कटनी

जिला अस्पताल में ‘दवा’ का खेल! मुफ्त में सरकारी इलाज के बाद भी मेडिकल में लुटने विवश मरीज

मरीज सिस्टम में पिसने को मजबूर, दवाओं से लेकर कॉटन पट्टी व सीरिंज मंगा रहे मेडिकलों से, जिम्मेदार मौन, जिला अस्पताल प्रबंधन नहीं दे रहा ध्यान, कुछ स्वास्थ्य कर्मी व आशा-ऊषा का भी चल रहा है गठजोड़
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Apr 13, 2026
Arbitrariness in medicines in District Hospital Katni
Arbitrariness in medicines in District Hospital Katni

कटनी. जिला अस्पताल में दवाओं के पर्याप्त स्टॉक और बेहतर इलाज के दावे कागजों तक सीमित नजर आ रहे हैं। हकीकत यह है कि यहां पहुंचने वाले मरीज और उनके परिजन सिस्टम की लापरवाही और अव्यवस्था का शिकार बन रहे हैं। घंटों लाइन में लगकर ओपीडी पर्ची बनवाने के बाद मरीज डॉक्टर तक पहुंचते हैं, लेकिन जब दवाएं लिखी जाती हैं तो उन्हें बताया जाता है कि दवा स्टॉक में उपलब्ध नहीं है। इसके बाद शुरू होता है ‘बाहर से दवा खरीदो’ का खेल, जिसमें मरीजों को मजबूरी में निजी मेडिकल स्टोर्स का सहारा लेना पड़ता है।
अस्पताल परिसर में सक्रिय कुछ आशा-ऊषा कार्यकर्ताओं पर गंभीर आरोप हैं कि वे मरीजों को सरकारी दवाओं को बेअसर बताकर निजी मेडिकल से महंगी दवाएं खरीदने के लिए उकसाती हैं। जल्दी आराम और ज्यादा फायदा का लालच देकर चंद मिनटों में मरीजों को बाहर से दवा दिलवा दी जाती है। यह सिलसिला वर्षों से जारी है, लेकिन निगरानी तंत्र की कमजोरी और अस्पताल प्रबंधन की उदासीनता के चलते यह खेल खुलेआम चल रहा है। इसमें कुछ स्वास्थ्य कर्मचारियों की भूमिका भी संदिग्ध बताई जा रही है।

सरकारी अस्पताल से निजी क्लीनिक तक ‘रेफरल रैकेट’

मामला सिर्फ दवाओं तक सीमित नहीं है। जिला अस्पताल में मरीजों को निजी अस्पतालों और क्लीनिकों तक पहुंचाने का भी संगठित नेटवर्क सक्रिय बताया जा रहा है। मरीजों को डर दिखाया जाता है कि सरकारी अस्पताल में इलाज संभव नहीं है या जान को खतरा हो सकता है, जिससे घबराकर परिजन निजी अस्पताल का रुख कर लेते हैं। हैरानी की बात यह है कि कुछ सरकारी डॉक्टरों से जुड़े कर्मचारी भी इस खेल में शामिल बताए जा रहे हैं, जो मरीजों को निजी क्लीनिक तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

एनपीए लेने के बाद भी निजी प्रैक्टिस

सूत्रों के अनुसार, जिला अस्पताल कॉलोनी और शहर में कई चिकित्सकों के निजी क्लीनिक संचालित हो रहे हैं, जहां अस्पताल के मरीजों को शिफ्ट किया जाता है। गंभीर सवाल यह है कि एनपीए (नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस) लेने के बावजूद डॉक्टर निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं, जो नियमों का सीधा उल्लंघन है। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारी मौन हैं।

निगरानी कमजोर, प्रबंधन बेखबर या मौन

अस्पताल में चल रहे इस पूरे खेल से प्रबंधन अनजान नहीं है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सन्नाटा है। वर्षों से चली आ रही इस व्यवस्था ने अब एक ‘सिस्टम’ का रूप ले लिया है, जहां मरीज की मजबूरी को मुनाफे का जरिया बना दिया गया है। जिला अस्पताल की यह तस्वीर स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस पर कब और कितनी सख्ती से कार्रवाई करता है या फिर मरीज यूं ही सिस्टम के इस खेल में पिसते रहेंगे।

ऐसे समझें मरीजों की विवशता का खेल

80 रुपए में खरीदनी पड़ी पट्टी

भागचंद निवासी भरदा के पैर में चोट लगी थी। जिला अस्पताल की ओपीडी में पर्ची कटवाने के बाद चिकित्सक को दिखाया। इसके बाद उन्होंने पट्टी कराने कहा। जब पट्टी बंधन कक्ष में पहुंचे तो पता चला कि यहां पर कॉटन पट्टी नहीं है। बाजार से लाने कहा गया। भागचंद जिला अस्पताल के बाहर स्थित मेडिकल पहुंचे और 80 रुपए की पट्टी खरीदी, इसके बाद पट्टी हुई।

845 रुपए में पड़ी फोड़ा-फुंसी की दवाएं

शकुन बाई निवासी भरवारा को फोड़ा-फुंसी की समस्या होने पर पति अच्छेलाल जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। चिकित्सक को दिखाया तो पता चला कि दवाएं नहीं है। डॉक्टर ने बाहर से दवाएं लेने कहा। दवाएं जब मेडिकल से खरीदने पहुंचे तो 845 रुपए में मिलीं। मजबूरी में दंपत्ति को दवाएं खरीदनी पड़ीं। यह स्थिति पूरे दिन जिला अस्पताल के बाहर मेडिकलों में देखी जा सकती है।

मेडिकल से लाना पड़ा सीरिंज

भरवारा निवासी हरीशचंद लोधी के हाथ-पैर में अकडऩ की समस्या थी। जिला अस्पताल में भर्ती होकर इलाज करा रहे थे। इलाज के दौरान सीरिंज की आवश्यकता पड़ी। नर्सिंग स्टॉफ ने बाहर से लाने कहा। भर्ती मरीज उठकर गए और मडिकल से 35 रुपए का सीरिंज खरीदकर लेकर आए तब इंजेक्शन लग पाया। हर दिन मरीजों से उपचार के लिए दवाएं व सामग्री मंगाई जाती हैं।

नवजातों के लिए भी नहीं दवाएं

हिना बी पवई ने बताया कि उनके यहां जिला अस्पताल में प्रसव हुआ था। नवजात बच्चे को समस्या होने पर गहन चिकित्सा इकाई कक्ष (एसएनसीइयू) में भर्ती कराया गया था। चिकित्सक ने जब दवाएं लिखीं तो नहीं मिलीं। परिजनों को 450 रुपए से बाहर की दवाएं लानी पड़ीं तब बच्चे का उपचार हो पाया।

वर्जन

यदि चिकित्सक बाहर कीदवाएं लिखर रहे हैं तो गलत है। अस्पताल में पर्याप्त स्टॉक है। इसकी निगरानी कराई जाएगी। यदि चिकित्सक व कर्मचारी बाहर से मरीज व परिजनों को दवाएं खरीदवाते पाए जाते हैं तो कार्रवाई की जाएगी। मरीजों को निजी अस्पताल भेजने के लिए यदि कोई गुमराह करता है तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई करेंगे।

डॉ. यशवंत वर्मा, सीएस।

Updated on:
13 Apr 2026 10:41 am
Published on:
13 Apr 2026 10:41 am