
जोधपुर स्थापना दिवस
राजस्थान की धोरों वाली धरती पर बसा एक ऐसा शहर, जिसकी सुबह की पहली किरण मेहरानगढ़ की प्राचीर को चूमती है और जिसकी शाम ढलते ही नीली गलियां किसी परीलोक जैसी लगने लगती हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं 'मारवाड़ के ताज' यानी जोधपुर की। आज जोधपुर अपना स्थापना दिवस मना रहा है। 12 मई 1459 को राव जोधा ने जिस नींव को रखा था, आज वह एक विश्वप्रसिद्ध 'हेरिटेज हब' बन चुका है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस नीले शहर की सुंदरता के पीछे कितने रहस्य और दिलचस्प किस्से छिपे हैं?
जोधपुर को दुनिया 'ब्लू सिटी' के नाम से जानती है, लेकिन इसके पीछे की वजह बड़ी रोचक है। पुराने समय में यहां के ब्राह्मण अपने घरों को कीड़ों (Termites) से बचाने और भीषण गर्मी में ठंडक रखने के लिए चूने के साथ 'कॉपर सल्फेट' मिलाते थे, जिससे नीला रंग उभरता था। आज यही नीला रंग इस शहर की ग्लोबल पहचान बन गया है।
प्रसिद्ध लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने मेहरानगढ़ किले को देखकर कहा था- "यह इंसानों ने नहीं, बल्कि परियों और फरिश्तों ने बनाया है।" जमीन से 410 फीट ऊँची पहाड़ी पर खड़ा यह किला आज भी अजेय है। इसकी दीवारों पर आज भी युद्ध के गोलों के निशान देखे जा सकते हैं।
इतिहास कहता है कि मेहरानगढ़ की नींव को मजबूत करने और राज्य की खुशहाली के लिए राजा राम मेघवाल ने स्वेच्छा से किले की नींव में जीवित दफन होना स्वीकार किया था। आज भी किले में उनकी याद में एक स्मारक बना हुआ है, जो मारवाड़ के लोगों के बलिदान की गाथा सुनाता है।
जोधपुर में स्थित उम्मेद भवन पैलेस दुनिया के सबसे बड़े प्राइवेट घरों में से एक है। इसके एक हिस्से में आज भी जोधपुर का पूर्व राजपरिवार रहता है, एक हिस्सा होटल है और एक म्यूजियम। क्या आप जानते हैं? इसे बनाने में किसी सीमेंट का नहीं, बल्कि 'इंटरलॉकिंग' पत्थरों का इस्तेमाल हुआ है।
जोधपुर को 'सूर्य नगरी' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां साल के लगभग हर दिन धूप खिली रहती है। सर्दियों में भी यहां की गुनगुनी धूप सैलानियों को अपनी ओर खींचती है।
जोधपुर के पास स्थित खेजड़ली गांव उस बलिदान का गवाह है, जहां 363 लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान दे दी थी। जोधपुर की पहचान यहां के काले हिरण और चिंकारा से भी है, जिन्हें बिश्नोई समाज अपनी संतान की तरह पालता है।
अगर आप जोधपुर आए और यहां का 'मिर्ची वड़ा' नहीं खाया, तो आपकी यात्रा अधूरी है। यहां की 'जोधपुरी मावा कचोरी' इतनी मशहूर है कि लोग इसे मीठे के शौकीनों के लिए सबसे बड़ा तोहफा मानते हैं। यहां का स्वाद सात समंदर पार तक मशहूर है।
जोधपुर जिले में स्थित ओसियां के मंदिर अपनी बारीक नक्काशी के लिए जाने जाते हैं। इन्हें 'राजस्थान का खजुराहो' कहा जाता है। यह प्राचीन सिल्क रूट का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था।
जोधपुर ने दुनिया को 'जोधपुरी कोट' और 'ब्रीचेस' (Breeches) दिया है। यहां का रंग-बिरंगा 'साफा' (पगड़ी) सम्मान का प्रतीक है। आज भी हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक जोधपुरी पहनावे का क्रेज सिर चढ़कर बोलता है।
दुनियाभर में मशहूर 'मारवाड़ी नस्ल' के घोड़े जोधपुर की शान हैं। अपने मुड़े हुए कानों और अद्भुत वफादारी के लिए मशहूर ये घोड़े आज भी राजसी ठाठ-बाट का हिस्सा हैं।
Updated on:
12 May 2026 11:43 am
Published on:
12 May 2026 11:37 am
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