- Akhilesh Yadav की गैर मौजूदगी बढ़ा रही सपाइयों की चिंता - बीते तीन हफ्तों से यूपी की सक्रिय राजनीति से दूर हैं अखिलेश यादव- विधानसभा उपचुनाव की तैयारियों में जुटी BSP BJP और Congress
लखनऊ. लोकसभा चुनाव में हार के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती (Mayawati) और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) विधानसभा उपचुनाव (UP Vidhanabha Upchunav 2019) की तैयारियों में जुटी हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी के मुखिया व आजमगढ़ से सांसद अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) गायब हैं। इस बीच अक्सर चहकने वाली उनके ट्विटर की चिड़िया भी 15 जून से खामोश है। चुनाव के बाद से वह बहुत कम ही दिखाई दिये हैं। अब तक वह सिर्फ तीन बार ही संसद पहुंचे हैं। इतना ही नहीं कार्यकर्ताओं ने अखिलेश की अनुपस्थिति ही उनका जन्मदिन बनाया। कहा गया कि वह विदेश में हैं।
भाजपा, कांग्रेस और बसपा उपचुनाव की तैयारियों में व्यस्त हैं। आगामी उपचुनाव में समाजवादी पार्टी की रणनीति क्या होगी? सपा कार्यकर्ताओं को अभी पार्टी आलाकमान के दिशा-निर्देशों का इंतजार है। हालांकि, लंबे अंतराल के बाद अखिलेश यादव मंगलवार को लखनऊ वापस लौट आये। माना जा रहा कि एक-दो दिन वह पार्टी कार्यालय में बैठेंगे। कार्यकर्ताओं से मिलकर विधानसभा उपचुनाव की तैयारियों में जुट जाएंगे।
सपा का ट्विटर हैंडल एक्टिव
अखिलेश यादव की गैरमौजूदगी में समाजवादी पार्टी के ट्विटर हैंडल ने मोर्चा संभाल रखा है। यहां अखिलेश यादव के हवाले से कई खबरें ट्वीट की जाती रही हैं। अखबारों की कटिंग और पार्टी के कार्यक्रमों भी जानकारी तस्वीर सहित ट्विटर हैंडल पर शेयर की जाती रही है।
इस सदमे से अभी तक नहीं उबरे हैं अखिलेश!
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो अखिलेश यादव को लोकसभा चुनाव में हार से इतना सदमा नहीं लगा, जितना कि मायावती के आरोपों से। पिता और परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर उन्होंने बसपा से गठबंधन किया था, लेकिन चुनाव परिणाम के बाद मायावती ने अलग उपचुनाव लड़ने का एलान कर सियासी गलियारों में हड़कम्प मचा दिया।
लोकसभा चुनाव 2019 में सपा
2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा और रालोद मिलकर चुनाव लड़ा। यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से 37 सीटों पर सपा, 38 सीटों पर बसपा और तीन सीटों पर रालोद ने चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में सपा को 2014 के बराबर ही पांच सीटें मिलीं, लेकिन पिछले आम चुनाव में शून्य पर सिमटी बसपा को इस बार 10 सीटों का फायदा हुआ। हालांकि, रालोद एक बार फिर खाता खोलने में नाकाम रही।