गठबंधन के लिए बड़ी कुर्बानी, 30 सीटों पर भी नहीं लड़ेगी समाजवादी पार्टी
कानपुर. बड़ी खबर है। यूपी में मिशन 2019 में मोदी का विजय रथ रोकने के लिए सपा के सुल्तान अखिलेश यादव ने सबसे बड़ी कुर्बानी देने का फैसला किया है। मायावती की जिद को पूरी करने के लिए अखिलेश यादव ने तय किया है कि पार्टी वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में 30 से कम सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इस स्थिति में गठबंधन सरकार बनने पर अखिलेश के सामने प्रधानमंत्री बनने का मौका नहीं रहेगा, क्योंकि तीस से कम सीटों पर चुनाव लडऩे की स्थिति में पार्टी को अधिकतम 23-24 सीट हासिल होंगी। इस कुर्बानी पर अखिलेश यादव का कहना है कि बड़ी लड़ाई जीतने के लिए छोटी लड़ाई हारने वाला ही सिकंदर बनता है। अखिलेश की इसी कुर्बानी के कारण कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र की 10 में सिर्फ चार सीट पर सपा के उम्मीदवार मैदान में नजर आएंगे। सपा ने कन्नौज, इटावा, फर्रुखाबाद और बांदा में प्रत्याशी उतारने का फैसला किया है। कानपुर की अकबरपुर सीट समेत हमीरपुर-महोबा, झांसी, जालौन-गरौठा तथा मिश्रिख सीट बसपा के खाते में जाएगी, जबकि कानपुर नगर की सीट को लेकर सस्पेंस है। कांग्रेस के महागठबंधन में शामिल होने की स्थिति में यह सीट कांग्रेस के खाते में जाएगी, अन्यथा यहां सपा का उम्मीदवार उतरेगा।
सुल्तान ने कहा- त्याग करने से समाजवादी पार्टी पीछे नहीं
मिशन 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को शिकस्त देने के लिए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सीटों के मसले पर समझौता करने का ऐलान किया है। सोशल मीडिया के जरिए सपा अध्यक्ष ने कहा है कि भाजपा के झूठ के खिलाफ यह लड़ाई लंबी है, इसलिए यह पक्का समझ लीजिए कि बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन कायम रहेगा। उन्होंने कहाकि सीटों के बंटवारे की बात है तो दो-चार सीटें आगे-पीछे रहेगी, इसके अलावा भी त्याग करना पड़ेगा तो समाजवादी पार्टी पीछे नहीं हटेगी। गौरतलब है कि बहुजन समाज पार्टी अध्यक्ष मायावती ने आगामी लोकसभा चुनाव में बनने वाले गठबंधन को लेकर पिछले दिनों कहा कि था कि सम्मानजनक सीटें नहीं मिली तो बीएसपी अकेले लडऩे के लिए भी तैयार है। मायावती के दबाव के बाद अखिलेश ने साफ कर दिया है कि वह जूनियर पार्टनर बनने को राजी हैं।
सिकंदर बनने के लिए सुल्तान ने खेला बड़ा दांव
दरअसल, अखिलेश यादव गोरखपुर, फूलपुर, कैराना लोकसभा उप-चुनाव में विपक्षी दलों की सफलता से उत्साहित हैं। तीनों ही सीटों पर भाजपा का कब्जा था। उप-चुनाव में बीजेपी को हराने लिए विपक्षी दल साथ आए और सत्तारूढ़ दल को हार मिली। अब अखिलेश यादव यही फॉर्मूला लोकसभा चुनाव में भी दोहराना चाहते हैं। गौरतलब है कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा 80 सीटों में एक भी सीट नहीं जीत सकी थी, जबकि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी परिवार तक ही सिमट गई थी। समाजवादी पार्टी को पांच, जबकि कांग्रेस को अमेठी-रायबरेली की दो सीटों पर जीत नसीब हुई थी। बहरहाल, मायावती के आगे जूनियर बनने को तैयार अखिलेश यादव भविष्य की राजनीति को पुख्ता करने के लिए त्याग कर रहे हैं। राजनीति के जानकारों का कहना है कि सियासी महत्वाकांक्षा के कारण विपक्षी दलों की गठबंधन सरकार ज्यादा दिन नहीं चलेगी, ऐसे में मध्यावधि चुनाव होंगे। इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए अगले वर्ष के चुनाव के बजाय अखिलेश की नजर मध्यावधि चुनाव में किंग बनने की है।