91 जलाशयों में 28 बांध सुधार के योग्य, मरम्मत के लिए विभाग के पास नहीं पर्याप्त बजट, सालाना मिलता है 25 लाख रुपए, कागजों में सिंचाई क्रांति, धरातल पर फूटी नहरें और सूखे खेत, जिले में कुल 32 हजार हेक्टेयर सिंचित
बालमीक पांडेय @ कटनी. जिले में किसानों की तकदीर बदलने और सिंचाई व्यवस्था मजबूत करने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। जिले के अधिकांश बांध और नहरें खुद बदहाली के आंसू बहा रहे हैं। हालत यह है कि जिले के 91 जलाशयों में से 28 बांध जर्जर हालत में पहुंच चुके हैं, जो ब्रिटिश काल के हैं। दिल्ली की सीडीएसई डेम सेफ्टी टीम द्वारा निरीक्षण के बाद इन बांधों की खराब स्थिति पर मुहर भी लगाई जा चुकी है, लेकिन इसके बावजूद सुधार कार्य ठप्प है।
जल संसाधन विभाग की सबसे बड़ी मजबूरी बजट की कमी है। विभाग को सालाना मात्र 25 लाख रुपए का बजट मिल रहा है, जो इतने बड़े स्तर पर मरम्मत कार्यों के लिए नाकाफी साबित हो रहा है। कई बांध सौ साल से अधिक पुराने हो चुके हैं और उनकी दीवारों से लेकर नहरों तक में दरारें साफ दिखाई दे रही हैं।
जिले की करीब 90 प्रतिशत नहरें कच्ची, टूटी-फूटी और जर्जर हालत में हैं। जैसे ही बांधों से पानी छोड़ा जाता है, आधे से ज्यादा पानी खेतों तक पहुंचने के बजाय रास्ते में ही नदी-नालों और बेकार बहाव में खत्म हो जाता है। तीन दर्जन से अधिक जलाशयों की नहरें इतनी खराब हैं कि किसानों को सिंचाई का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा। कुछ बांधों की मरम्मत के लिए टेंडर जरूर जारी हुए हैं और सीमित काम भी चल रहा है, लेकिन वह ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहा है। नए जलाशयों के निर्माण में भी लेटलतीफी और मनमानी जारी है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जल संसाधन विभाग, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के कारण किसानों की यह बड़ी समस्या लगातार गहराती जा रही है।
जिले में 28 जलाशय ऐसे हैं जो जर्जर हैं और मरम्मत योग्य हैं। इनमें झांपी, अमेहटा, झिरगिरी, धरवारा, चंदोल, पिपरौंध, सुरखी पोड़ी, सिमरा कुदरी, घिनौची, गोरहाबांधा, हिनौती, छपरा, देवरी, मसंधा, सकरवारा, छपरी, सर्रा, अमाड़ी, पथरेहटा, लोखान, खितौली, जगुआ, बोरिना, सगौना, सिमरार, दतला, भितरीगढ़ व बहोरीबंद जलाशय है। इन बांधों व इनकी नहरों की मरम्मत नितांत आवश्यक है।
जिले के 9 बांध ऐसे हैं जिनकी उम्र लगभग 100 वर्ष हो गई है व होने वाली है, उनके मरम्मत के लिए टेंडर प्रक्रिया हुई है। इनमें जगुआ, खितौली, दतला, अमाड़ी, इमलिया, सकरवारा, मसंधा, बहोरीबंद व बोरिना बांध शामिल है। इसके अलावा 9 जलाशयों का 29.18 करोड़ से जलाशयों का सुधार व नहरों की मरम्मत का काम होना है, जिसके टेंडर की प्रक्रिया हो गई है। अमेहटा जलाशय का पुननिर्माण, बिजौरी में नहर सुधार, धरवारा में वीआरबी सुधार, भजिया-झांपी में जलाशय सुधार, इमलिया में बांध सुधार, अरिगवां में नहर सुधार, बोरीना में नहर की आरडी 100 से 300 मीटर, रामपाटन जलाशय सीडी का पुननिर्माण, जुझारी में बायीं तट नहर का डायवर्सन वॉल, सीडी का सुधार कार्य होना है।
