपन का हो जाता है, खासकर जब उनसे पहले स्वतंत्रता दिवस की बात करते हैं। वे जब बचपन में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जनजागरण के लिए निकलने वाली प्रभात फेरियों के दिन याद करते हैं तो उसी राग में वे गीत गाने लगते हैं, जो लोगों को जगाने के लिए गाए जाते थे।
देश आजाद हुआ उस वक्त प्रो. मेहर सात-आठ साल के थे। वे कहते हैं कि बचपन में देखी स्वतंत्रता के उल्लास की दो बातें उन्हें आज भी रोमांचित करती है। पहली यह कि देश भले ही 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ, लेकिन जोधपुर के घरों की छतों पर तिरंगा ध्वज दो-ढाई महीने पहले ही लहराने लगा था। लोगों में घर-घर तिरंगा लगाने की जैसे होड़ मची थी। भले ही आज की तरह प्रचार के इतने साधन नहीं थे। उनके पिताजी ने भी घर के डागळे (छत) पर तिरंगा लगाया था। साधन-संसाधन इतने थे नहीं, फिर भी उनके पिताजी ने कसरत करने के लिए काम में लिए जाने वाले भारी मुृगदर के गोल छेद में बांस फंसा कर छत पर तिरंगा लगाया था। उनके घर के आस पास ही नहीं, शहर में चारों ओर छतों पर सैकड़ों तिरंगे झंडे ही झंडे नजर आते थे।
हर घर तिरंगा
प्रो. मेहर के अनुसार दरअसल, उस वक्त भारत-पाकिस्तान के बीच विभाजन की रेड क्लिफ रेखा खिंचने वाली थी। लोगों में अफवाह फैल गई कि अंग्रेज अफसर आने वाले हैं। जिस घर और इलाके में ज्यादा तिरंगा होगा, वही भारत मा जाएगा। इसलिए लोगों ने जून-जुलाई 1947 के महीने में ही घरों की छतों पर तिरंगे लगाने शुरू कर दिए थे।
बच्चे प्रभात फेरियों में गाते थे गीत
वे कहते हैं कि उस वक्त पोशाळ (स्थानीय गुरुकुल) के बच्चों को प्रभात फेरियों में ले जाया जाता था। उसमें तिरंगा उठाए बच्चे राष्ट्रभक्ति की अलख जगाने वाले गीत गाते थे। ये गीत खुद उन्होंने सैकड़ों बार गायें है और आज भी कंठस्थ हैं। यह कहते हुए प्रो. मेहर 'अब जाग मुसाफिर भोर भई...' और 'कोई नहीं है गैर बाबा कोई नहीं है गैर...हिंदू मुस्लिम सिख इसाई देख सभी है भाई भाई..., भारत माता सबकी माई, मत रख मन में बैर बाबा कोई नहीं है गैर...' जैसे लम्बे गीत एक ही सांस में गा गए।
सभी जगह सक्रिय रहे मारवाड़ी सैनानी
प्रो. मेहर मारवाड़ के उन चुनिंदा लोगों में शामिल हैं, जो इतिहासकार के रूप में स्वतंत्रता आंदोलन के कई अनछुए पहलू भी सामने लाए। इसमें मेवाड़ रियासत के बिजोलिया किसान आंदोलन के दौरान प्रख्यात सैनानी विजयसिंह पथिक व माणिक्यलाल वर्मा सरीखे प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन की कमान सम्भालने जोधपुर से पहुंचे स्वतंत्रता सैनानी अचलेश्वर प्रसाद मामा और अन्य की गिरधरपुरा गांव में गिरफ्तारी और यातनाओं का ब्यौरा प्रमुख है। प्रो. मेहर ने अपनी पुस्तक 'इतिहास का सर्वेक्षण' में लिखा है कि मारवाड़ के सैनानी जहां जरूरत होती, वहां पहुंच जाते थे।