कानपुर

सियासत की बुलंदियों तक अकेले पहुंचा ये पिता, बेटे के लिए छोड़ दी अपनी राजनीतिक विरासत

15 मार्च 2012 को अखिलेश ने सिर्फ 38 साल की उम्र में राज्य के 20वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली...

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Jun 17, 2018
सियासत की बुलंदियों तक अकेले पहुंचा ये पिता, बेटे के लिए छोड़ दी अपनी राजनीतिक विरासत

कानपुर. पिछले तीन दशक से उत्तर प्रदेश की सियायत में राज करने वाले मुलायम सिंह वो नेता हैं, जिन्होंने पहलवानी के दगंल से राजनीति की शुरूआत की। जिस सैफई को कोई नहीं जानता था, वह आज देश ही नहीं पूरे वर्ल्ड में पहचानी जाती है। अपनी राजनीतिक सफर में कई बार धोखा खाया, पर हिम्मत नहीं हारी और 1989 में देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस का बुरिया बिस्तर बांध यूपी से रवाना कर दिया। राममंदिर आंदोलन के बाद मुलायम डगमगाए लेकिन फिर से नए रूप में यूपी के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों में छाए। 2012 के विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद पिता ने अपने बेटे अखिलेश को यूपी की बागडोर सौंप खुद दिल्ली रवाना हो गए। इसके पहले उन्होंने अपने परिवार के 21 लोगों को राजनीति में प्रवेश करा चुके थे। सैफई के इस पिता की देन है कि देश में सबसे ज्यादा लोग एक ही परिवार के है, जो अनेक पदों पर बैठे।

इस तरह से राजनीति में हुई इंट्री

मुलायम सिंह यादव के राजनीति के करियर की अधारशिला की शुरुआत 1975 में इटवा जिले के भलेपुरा गांव में रखी गई थी। रघुनाथ नाम के एक किसानों की जमीन को सरकारी अफसरों की मिलीभगत से गांव के दबंग ने हड़प ली थी।किसान मुलायम सिंह यादव से मिल कर आपबीती बताई। मुलायम भरी दोपहर में सैफई से तीन दर्जन से ज्यादा लोगों को लेकर पैदल ही भलेपुरा पहुंच गए। मुलायम सिंह ने पंचायत बुलाई, लेकिन दबंग ने उनकी मांग ठुकरा दी। जिस पर मुलायम सिंह ने खुद खेत में पहुंचकर दबंग के कब्जे वाले खेत पर हल चलाकर पूरी फसल बर्बाद कर दी। सूचना पर पुलिस गांव पहुंची और उन्हें अरेस्ट कर ले गई ।पुलिस ने मुलायम सिंह पर मीसा के तहत मामला दर्ज कर जेल भेज दिया।18 माह के बाद जेल से छूटने के बाद देश को एक किसान नेता मिला।

नहर रेट आंदोलन में गए थे जेल

मुलायम के बाल सखा बंशलाल ने बताया कि कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ लोहिया जी आंदोलन कर रहे थे। बताया, महज 15 साल की उम्र में ही मुलायम सिंह ने राम मनोहर लोहिया के आह्वान पर ’नहर रेट आंदोलन’ में भाग लिया और पहली बार जेल गए। लोहिया ने फर्रुखाबाद में बढ़े हुए नहर रेट के विरुद्ध आंदोलन किया था और जनता से बढ़े हुए टैक्स न चुकाने की अपील की थी। इस आंदोलन में हजारों सत्याग्रही गिरफ्तार हुए। इनमें मुलायम सिंह यादव भी शामिल थे। नहर गेट व मीसा के तहत जेल में नेता जी को कई-कई दिनों तक भोजन नहीं दिया गया। बावजूद वह हारे नहीं और दोगुनी ताकत के साथ बाहर निकले।