जल संसाधन विभाग व प्रशासन के द्वारा जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत नहरों की सफाई व मरम्मत कराई जा रही है। 40 किलोमीटर नहरों की सफाई का लक्ष्य रखा गया है। इनमें से 22 किलोमीटर में सफाई का काम हो गया है। शेष का कार्य प्रगतिरत है।
उमरियापान के समीप मडेरा स्थित प्राचीताल जलाशय से निकली सिंचाई नहरें जर्जर हैं। जिससे किसानों को समय पर सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल पा रहा है। मडेरा से बम्हनी की ओर जाने वाली नहर कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त है। पानी खेतों तक पहुंचने से पहले ही बीच रास्ते में बहकर व्यर्थ हो रहा है। किसानों के अनुसार नहरों में जगह-जगह दरारें होने से पानी लगातार रिस रहा है। वहीं नहरों में बड़ी मात्रा में झाडिय़ां और घास उग आने से पानी का प्रवाह भी बाधित हो रहा है। कई जगह झाडिय़ां पानी रोक रही हैं, जिससे सिंचाई प्रभावित हो रही है। किसानों को मजबूरी में निजी साधनों से सिंचाई करनी पड़ रही है, जिससे खेती की लागत बढ़ रही है।
बहोरीबंद जलाशय से निकलने वाली आरबीसी दायीं तट नहर रखरखाव के अभाव में जगह-जगह जर्जर और क्षतिग्रस्त हो चुकी है। इस नहर से करीब 1800 हेक्टेयर भूमि सिंचित करने का लक्ष्य है, जिससे कूडऩ, कजरवारा, डूडसरा, सिमरापटी, सिंदूरसी, गाड़ा, सुहास, तमुरिया, पड़रिया, बम्होरी, हथियाखढ़, कूड़ा, ईमलीगढ़ और अमरगढ़ के किसान जुड़े हैं। लेकिन नहर में कटाव, रिसाव और झाडिय़ों के कारण पानी खेतों तक नहीं पहुंच पा रहा। किसानों का आरोप है कि जल संसाधन विभाग हर साल रखरखाव के नाम पर लाखों रुपए खर्च दिखाता है, जबकि नहर की हालत जस की तस बनी हुई है। किसानों ने बताया कि पड़रिया के बाद नहर बेहद खराब है, जिससे आगे के गांवों तक पानी नहीं पहुंच पाता। साइनफन पुलिया जर्जर होने से भी कई गांवों के किसान सिंचाई सुविधा से वंचित हैं।
पत्ने नहर खखरा, पटना, कछारगांव से बाकल होते हुए आगे तक जाती है। नहर एकदम जजर्र हालत में है। किसानों ने मानें तो अधिकांश पानी बेकार बह जाता है। किसानों ने बताया कि पटोरी, इमलिया, खखरा, माहेतरा आदि में बमुश्किल 25 प्रतिशत ही सिंचाई हो पा रही है।
नहर की वर्षों से सही तरीके से साफ-सफाई नहीं हुई। तीन साल से एक बड़ा कट पड़ा है, लेकिन विभाग ने उसे आज तक नहीं सुधारा। पानी बीच रास्ते में बह जाता है, जिससे किसानों को पर्याप्त सिंचाई नहीं मिल पाती और फसलों को नुकसान उठाना पड़ता है।
हर साल नहर रखरखाव के नाम पर लाखों रुपए खर्च होने की बात कही जाती है, लेकिन धरातल पर कुछ नजर नहीं आता। नहर जर्जर पड़ी है और किसान परेशान हैं। लगता है कि केवल कागजों में काम दिखाकर राशि खर्च कर दी जाती है।
जिले के 28 जलाशय व उनकी नहरें मरम्मत योग्य हैं। बजट मिलने व टेंडर के बाद आगे की प्रक्रिया होगी। 9 बांधों व उनकी नहरों के मरम्मत के लिए स्वीकृति मिली है, जिनकी टेंडर कराए गए हैं। 40 किमी नहरों की सफाई जल गंगा संवर्धन अभियान से भी हो रही है।