चमकते आंकड़ों और खूबसूरती के बीच सुंदरवन इस समय बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा है। पर्यावरण विज्ञान पत्रिका 'कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट' में प्रकाशित हालिया शोध के अनुसार, पिछले 25 वर्षों में सुंदरवन का लगभग 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा अपनी प्राकृतिक लचीलापन खो चुका है। जलवायु परिवर्तन के कारण यहाँ समुद्र का जलस्तर वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी तेजी से बढ़ रहा है। हुगली-भागीरथी नदी प्रणाली से मीठे पानी के प्रवाह में कमी आने के कारण पानी में खारापन खतरनाक स्तर तक बढ़ गया है। इसका सीधा असर सुंदरवन के मुख्य 'सुंदरी' वृक्षों पर पड़ रहा है, जो 'टॉप डाइंग' नामक बीमारी के शिकार होकर सूख रहे हैं। जमीन का क्षरण और खारे पानी का खेतों में घुसना यहाँ रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका (मछली पकड़ना और शहद इकट्ठा करना) को लील रहा है, जिससे बड़े पैमाने पर लोग 'जलवायु शरणार्थी बनकर पलायन करने को मजबूर हैं।
वैश्विक पर्यावरण की धरोहर है सुंदरवन
गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदियों के मुहाने पर बंगाल की खाड़ी के शीर्ष पर स्थित 'सुंदरवन' भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। अपने नाम के अनुरूप 'सुंदरी' वृक्षों की प्रचुरता वाला यह क्षेत्र दुनिया का सबसे बड़ा एकल मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र है। कुल मिलाकर लगभग 10,277 वर्ग किलोमीटर में फैले इस विशाल दलदली और सदाबहार क्षेत्र सुंदरवन का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा (4,260 वर्ग किमी) भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में आता है, जबकि शेष 60 प्रतिशत हिस्सा बांग्लादेश में विस्तृत है। यूनेस्को विश्व धरोहर और रामसर साइट का दर्जा प्राप्त सुंदरवन आज वैश्विक स्तर पर पर्यावरण, वन्यजीव प्रेमियों और जलवायु वैज्ञानिकों के लिए कौतूहल और चिंता दोनों का मुख्य केंद्र बना हुआ है। भारत सरकार ने मैंग्रोव और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के महत्व को देखते हुए केंद्रीय बजट में पर्यावरण और वन मंत्रालय के लिए रिकॉर्ड 3,412.82 करोड़ रुपए का आवंटन किया है, जिसका एक बड़ा हिस्सा सुंदरवन जैसी संवेदनशील प्रणालियों के संरक्षण पर खर्च हो रहा है।
अद्भुत जैव-विविधता और नया विस्तार
सुंदरवन वैश्विक पर्यावरण की धरोहर है। राज्य सरकार की 4,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में नई मैंग्रोव प्रजातियां लगाने की मुहिम और स्थानीय स्तर पर महिलाओं की पर्यावरण मित्र के रूप में बढ़ती भागीदारी एक नई उम्मीद जगाती है। सुंदरवन का भारतीय हिस्सा अत्यंत जटिल और संवेदनशील है। यहाँ के कुल 4,260 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में से लगभग 1,700 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा केवल नदियों, संकरी खाड़ियों और जलमार्गों से घिरा हुआ है। हालिया वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार, सुंदरवन लगभग 453 वन्यजीव प्रजातियों का सुरक्षित ठिकाना है, जिसमें 290 प्रकार के पक्षी, 120 प्रकार की मछलियाँ, 42 स्तनधारी और 35 सरीसृप प्रजातियाँ शामिल हैं।