पिता ने सब कुछ बेटे को दिया

अखिलेश यादव को कन्नौज से साल 2000 में मुलायम सिंह ने चुनाव लड़वाकर सांसद बनवाया। अखिलेश महज 26 वर्ष की उम्र में उपचुनाव जीता और लोकसभा में समाजवादी पार्टी का प्रतिनिधित्व किया। अखिलेश यादव ने लोकसभा चुनाव में हैट्रिक लगाते हुए साल 2009 में हुए आम चुनावों में एक बार फिर जीत दर्ज की। 2009 से 2012 तक अखिलेश पर्यावरण एवं वन संबंधी समिति, विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर एक समिति और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर बनी जेपीसी के भी सदस्य रहे। साल 2012 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को जबरदस्त सफलता मिली तो पिता मुलायम ने बेटे को यूपी की सत्ता सौंप दी। इसके बाद 15 मार्च 2012 को अखिलेश ने सिर्फ 38 साल की उम्र में राज्य के 20वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली।

पिता की विरासत पर फिर करेंगे सियासत

आगामी लोकसभा चुनाव को ’महायुद्ध मानकर बैरी बसपा को भी गले लगा चुके अखिलेश यादव इसके बाद भी कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं हैं। यही वजह है कि पिछले चुनावों में मोदी लहर के अप्रत्याशित परिणाम देख चुके सपा के युवा मुखिया ने अपने लिए लोहिया के ’बंकर को ठिकाना बनाया है। यह कन्नौज की वह धरती है, जिसने समाजवादी विचारधारा के प्रणेता राममनोहर लोहिया से लेकर मुलायम सिंह और उनके बेटे-बहू को सीधे दिल्ली के दरबार तक पहुंचाया। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ऐलान किया है कि 2019 का लोकसभा चुनाव वह कन्नौज से लड़ेंगे। इस लोकसभा सीट से वर्तमान में उनकी पत्नी डिंपल यादव सांसद हैं।

लोहिया ने यहीं से लड़ा था चुनाव

यादव परिवार की राजनीति का सफर कन्नौज में 1967 से शुरू होता है। पहली बार डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने इस सीट पर राजनीतिक क्षेत्र में किस्मत आजमाई और वह जीते। 1971 के चुनाव में उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी सत्यनारायण मिश्रा ने हरा दिया। उसके बाद बारी-बारी से जनता पार्टी, जनता दल, भाजपा, कांग्रेस को जीत मिलती रही। 1998 में पहली फिर सपा प्रत्याशी प्रदीप यादव यहां से जीते तो फिर यह सपा का मजबूत गढ़ बनती चली गई। 1999 का लोकसभा चुनाव कन्नौज से मुलायम सिंह यादव जीते। तब अखिलेश यादव के लिए भी एक ’सुरक्षित सीट की तलाश शुरू हो चुकी थी। 2000 के उपचुनाव में मुलायम ने बेटे अखिलेश को यहीं से राजनीति में लांच किया और यहीं से पहली बार वह सांसद चुने गए।

इस लिए पिता-पुत्र और बहू जीते

कन्नौज लोकसभा सीट का जातीय समीकरण देखें तो अखिलेश को जीत की उम्मीदें पालने का भरपूर हौसला दे सकता है। पिछले कई चुनावों से बसपा यहां मजबूती से लड़ती रही है। इस लोकसभा क्षेत्र में 16 फीसद यादव, 36 फीसद मुस्लिम, 15 फीसद ब्राह्मण, 10 फीसद राजपूत तो बड़ी तादाद में लोधी, कुशवाहा, पटेल, बघेल जाति का वोट है। यादव के साथ अन्य पिछड़ों को अपने पाले में खींचने में यदि सपा सफल रही तो अखिलेश की जीत यहां से पक्की है। कन्नौज निवासी रिटायर्ड टीचर राधेश्याम लोधी कहते हैं कि यादव-मुस्लिमों के साथ मुलायम के परिवार को हर समाज का वोट मिलता आ रहा है और आगे भी मिलता ही रहेगा।

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Published on:
17 Jun 2018 10:17 am
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