
अमन में खलल! - विजय चौधरी
अमन और शांति के लिए जानी जाने वाली हाड़ौती में बंद था। आह्वान विश्व हिंदू परिषद ने किया। गहमागहमी के बीच शहर, कस्बे, गांव बंद भी रहे। छुटपुट विरोध हुआ, मगर बंद बेअसर नहीं रहा। दरअसल इस बंद का सिलसिला पहली जनवरी से ही शुरू हो गया था। उस दिन बूंदी में मौजूद मानधाता छतरी पर आयोजन को लेकर संगठन विशेष के साथ पुलिस-प्रशासन की हुई झड़पों के कारण ये हालात बने। बूंदी में तो दस दिन तक इंटरनेट सेवाएं बाधित रहीं। देसी-विदेशी पर्यटक परेशान हुए। एक सप्ताह तक तो असमंजस बना रहा।
हाड़ौती बंद से हजारों लोग रोजगार से दूर रहे, बच्चे स्कूल नहीं जा सके, ट्रांसपोर्ट सेवाएं भी बाधित रहीं। सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि अधिकांश लोगों को बंद का कारण ही पता नहीं था। कोटा में तो लोग पूरे दिन एक-दूसरे से यही पूछते रहे कि हाड़ौती क्यों बंद है? बूंदी में ऐसा क्या हो गया जो पूरी हाड़ौती के बाजारों पर ताला डल गया? क्या बंद के पीछे कोई सियासत है? भाजपा के शासन में विहिप को बंद का ऐलान ही क्यों करना पड़ा? क्या इस बंद को सरकार की शह थी? यह बंद किसी संप्रदाय के खिलाफ था या सरकार के खिलाफ? जैसे कई सवाल उमड़ घुमड़ रहे हैं। इन प्रश्नों के जवाब कौन देगा, यह तो तय नहीं। इतना जरूर है कि बंद के कारण प्रशासनिक विफलता की पोल खुल गई है। दो वर्गों के बीच दूरियां बड़ी हैं और बेवजह का वैमनस्य पनपा है।
इससे हाड़़ौती अंचल की शांति पर भी बुरा असर हो रहा है। हाड़ौती के कोटा, बूंदी तो ऐसे शहर हैं जो शांत रहने पर ही विकसित हो सकते हैं। अभी कोटा के सौहार्द भरे माहौल के कारण कोचिंग लेने के लिए सवा लाख बच्चे यहां खींचे चले आते हैं। ऐसे ही बूंदी में पेइंग गेस्ट की तरह रहकर सैलानी खुद को महफूज महसूस करते हैं। पूरे क्षेत्र की शांति बनी रहे और यह इलाका प्रगति करता रहे, इसके लिए सरकार को सख्त कदम उठाना चाहिए।