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की तकनीकी मंजूरी के बाद सुंदरवन टाइगर रिजर्व के दायरे को करीब 1,100 वर्ग किलोमीटर बढ़ाने का अंतिम प्रस्ताव केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के पास है। इस विस्तार के बाद यह टाइगर रिजर्व 2,585 वर्ग किमी से बढ़कर 3,629 वर्ग किलोमीटर से अधिक का हो जाएगा, जिससे यह आंध्र प्रदेश के नागार्जुनसागर-श्रीशैलम के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा बाघ अभयारण्य बन जाएगा।
तैरने वाले अनोखे बाघ
तैरने वाले अनोखे बाघ रॉयल बंगाल टाइगर दुनिया के इकलौते ऐसे बाघ हैं जो खारे पानी के भूभाग में रहते हैं। परिस्थितियों के अनुकूल ढलने के कारण ये बाघ अत्यंत कुशल तैराक होते हैं और भोजन की तलाश में एक द्वीप से दूसरे द्वीप तक कई किलोमीटर चौड़ी हिंसक नदियों को आसानी से तैरकर पार कर जाते हैं।
उल्टी सांस लेने वाले पेड़
दलदली और ऑक्सीजन विहीन मिट्टी होने के कारण यहाँ के मैंग्रोव वृक्षों की जड़ें जमीन के अंदर जाने के बजाय खूंटी की तरह पानी और कीचड़ से ऊपर हवा में निकल आती हैं। इन्हें 'न्यूमेटोफोर्स' या श्वसन जड़ें कहा जाता है, जो सीधे वायुमंडल से ऑक्सीजन लेती हैं।
प्रकृति का चक्रवाती 'शॉक एब्जॉर्बर'
जब भी बंगाल की खाड़ी में अम्फान, यास या रेमल जैसे भीषण चक्रवात उठते हैं, तो सुंदरवन के घने मैंग्रोव पेड़ उनकी गति को सोख लेते हैं। यह जंगल कोलकाता सहित पश्चिम बंगाल के अंदरूनी हिस्सों के लिए एक मजबूत सुरक्षा दीवार का काम करता है।
बाघों की आबादी
नवीनतम गणना के अनुसार, भारतीय सुंदरवन में बाघों की अनुमानित संख्या 101 है (जिसमें 80 मुख्य टाइगर रिजर्व में और 21 दक्षिण 24 परगना के जंगलों में हैं)। वहीं, बांग्लादेश के हिस्से में यह संख्या बढ़कर 125 हो गई है। पूरे सुंदरवन में कुल मिलाकर लगभग 226 बाघ मौजूद हैं। सुंदरवन दुनिया के उन चुनिंदा स्थानों में से है जहाँ ब्राउन-विंग्ड और रूडी किंगफिशर जैसी (रामचिरैया) पक्षी की ही 8 दुर्लभ प्रजातियां एक साथ पाई जाती हैं।
बढ़ता संकट: जलवायु परिवर्तन की सीधी मार
चमकते आंकड़ों और खूबसूरती के बीच सुंदरवन इस समय बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा है। पर्यावरण विज्ञान पत्रिका 'कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट' में प्रकाशित हालिया शोध के अनुसार, पिछले 25 वर्षों में सुंदरवन का लगभग 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा अपनी प्राकृतिक लचीलापन खो चुका है।
जलवायु परिवर्तन के कारण यहाँ समुद्र का जलस्तर वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी तेजी से बढ़ रहा है। हुगली-भागीरथी नदी प्रणाली से मीठे पानी के प्रवाह में कमी आने के कारण पानी में खारापन खतरनाक स्तर तक बढ़ गया है। इसका सीधा असर सुंदरवन के मुख्य 'सुंदरी' वृक्षों पर पड़ रहा है, जो 'टॉप डाइंग' नामक बीमारी के शिकार होकर सूख रहे हैं। जमीन का क्षरण और खारे पानी का खेतों में घुसना यहाँ रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका (मछली पकड़ना और शहद इकट्ठा करना) को लील रहा है, जिससे बड़े पैमाने पर लोग 'जलवायु शरणार्थी बनकर पलायन करने को मजबूर हैं।