
कांकेर. अरबों का बजट फूंकने के बाद भी उज्ज्वला योजना परवान नहीं चढ़ रही है। हजारों परिवार गैस सिलेंडरों की रिफलिंग नहीं करा रहे हैं। गरीबों के घरों में आज भी लकड़ी के चूल्हों पर खाना पक रहा है। 70 फीसदी से अधिक लोग सिलेंडर लेने के बाद भी या तो उसे बंद कर रखे हैं या तो रसूखदारों के हाथों बेच दिए हैं।
बता दें कि इस मामले में पहले भी पत्रिका ने विभाग से मिली जानकारी के अनुसार खबर प्रकाशित किया था, इसके बाद पत्रिका ने पड़ताल किया तो पाया कि लोग अत्यधिक पैसे होने के कारण गैस की जगह चूल्हे से खाना पकाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। उनका कहना है कि गैस के दाम में जिस तरह लगातार बढ़ोतरी हो रही है उससे प्रतिमाह गैस खरीदना संभव नहीं है। कुछ ग्रामीणों ने बताया कि वे जैसे-तैसे मजदूरी कर अपना जीवन यापन चलाते हैं, मजदूरी में उन्हें उतना अधिक पैसा नहीं मिल पाता है कि गैस का खर्च निर्वहन कर सके।
उपर से गैस के दाम अब हजार रुपए तक हो गए हैं, उन्होंने बताया कि उससे अच्छा है कि वे चूल्हे से ही काम चला लेते हैं। इससे उनके पैसे भी बच जाते हैं। वहीं एक अन्य मनकेसरी के सुखा राम से बात किया तो उसने कहा कि शासन ने उन्हे गैस सिलेण्डर तो उपलब्ध करा दिया है, लेकिन गैस के दाम में इतनी अधिक बढ़ोतरी की है कि उनका गैस भराना संभव ही नहीं है। जिसके कारण वे गैस का उपयोग ही नहीं करते हैं।
बता दें कि पिछले कुछ माह से गैस के दाम में लगातार बढ़ोतरी हुई है। जिसके चलते अंचल के गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले ग्रामीण गैस का उपयोग ही करना बंद कर दिए हैं। ग्रामीणों ने बताया कि वे मजदूरी कर अपना जीवन यापन करते हैं तो इतना महंगा गैस कहां से भरा सकते हैं। उन्होने बताया कि जब गैस मिली थी तब उन्हे इस बात की खुशी थी कि अब उन्हे चूल्हे का उपयोग नहीं करना पड़ेगा, लेकिन बढ़ते दाम ने उन्हे फिर से चूल्हा फूंकने मजबूर कर दिया है।