
जोधपुर शहर। फाइल फोटो- पत्रिका
जोधपुर। आज से करीब 565 साल पहले 12 मई के दिन मारवाड़ के शासक राव जोधा ने एक नए शहर की नींव रखी थी। मंडोर के दक्षिण में एक सुरक्षित पहाड़ी पर किले का निर्माण शुरू किया गया और बाद में उसी किले के आसपास बसा नगर जोधपुर कहलाया। आज भी हर साल 12 मई को जोधपुर स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है। जोधपुर की स्थापना की कहानी काफी रोचक मानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार राव जोधा ने कठिन संघर्ष के बाद मारवाड़ में अपनी सत्ता मजबूत की थी।
राव जोधा के पिता राव रणमल भी अपने समय के प्रभावशाली शासकों में गिने जाते थे। पिता राव चूण्डा की मृत्यु के बाद रणमल मेवाड़ में रह रहे थे। बाद में उन्होंने 1427 में मंडोर के तत्कालीन शासक सत्ता और उसके पुत्रों को हराकर मंडोर पर कब्जा कर लिया। इसी दौरान मेवाड़ में राणा मोकल की हत्या हो गई। इसके बाद रणमल ने हत्यारों को सजा दिलाई और राणा कुंभा को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया।
उस समय राणा कुंभा छोटे थे, इसलिए रणमल वहीं रहकर शासन व्यवस्था संभालने लगे। कहा जाता है कि एक रात रणमल पर हमला कर दिया गया। उस समय वे चारपाई पर सो रहे थे। मेवाड़ के सैनिकों ने उन्हें चारपाई से बांधकर हमला किया। रणमल ने बहादुरी से मुकाबला किया, लेकिन आखिर में उनकी मृत्यु हो गई।
इतिहास में यह भी बताया जाता है कि जब रणमल पर हमला हुआ, उस समय उनके पुत्र जोधा दूर सो रहे थे। एक नगारची ने शहनाई के जरिए उन्हें खतरे का संकेत दिया। संकेत समझते ही राव जोधा वहां से निकल गए और अपने साथियों के साथ संघर्ष करते हुए मारवाड़ पहुंचने में सफल रहे।
सन 1454 में राव जोधा ने मंडोर पर फिर से अधिकार कर लिया। इसके बाद मेवाड़ और मारवाड़ के बीच लंबे समय तक संघर्ष चला, लेकिन कोई निर्णायक जीत नहीं मिली। बाद में दोनों पक्षों के बीच एक समझौता हुआ, जिसे आंवल-बांवल सीमा समझौता कहा गया। इसके तहत जहां तक बबूल के पेड़ थे, वहां तक मारवाड़ की सीमा मानी गई और जहां आंवले के पेड़ थे, वहां तक मेवाड़ की सीमा तय की गई।
इसके बाद राव जोधा ने मंडोर से करीब 12 किलोमीटर दूर चिड़ियानाथ की टूंक पहाड़ी पर 12 मई 1459 को नए किले का निर्माण शुरू करवाया। अगले वर्ष यहां चामुंडा माता की मूर्ति स्थापित की गई। इसी के साथ जोधपुर शहर की पहचान और इतिहास की शुरुआत हुई।
Published on:
12 May 2026 01:54 pm
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