उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव लगातार चार चुनाव हारने के बाद अब अपने पिता मुलायम सिंह यादव की बनाई रणनीति पर चलने को मजबूर हो गए हैं। इसी रणनीति से एक मुलायम सिंह यादव एक बार मुख्यमंत्री भी बनें थे। अब अखिलेश यादव ने भी आगामी लोकसभा चुनावो से इसी रणनीति को साधते हुए आगे बढ्ने की योजना बनाई है। जबकि अखिलेश यादव को दोबारा सीएम बनने से पहले लोकसभा चुनाव 2024 की कड़ी परीक्षा से इसी रणनीति से गुजरना होगा ।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी पिछली हार से सबक लेते हुए अपने पिता मुलायम सिंह यादव के नक्शे कदम पर चल पड़े हैं। इसे लेकर वो रणनीति बनाने में जुट गए हैं, इसका अंदाजा उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने वाले दिन के भाषण से लगा सकते हैं, जिसमें उन्होने मायावती से गठबंधन करने और उसके टूटने का ज़िक्र किया था। उसके बावजूद भी उन्होने दोषी मायावती को नहीं बताया, बल्कि सारा दोष भाजपा सरकार पर मढ़ दिया। अखिलेश यादव ने भाजपा पर कमेन्ट करते हुए मंच से कहा था कि, वो आरक्षण को खत्म करना चाहते हैं, वो दलितों, पिछड़ों को उनका अधिकार नहीं देना चाहते हैं। वो मुस्लिमों से लड़ाई करवाकर तुष्टीकरण को बढ़ावा देते हैं।
अखिलेश यादव ने इतना भाषण देने के बावजूद कहीं भी कहीं अपनी दुखती हुई नस यानि मायावती से टूटे गठबंधन पर कुछ नहीं कहा। क्योंकि लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी बेहतर प्रदर्शन के लिए ओबीसी और एसटी वोटर को एकजुट करना चाहती है। लोहियावादी और अंबेडकरवादी लोगों को एक साथ लाकर ही 2024 में सत्ता हासिल हो सकती है। रमाबाई मैदान से अपने पिता के जैसे पुराने अंदाज से अखिलेश यादव ने कहा कि, सत्ता हासिल करने के लिए पिछड़ो, दलितों और हाशिये पर गए लोगों की मजबूत भागीदारी जरूरी है।
मुस्लिम वोटर्स को जोड़ने के मकसद से अधिवेशन के समय अखिलेश यादव की बातों का समर्थन करते हुए सपा नेता मौलाना इकबाल कादरी ने हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा कि, मदरसों से बहुत सारे बड़े नेता समाज सुधारक और अधिकारी बनते हैं। मदरसों में पढ़ने वाले तमाम लोगों को दूसरों के बहकावे में आने की जरूरत नहीं है। सपा ने ये तय किया है कि निकाय चुनाव में संगठन में दलित और मुसलमानों को तवज्जो दी जाएगी। तो हमें इंका साथ देना होगा।
आपको बताते चलें कि, समाजवादी पार्टी में तीसरी बार अखिलेश यादव अध्यक्ष के तौर पर चुने गए हैं। 2012 में मुख्यमंत्री बनने वाले अखिलेश यादव अब तक तीन बड़े चुनाव हार चुके हैं। जिसमें 2014 लोकसभा, 2017 यूपी विधानसभा चुनाव, 2019 लोकसभा चुनाव, 2022 विधानसभा चुनाव इनके अलावा यूपी के पिछले निकाय चुनावों में अखिलेश यादव ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था। लेकिन अब दलित, पिछड़ा और मुस्लिमों की रणनीति पर अखिलेश यादव ने काम शुरू कर दिया है। जिसमें उनके पास पहली चुनौती यूपी में निकाय चुनाव और फिर लोकसभा चुनाव 2024 होंगे।