
पिछले एक माह के दौरान पश्चिम बंगाल में कच्चे जूट के बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। इससे किसानों तथा जूट उद्योग की मुश्किलें बढ़ गई हैं। जुलाई के पहले सप्ताह में जब व्यापारियों के पास लगभग कोई स्टॉक उपलब्ध नहीं था, तब जूट मिलों के बीच कच्चे जूट का कारोबार लगभग 20,000 रुपए प्रति क्विंटल के स्तर पर हो रहा था, लेकिन मात्र 25 दिन के भीतर कीमतें गिरकर लगभग 8,500 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गईं। इसके बाद 31 जुलाई से बाजार में कुछ सुधार के संकेत दिखाई दिए और 4 अगस्त तक कीमतें बढ़कर लगभग 13,000 प्रति क्विंटल हो गईं।
बाजार के मौजूदा हालात को लेकर जूट बेलर्स एसोसिएशन के सदस्य ओम सोनी ने कहा कि कीमतों में आई यह भारी गिरावट न तो कच्चे जूट की वास्तविक उपलब्धता बढ़ने के कारण थी और न ही मांग में किसी कमी के कारण। इसका प्रमुख कारण नई फसल के आगमन को लेकर फैली मंदी की अटकलें थीं, जिनके प्रभाव से खरीद गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुईं। उन्होंने कहा कि अधिकांश जूट मिलों के पास चार दिन से भी कम की खपत के बराबर स्टॉक होने के बावजूद उन्होंने अपनी खरीद या तो टाल दी अथवा उसमें उल्लेखनीय कमी कर दी, जिससे बाजार पर कृत्रिम रूप से कीमतों में गिरावट का दबाव बना। बाद में जब किसानों ने अलाभकारी कीमतों पर अपनी उपज बेचने से इनकार कर दिया, तब बाजार में कीमतों में सुधार शुरू हुआ। किंतु इस सुधार का अर्थ यह नहीं है कि बाजार स्थिर हो गया है। इसके विपरीत, वर्तमान मूल्य अस्थिरता का यह दौर अभी समाप्त होता नहीं दिख रहा है और इसके आगे भी जारी रहने की पूरी संभावना है।
जूट बेलर्स एसोसिएशन के सदस्य ने कहा कि मौजूदा घटनाक्रम से स्पष्ट है कि जब बाजार वास्तविक मांग और आपूर्ति के बजाय अटकलों के आधार पर संचालित होने लगता है तब उसका दुष्प्रभाव किसानों और जूट उद्योग पर पड़ता है। ऐसी अस्थिरता किसानों की आय को प्रभावित करती है, कच्चे जूट की खरीद एवं भंडारण की योजना को बाधित करती है तथा उद्योग के लिए कच्चे माल की नियमित उपलब्धता को भी अनिश्चित बना देती है।उन्होंने कहा कि चूंकि जूट उद्योग भारत सरकार के नियामक ढांचे के अंतर्गत संचालित होता है, इसलिए किसानों को औने-पौने दामों पर अपनी उपज बेचने की मजबूरी से बचाना तथा उद्योग के लिए कच्चे जूट की नियमित, पारदर्शी और संतुलित आपूर्ति सुनिश्चित करना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। बाजार में स्थिरता केवल किसानों की आजीविका की सुरक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के जूट उद्योग की दीर्घकालिक स्थिरता, प्रतिस्पर्धात्मकता और सतत विकास के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।
राज्य में कच्चे जूट की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव से से सरकारी जूट पैकेजिंग सामग्री के मूल्य निर्धारण तंत्र को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं, जबकि उद्योग जगत ने दैनिक बाजार के भाव तय करने के तरीकों पर सवाल उठाए हैं। जूट बेलर्स एसोसिएशन (जेबीए) के मुताबिक टीडी-5 श्रेणी के कच्चे जूट (दक्षिण बंगाल) की मानक दर नौ जुलाई को 18,300 रुपए प्रति क्विंटल थी, जो एक अगस्त तक गिरकर 9,100 रुपए रह गई। फिर इसके दाम बढ़ गए हैं। 4 अगस्त को भाव 13,000 रुपए प्रति क्विंटल दर्ज किया गया। जूट उद्योग के दिग्गज और आईजेएमए के पूर्व चेयरमैन संजय कजारिया ने कहा, यह एक असाधारण उतार-चढ़ाव है जो किसानों, जूट मिलों और सरकार की पैकेजिंग प्रणाली के सामने गंभीर सवाल खड़े करती है। उद्योग को यह जांचने के लिए सौदों पर आधारित जांच की आवश्यकता है कि कीमतें इस तरह कैसे घटीं, विशेष रूप से बाजार में नई फसल की पर्याप्त आवक शुरू होने से पहले ही ऐसा क्यों हुआ। इंडियन जूट मिल एसोसिएशन (आईजेएमए) ने जेबीए के चेयरमैन मदन गोपाल माहेश्वरी को लिखे पत्र में आरोप लगाया कि प्रकाशित जेबीए दरें बाजार के वास्तविक सौदों को नहीं दर्शाती हैं। मिलों को प्रकाशित दरों की तुलना में तैयार डिलीवरी अनुबंधों के लिए अधिक कीमत चुकाने को मजबूर होना पड़ रहा है, और फिर भी आपूर्ति अक्सर कम रह जाती है।