
कोटा. रंग मत डारे सांवरियां..थारो गुजर लड़से.., तम तो हो गया, बांवरा तमारे कई वचार कोणी..., जैसे ठेठ राजस्थानी भाषा के होली गीत इन दिनों शहर की गलियों में सुबह से शाम तक गूंज रहे हैं। एक गीत गाता है, तो दूसरा राजस्थानी ढोल बजाता है। यह जोड़ी शहर में जहां जाती है, राह चलते लोगों के कदम इनको सुनने के लिए थम रहे हैं। यह जोड़ी रिश्ते में जीजा-साले की है। देवपुरा गांव के विकास राणा ने बताया कि प्रतिवर्ष वे होली पूर्व में गीत गाने के लिए जाते हैं। यह परंपरा उनके परिवार में लंबे समय से है, हालाँकि उनको यह नहीं पता कि इसकी शुरुआत कब, कैसे और क्यूं हुई।
यह जोड़ी कोटा संभाग ही नहीं राजस्थान के अन्य शहरों में अलग-अलग क्षेत्र, गली, मोहल्लों में जाकर घर के बाहर होली के गीत गाती है। दोनों की आवाज मधुर है। नाम की है दिलचस्प कहानी ढोल पर साथ देने वाले का नाम नेताजी क्यों है, इसकी भी दिलचस्प कहानी है। नेताजी का जन्म 1990 में तब हुआ जब राजस्थान में भैरोसिंह शेखावत सरकार बनी थी। बस इधर, सरकार बनी और पुत्र जन्म पर परिवार ने नाम नेताजी रख दिया था। तब से यही नाम चला आ रहा।
यहां तक कि स्कूल में भी यही नाम रहा। इनमें जब एक ढोल बजाते थक जाता तो दूसरा इस कार्य को करने लगता व पहला गीत गाने लगता है। रसिया से गूंज उठते गली चौराहे- होली के उत्सवी माहौल में एक महिने पहले से ही गली- मौहल्लो और चौराहों पर चंग बज उठते थे और लोग रसिया गीत से होली के माहौल सराबोर नजर आते बताया जाता है कि मनोरंजन के रूप में यहां नाथा पंडा जिसमें योन कुंठा का विवेचन किया जाता अब यह परम्परा खत्म हो गई लोग मनोरंजन साधन के रूप में होली के दिन कुंठा का विवेचन करते खास बात यह थी कि इस उत्सव में बच्चे, युवा और बुजूर्ग सभी को छूट थी। चहूंओर होली उत्सव में लोग डूबे नजर आते।