Hindi Diwas Kavita: हिंदी दिवस के इस खास अवसर पर आइए, आज देश के कुछ बेहतरीन साहित्यकारों की कविताओं को पढ़ते हैं, जो न केवल अपने भावों को शब्दों में पिरोते हैं, बल्कि हमारी परंपरा और संस्कृति को भी दर्शाते हैं।
Hindi Diwas Kavita: हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस पूरे देश में उत्साह और गर्व के साथ मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि हर भाषा की आत्मा उसके साहित्य में बसती है, और हिंदी की आत्मा उसकी कविताओं में। यह दिन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उस समृद्ध विरासत को याद करने का अवसर है, जिसे भारत के महान कवियों ने शब्दों में संजोया है।कविताओं की पंक्तियां सिर्फ काव्य नहीं, बल्कि भावनाओं की मशाल हैं, जो हमारी चेतना को रोशन करती हैं। तो इस विशेष अवसर पर आइए, याद करते हैं देश के कुछ शानदार साहित्यकारों को, जिनकी कविताओं को आज भी लोग पढ़ते हैं और सराहना करते हैं।
सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है।
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
जनता? हां, मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली।
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।
जनता? हां, लंबी-बड़ी जीभ की वही कसम,
जनता सचमुच ही, बड़ी वेदना सहती है।
सो ठीक मगर, आखिर इस पर जनमत क्या है?
है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?
मानो जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में।
अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।
लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है।
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है।
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।
अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार
बीता गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं।
यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।
सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो।
अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।
आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।
फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है।
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छांह भी,
मांग मत, मांग मत, मांग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
तू न थकेगा कभी,
तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल।
युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर।
सौरभ फैला विपुल धूप बन
मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन।
दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित,
तेरे जीवन का अणु गल-गल
पुलक-पुलक मेरे दीपक जल।
तारे शीतल कोमल नूतन
माँग रहे तुझसे ज्वाला कण।
विश्व-शलभ सिर धुन कहता मैं
हाय, न जल पाया तुझमें मिल।
सिहर-सिहर मेरे दीपक जल।
जलते नभ में देख असंख्यक
स्नेह-हीन नित कितने दीपक।
जलमय सागर का उर जलता
विद्युत ले घिरता है बादल।
विहंस-विहंस मेरे दीपक जल।
द्रुम के अंग हरित कोमलतम
ज्वाला को करते हृदयंगम।
वसुधा के जड़ अन्तर में भी
बन्दी है तापों की हलचल।
बिखर-बिखर मेरे दीपक जल।
मेरे निस्वासों से द्रुततर,
सुभग न तू बुझने का भय कर।
मैं अंचल की ओट किये हूं।
अपनी मृदु पलकों से चंचल
सहज-सहज मेरे दीपक जल।
सीमा ही लघुता का बन्धन
है अनादि तू मत घड़ियां गिन।
मैं दृग के अक्षय कोषों से
तुझमें भरती हूं आंसू-जल।
सहज-सहज मेरे दीपक जल।
तुम असीम तेरा प्रकाश चिर
खेलेंगे नव खेल निरन्तर।
तम के अणु-अणु में विद्युत-सा
अमिट चित्र अंकित करता चल।
सरल-सरल मेरे दीपक जल।
तू जल-जल जितना होता क्षय,
यह समीप आता छलनामय।
मधुर मिलन में मिट जाना तू
उसकी उज्जवल स्मित में घुल खिल।
मंदिर-मंदिर मेरे दीपक जल
प्रियतम का पथ आलोकित कर।
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
न्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं।
चाह नहीं, प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ॥
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊं।
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढूं, भाग्य पर इठलाऊं॥
मुझे तोड़ लेना वनमाली।
उस पथ में देना तुम फेंक॥
मातृ भूमि पर शीश चढ़ाने।
जिस पथ जावें वीर अनेक॥
जितना कम सामान रहेगा
उतना सफर आसान रहेगा
जितनी भारी गठरी होगी
उतना तू हैरान रहेगा
उससे मिलना नामुमकिन है
जब तक खुद का ध्यान रहेगा
हाथ मिलें और दिल न मिलें
ऐसे में नुकसान रहेगा
जब तक मन्दिर और मस्जिद हैं
मुश्किल में इन्सान रहेगा
‘नीरज’ तो कल यहां न होगा
उसका गीत-विधान रहेगा
तुम्हारे पांव के नीचे कोई जमीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं
मैं बेपनाह अंधेरों को सुब्ह कैसे कहूं
मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं
तेरी जुबान है झूठी ज्म्हूरियत की तरह
तू एक जलील-सी गाली से बेहतरीन नहीं
तुम्हीं से प्यार जतायें तुम्हीं को खा जाएं
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं
तुझे क़सम है खुदी को बहुत हलाक न कर
तु इस मशीन का पुर्जा है तू मशीन नहीं
बहुत मशहूर है आएं जरूर आप यहां
ये मुल्क देखने लायक तो है हसीन नहीं
जरा-सा तौर-तरीकों में हेर-फेर करो
तुम्हारे हाथ में कालर हो, आस्तीन नहीं