
कोटा/बाड़मेर। जिन नन्हे हाथों को चुनावी समीकरणों का 'ककहरा' तक नहीं मालूम, उन्हीं हाथों से निकली पर्चियों ने बुधवार को राजस्थान पंचायत चुनाव के कई दावेदारों का भविष्य तय कर दिया। जिला कलक्ट्रेट हॉल में करीब पांच साल के मासूम बच्चों ने लॉटरी के कंटेनर से एक-एक कर पर्चियां निकालीं और बाहर खड़े संभावित प्रत्याशियों व जनप्रतिनिधियों की धड़कनें बढ़ती-घटती रहीं किसी पर्ची से वार्ड का आरक्षण तय हुआ तो किसी ने प्रधान पद की उम्मीदों का गणित बदल दिया। बच्चों के लिए यह खेल था, लेकिन पर्ची खुलते ही बड़े-बड़ों के चेहरे के भाव बदल रहे थे।
करीब पौने चार साल की उशार्वी राठौर एक निजी स्कूल में प्ले ग्रुप में पढ़ती है। लॉटरी के दौरान जब उसे पर्ची निकालने के लिए बुलाया गया तो उसने सहजता से कंटेनर में हाथ डालकर पर्ची निकाल दी। पूछने पर उसने तुतलाते हुए अपना नाम और क्लास तो बता दी, लेकिन लॉटरी के बारे में सवाल होते ही पिता की ओर देखने लगी। उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि उसके हाथ से निकली पर्ची किस वार्ड या पद के लिए आरक्षण की तस्वीर बदलने वाली है। उशार्वी के पिता दीपक साहू जिला कलक्ट्रेट के राजस्व विभाग में कार्यरत हैं।
पांच वर्षीय आदविक मीणा भी पंचायत चुनाव की लॉटरी निकालने के लिए पहुंचा। वह निजी स्कूल में प्री-प्रेप कक्षा में पढ़ता है। पिता ताराचंद मीणा सांख्यिकी विभाग में इंस्पेक्टर हैं। आदविक को इतना जरूर पता था कि उसे कंटेनर से पर्ची निकालनी है, लेकिन यह नहीं मालूम था कि पर्ची किसके लिए है और उससे चुनाव पर क्या असर पड़ेगा। पूछने पर कि उसने किसकी लॉटरी निकाली, उसने मासूमियत से सिर हिला दिया।
बाड़मेर में लॉटरी के समय दो मासूम चेहरे पूरे समय आकर्षण का केंद्र रहे। 9 वर्षीय जया सोनी और 8 वर्षीय मोतीसिंह को यह मालूम नहीं था कि उनके हाथों से निकलने वाली पर्चियां किस जनप्रतिनिधि के चुनावी समीकरण को बदल देंगी। बच्चे बेफिक्र होकर एक के बाद एक पर्चियां निकालते रहे और आसपास बैठे नेता हर पर्ची के साथ अपने राजनीतिक गणित का हिसाब लगाते रहे। बच्चों ने कहा कि इस तरह पर्ची निकालने में बहुत मजा आया। जया सोनी और मोतीसिंह के लिए आरक्षण की पर्ची निकालना महज खेल था, लेकिन सामने बैठे नेताओं के लिए हर पर्ची चुनावी गणित बदलने वाली थी।
जिला परिषद के वार्ड, प्रधान और पंचायत समिति सदस्यों के लिए आरक्षण की लॉटरी के दौरान पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन विभाग ने यह अनूठा तरीका अपनाया। लॉटरी निकालने की जिम्मेदारी ऐसे बच्चों को दी गई, जिन्हें न चुनाव का पता था और ना आरक्षण की राजनीति का। लिहाजा किसी तरह के पक्षपात की गुंजाइश भी नहीं रही। जिला निर्वाचन अधिकारी पीयूष समारिया ने बताया कि पहले भी नगर निगम और नगरपालिकाओं की आरक्षण लॉटरी छोटे बच्चों से ही निकलवाई गई थी। निर्वाचन विभाग का तर्क साफ है-जिसे चुनावी समीकरणों का ‘ककहरा’ भी नहीं मालूम, उसके हाथ से निकली पर्ची पर किसी पक्षपात की आशंका भी नहीं रहती है।