
जोधपुर . वन विभाग वन्यजीव मंडल की टीम ने नये साल के पहले दिन सोमवार को जिले के भोपालगढ़ क्षेत्र के रामड़ावास से आधा दर्जन नवजात भेडि़यों के कुनबे को रैस्क्यू करने में सफलता हासिल की है। राजस्थान पत्रिका की ओर से ग्रामीणों से सूचना मिलने पर वन अधिकारियों को इस बारे में सूचित किया गया। सूचना मिलते ही वन्यजीव रैस्क्यू टीम डॉ. श्रवणसिंह के नेतृत्व में मौके पर पहुंची और आधा दर्जन भेडि़यों के बच्चों को कब्जे में लिया। ग्रामीणों ने बताया कि भेडि़ये के बच्चे खेलते हुए गांव में आ पहुंचे हैं। ग्रामीणों ने आवारा श्वानों से बचा कर बच्चों को सुरक्षित परिसर में रखा।
मां की खोज शुरू
सहायक वन संरक्षक महिपालसिंह जुगतावत ने बताया कि रैस्क्यू किए गए भेडि़यों की मां को खोजने के लिए क्षेत्रीय वनकर्मियों को पाबंद किया गया है। मां की लोकेशन मिलते ही रैस्क्यू भेडि़ये को पुन: उसी सुरक्षित स्थल पर छोड़ दिया जाएगा।
लड़ रहे वजूद की लड़ाई
एक दशक पूर्व तक मारवाड़ के नागौर, जोधपुर, पाली, जालोर और बाड़मेर जिले में एक दुक्का जगहों पर पाए जाने वाले भेडि़यों को पशुपालकों के आक्रोश के चलते अपने वजूद की लड़ाई लडऩी पड़ रही है। भेडि़यों की संख्या में लगातार कमी के कारण भारतीय वन्यजीव अधिनियम १९७२ के अनुसूची-प्रथम का वन्यजीव घोषित किया गया है।
एक साथ ५ से ६ बच्चों का जन्म
थार रेगिस्तान के जैविक तंत्र में भेडि़या भोजन शृंखला में सर्वोच्च स्थान पर है। विशेषज्ञों के अनुसार इनका परम्परागत प्राकृतवास रिहाइशी इलाकों से दूर पहाडि़यों, तलहटी, नदी, नालों के बीहड़ और सूखी नदियों के पास के जंगल होते हैं। एक बड़े परिवार के रूप में २ से १५ तक झुण्ड में पाए जाने वाले भेडि़यों का प्रजननकाल सामान्यत : सर्दियों में ही होता है। प्रजनन के दौरान ये ५ से ६ तक बच्चों को जन्म देते हैं।
सर्च अभियान शुरू हो
वन्यजीव विशेषज्ञों ने पत्रिका को बताया कि सोमवार को रैस्क्यू किए गए भेडि़ये पूरे कुनबे के माता पिता या झुण्ड की खोज के लिए वन विभाग को क्षेत्र के ग्रामीणों के सहयोग से सर्च अभियान चलाने की जरूरत है। वयस्क भेडि़यों पर विभिन्न शोध संस्थान, विश्वविद्यालय अथवा वन विभाग की ओर जीपीएस युक्त रेडियो कॉलर लगा कर मॉनिटरिंग करने की जरूरत है, ताकि दुर्लभ प्रजाति के भेडि़यों के व्यवहार पर पूरी तरह शोध हो सके। इससे भेडि़यों और मानव वन्यजीव संघर्ष भी कम करने का मौका मिलेगा।