
Ex Maoist Shobha Munda Life Story : कोलकाता। कभी जंगलों में बंदूक लेकर चलने वाली और माओवादी संगठन में सक्रिय रही शोभा मुंडा आज गरीबी और बेघरपन से जूझते हुए सामान्य जीवन जीने की कोशिश कर रही हैं। उनकी कहानी केवल एक पूर्व माओवादी की नहीं, बल्कि जंगलमहल के उन हालातों की भी है, जहां गरीबी और अभाव ने कई बच्चों का बचपन छीन लिया।
झाड़ग्राम जिले के बेलपहाड़ी थाना क्षेत्र के माजुगोड़ा गांव की रहने वाली चंदना सिंह की उम्र जब महज 12 साल थी, तब घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल था। मजबूरी में उन्होंने कम उम्र में ही घर छोड़ दिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात माओवादी नेता मदन महतो से हुई और धीरे-धीरे वह संगठन से जुड़ गईं। संगठन ने उन्हें नया नाम 'शोभा मुंडा' दिया। इसके बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। किताबों की जगह बंदूक ने ले ली और जंगल ही उनका ठिकाना बन गया।
बेलपहाड़ी के जंगलों से शुरू हुआ उनका सफर झारखंड के घाटशिला तक पहुंचा, जहां उनकी मुलाकात माओवादी स्क्वॉड के सदस्य राजेश मुंडा से हुई। दोनों ने विवाह किया और संगठन के लिए साथ काम करने लगे। समय के साथ शोभा संगठन की सक्रिय सदस्य बन गईं और हथियार चलाने में उनकी दक्षता की भी चर्चा होने लगी।
वर्ष 2010 में घाटशिला में पुलिस के एक अभियान के दौरान शोभा गिरफ्तार हो गईं। उनके खिलाफ कई मामले दर्ज किए गए और अदालत ने उन्हें जेल भेज दिया। इसके बाद उन्होंने करीब 15 वर्ष जेल में बिताए। वर्ष 2025 में मिदनापुर केंद्रीय सुधार गृह से रिहा होने के बाद वह अपने पैतृक गांव माजुगोड़ा लौट आईं, लेकिन बाहर की दुनिया और उनकी परिस्थितियां दोनों बदल चुकी थीं।
आज शोभा अपनी बुजुर्ग मां के साथ गांव में रह रही हैं और दिहाड़ी मजदूरी कर किसी तरह जीवनयापन कर रही हैं। उनका कहना है कि उनके नाम पर कोई घर नहीं है और उन्हें अब तक किसी सरकारी आवास योजना का लाभ नहीं मिला। उनका आरोप है कि नियमित राशन और पुनर्वास से जुड़ी सुविधाएं भी उन्हें उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं।
शोभा कहती हैं कि अब मैं सामान्य जिंदगी जीना चाहती हूं। बस सिर छिपाने के लिए एक पक्का घर मिल जाए और मेहनत करके सम्मान के साथ जीवन बिता सकूं। उनकी कहानी इस बात की याद दिलाती है कि जंगलमहल में गरीबी, अशिक्षा और अभाव ने किस तरह कई बच्चों को हिंसा के रास्ते पर धकेल दिया था।
अब जब ऐसे लोग मुख्यधारा में लौटकर नई शुरुआत करना चाहते हैं, तब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती सम्मानजनक जीवन, रोजगार और पुनर्वास की है। एक समय बंदूक उठाने वाली शोभा मुंडा की सबसे बड़ी लड़ाई अब गरीबी और बेघरपन के खिलाफ है। उनका संघर्ष इस सवाल को भी सामने लाता है कि क्या समाज और व्यवस्था उन्हें वास्तव में दूसरा अवसर दे पाएंगे।