
श्राद्ध पक्ष में पितरों के तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व है। बिहार के गया तीर्थ की तरह ही ओंकारेश्वर में कावेरी नदी के किनारे स्थित गया शिला को भी पितरों की मुक्ति का प्रमुख तीर्थ माना जाता है। मान्यता है कि यहां श्रद्धा के साथ तर्पण और पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
ओंकारेश्वर के मांधाता पर्वत के पीछे, सिद्धवरकूट के पास प्राकृतिक वातावरण में स्थित गया शिला प्राचीन धार्मिक स्थल है। यहां एक प्राचीन शिवालय भी है। मंदिर परिसर में स्थित पवित्र शिला को स्थानीय लोग अनादि काल से पूजनीय मानते आए हैं। पितरों की शांति और मुक्ति की कामना से श्रद्धालु यहां पिंडदान और तर्पण करते हैं।
कर्मकांड पंडित दुर्गेश पचौरी ने बताया श्राद्ध पक्ष में हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु गया शिला पहुंचते हैं। यहां पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की धार्मिक परंपरा निभाई जाती है। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पितृपक्ष के दौरान रहने और भोजन की व्यवस्था भी की जाती है। उन्होंने बताया कि सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के अवसर पर श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। इस दौरान ओंकारेश्वर के नर्मदा और कावेरी नदी के घाटों के साथ गया शिला पर भी बड़ी संख्या में लोग पितरों का तर्पण और पिंडदान करने पहुंचते हैं।
पं. दुर्गेश पचौरी के अनुसार पितरों की मुक्ति के लिए बिहार के गया तीर्थ जाने की परंपरा है। हालांकि, जो लोग किसी कारणवश गया नहीं जा पाते, वे ओंकारेश्वर की गया शिला में भी श्रद्धा के साथ तर्पण और पिंडदान कर सकते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां पिंडदान करने से भी पितरों की शांति और मुक्ति के लिए पुण्य फल प्राप्त होता है।
गया शिला की धार्मिक मान्यता के कारण सर्वपितृ अमावस्या पर यहां विशेष आयोजन होता है। इस अवसर पर तीन दिवसीय मेला भी लगाया जाता है। खंडवा, इंदौर, बुरहानपुर, भोपाल सहित आसपास और मप्र क दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। पितरों के निमित्त पूजा, तर्पण और पिंडदान कर श्रद्धालु उनकी आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना करते हैं।