World Forest Day Special Story: राजस्थान पत्रिका के ‘हरयाळो राजस्थान’ अभियान से प्रेरित होकर जोधपुर के 'ग्रीनवीरों' ने सूखी, बंजर पहाड़ियों को हरियाली में बदलते हुए करीब 40 हजार पेड़ों का विशाल जंगल खड़ा कर दिया।
जोधपुर। एक ओर जहां दुनिया ग्लोबल वार्मिंग की गंभीर चुनौती से जूझ रही है, वहीं जोधपुर सहित मारवाड़ क्षेत्र में लगातार घटते वन क्षेत्र चिंता बढ़ा रहे हैं। राज्य की राज्य वन नीति 2010 के तहत 20 प्रतिशत हरियाली का लक्ष्य अब भी दूर नजर आ रहा है, क्योंकि 22 हजार वर्ग किमी के विशाल भूभाग में हरियाली महज 1.5 प्रतिशत से भी कम सिमट चुकी है। इस निराशा के बीच उम्मीद की हरियाली भी अंकुरित हो रही है।
राजस्थान पत्रिका के ‘हरयाळो राजस्थान’ अभियान से प्रेरित होकर जोधपुर के 'ग्रीनवीरों' ने सूखी, बंजर पहाड़ियों को हरियाली में बदलते हुए करीब 40 हजार पेड़ों का विशाल जंगल खड़ा कर दिया। विश्व वानिकी दिवस पर उनकी यह प्रेरक पहल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में नई मिसाल बनकर उभर रही है।
पथरीली और सूखी रही माता का थान क्षेत्र की पहाड़ी आज हरियाली का जीवंत उदाहरण बन चुकी है। पर्यावरण प्रेमी सुभाष गहलोत ने वर्ष 2007 पौधारोपण की शुरुआत की थी। पानी की कमी और संसाधनों के अभाव जैसी चुनौतियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।
करीब 65 बीघा क्षेत्र में विकसित 'सावित्री बाई फुले हर्बल पार्क' आज 25 हजार से अधिक वृक्षों से महक रहा है। पक्षियों और वन्यजीवों के लिए सुरक्षित आशियाना भी तैयार किया है। गहलोत का लक्ष्य डेढ़ लाख पौधों का 'ऑक्सीजन बैंक' तैयार करना है, जो शहर के पर्यावरण को नई सांस देगा।
संकल्प, सहयोग और प्रकृति के प्रति समर्पण हो तो पथरीली और उजाड़ जमीन भी हरियाली की चादर ओढ़ सकती है। करीब पांच वर्ष पहले बंजर भूमि पर हरियाली का सपना बोया था, जो आज एक सघन लघु जंगल के रूप में विकसित हो चुका है। सिवांची गेट स्थित अजनेश्वर आश्रम के पास कुमटियों की गाळ क्षेत्र में जापानी मियावाकी पद्धति से 30 प्रजातियों के करीब 15 हजार पौधे लगाए गए। आज यह क्षेत्र 'ग्रीन वॉल' के रूप में विकसित हो गया है।
टीम के प्रमुख सदस्य विवेक अग्रवाल के अनुसार, इस तकनीक में पौधों को पास-पास लगाया जाता है, जिससे उनकी वृद्धि सामान्य से तीन गुना तेज होती है। इस पहल से प्रेरित होकर शहर में तीन लघु जंगल तैयार किए जा चुके हैं और अब 5 लाख पौधों के बड़े वन क्षेत्र का लक्ष्य तय किया गया है।
भूतेश्वर वनखंड में आस्था और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत संगम शहर के प्राचीन जागनाथ महादेव में देखने को मिल रहा है। जलसंग्रहण के साथ महादेव के अभिषेक में चढ़ाया जाने वाला ज पूजा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसी जल से सिंचाई की जाती है। यहां जैविक खाद तैयार की जाती है।
मंदिर परिसर में पिछले करीब 25 वर्षों से तीन समर्पित सेवादार जनार्दन मत्तड, गोविंद पुरोहित व महेंद्र व्यास नियमित रूप से देखभाल कर रहे हैं। अपनी पेंशन का पैसा तक लगा रहे हैं। इनकी पहल से यहां एक ऐसा सिस्टमैटिक मॉडल विकसित हुआ है। ड्रिप इरिगेशन जो आस्था को पर्यावरणीय जिम्मेदारी से जोड़ता है। संग्रहित जल को मोटर और पाइपों की सहायता से पेड़ों तक पहुंचाया जाता है।