पढ़ाई, नींद और व्यवहार पर असर, एक्सपर्ट, पैरेंट्स और स्कूलों ने जताई चिंता, अभिभावक भी हो रहे परेशान
बालमीक पांडेय @ कटनी. शहर में मोबाइल गेमिंग की लत बच्चों के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। खासतौर पर कोरियन ग्रुप से जुड़े ऑनलाइन गेम्स बच्चों को तेजी से अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। शहर की संत नगर, आदर्श कॉलोन, शिवाजी नगर, बंगला लाइन पैरेंट्स से बातचीत करने पर सामने आया कि बच्चे रोजाना 4 से 6 घंटे तक मोबाइल गेम खेल रहे हैं।
शांति नगर निवासी रामचंद्र हीरानी बताते हैं कि उनका 13 वर्षीय बेटा स्कूल से आते ही मोबाइल में गेम खेलने लग जाता है। पढ़ाई में रुचि कम हो गई है और रात को देर तक जागने से नींद भी पूरी नहीं हो पाती। झिंझरी निवासी पूजा मिश्रा का कहना है कि मोबाइल छिनने पर बच्चा गुस्सा करने लगता है, रोने लगता है और कई बार चीजें पटकने जैसी हरकतें भी करता है।
शिवाजी नगर निवासी 12 वर्षीय आर्यन (बदला हुआ नाम) रोज 4 से 5 घंटे ऑनलाइन गेम खेलता है। गेम में लेवल बढ़ाने के लिए वह अकेलापन महसूस करता है और दोस्तों से दूरी बनाने लगा है। मोबाइल न मिलने पर चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ जाता है।
केस 02
गायत्री नगर निवासी सुरेश यादव बताते हैं कि उनके बेटे ने ऑनलाइन गेम में इन-ऐप खरीदारी के जरिए बिना बताए 8 हजार रुपए खर्च कर दिए। बैंक मैसेज आने पर इस बात का खुलासा हुआ, जिससे परिवार तनाव में आ गया।
चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. मनीष मिश्रा बताते हैं कि गेमिंग एडिक्शन के लक्षणों में जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम, गुस्सा, जिद, सामाजिक दूरी और पढ़ाई में गिरावट शामिल हैं। 10 से 16 वर्ष की उम्र के बच्चे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। जब गेमिंग रोजमर्रा के कामों में बाधा बनने लगे, तब यह आदत बीमारी का रूप ले लेती है।
एक निजी स्कूल के शिक्षक अजय गौतम के अनुसार बच्चों का फोकस क्लास में घटा है और होमवर्क अधूरा रहने लगा है। स्कूल में मोबाइल प्रतिबंध से कुछ हद तक सुधार हुआ है, लेकिन काउंसलिंग की अभी और जरूरत है।
साइबर एक्सपर्ट एप निरीक्षक व एनकेजे थाना प्रभारी रूपेंद्र राजपूत बताते हैं कि ऑनलाइन गेम्स में इन-ऐप खरीदारी, अनजान लोगों से संपर्क और साइबर फ्रॉड का खतरा रहता है। थाना प्रभारी ने कहा कि बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में जागरूक करना जरूरी है।
मनोचिकित्सक डॉ. संदीप निगम के अनुसार पिछले 1-2 साल में गेमिंग से जुड़े केस बढ़े हैं। बच्चे नींद की कमी, आंखों में जलन, चिड़चिड़ापन और मानसिक तनाव की शिकायत लेकर आ रहे हैं। एक्सपट्र्स का कहना है कि 12 साल से कम उम्र के बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित होना चाहिए। मोबाइल देने से पहले नियम तय करें, बच्चों से संवाद बढ़ाएं और मोबाइल के विकल्प के रूप में खेल, किताबें, कला और आउटडोर गतिविधियों को बढ़ावा दें। समय रहते ध्यान न दिया गया तो मोबाइल गेमिंग की लत बच्चों के भविष्य पर भारी पड़ सकती है।
मोबाइल गेमिंग की बढ़ती लत बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास पर गंभीर दुष्परिणाम डाल रही है। अत्यधिक गेम खेलने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, एकाग्रता घटती है और याददाश्त कमजोर होने लगती है। देर रात तक मोबाइल इस्तेमाल करने से नींद पूरी नहीं हो पाती, जिससे थकान, चिड़चिड़ापन और सिरदर्द की समस्या बढ़ती है। लगातार स्क्रीन देखने से आंखों में जलन, धुंधलापन और सिर में दर्द जैसी परेशानियां सामने आ रही हैं। मानसिक रूप से बच्चे गुस्सैल, जिद्दी और अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं। मोबाइल छीने जाने पर रोना, चिल्लाना या हिंसक व्यवहार करना आम हो गया है। सामाजिक दायरा सीमित होने से दोस्ती और पारिवारिक संवाद कमजोर पड़ता है। ऑनलाइन गेम्स में इन-ऐप खरीदारी से आर्थिक नुकसान का खतरा भी रहता है। लंबे समय तक यह लत बने रहने पर अवसाद, चिंता और आत्मविश्वास की कमी जैसी गंभीर मानसिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।