
UP Assembly Election 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां अभी से तेज हो गई हैं। इस बार के चुनावी मुकाबले में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में पांच सीटें जीतने के बाद अब ओवैसी की नजर पूरी तरह से उत्तर प्रदेश पर टिक गई है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार की तर्ज पर यूपी में भी ओवैसी अपनी राजनीतिक ताकत दिखा पाएंगे? क्या वह मुस्लिम बहुल सीटों पर समाजवादी पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाकर विपक्षी गठबंधन का चुनावी गणित बिगाड़ सकते हैं?
AIMIM की ओर से भाजपा विरोधी दलों के साथ गठबंधन की लगातार कोशिशें की जा रही हैं लेकिन सपा प्रमुख अखिलेश यादव फिलहाल ओवैसी को अपने साथ लाने के पक्ष में बिल्कुल नजर नहीं आ रहे हैं। कांग्रेस और सपा दोनों ही AIMIM से पूरी तरह दूरी बनाए हुए हैं। ऐसे में ओवैसी के सामने उत्तर प्रदेश में अपनी अलग राजनीतिक जमीन तैयार करने की एक बहुत बड़ी चुनौती है। बिहार चुनाव से पहले भी AIMIM को गठबंधन में जगह नहीं मिली थी जिसके बाद पार्टी ने अकेले चुनाव लड़कर पांच सीटों पर जीत दर्ज की थी। सपा को अब यूपी में भी इसी बात का डर सता रहा है।
बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियों में बहुत अंतर है। बिहार के सीमांचल में मुस्लिम आबादी कुछ गिने-चुने जिलों में बहुत घनी है जिससे AIMIM को वहां एक मजबूत क्षेत्रीय आधार मिल गया। वहीं, उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता पश्चिमी यूपी, रोहिलखंड, अवध और पूर्वांचल के कई अलग-अलग जिलों में बिखरे हुए हैं। यूपी में मुस्लिम मतदाताओं का कोई एक ऐसा विशेष क्षेत्र नहीं है जहां ओवैसी को सीमांचल जैसी एकजुट जमीन मिल सके। इसके अलावा 2022 और 2024 के चुनाव के बाद सपा ही मुसलमानों की पहली पसंद बनकर उभरी है।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने मुख्य वोट बैंक को बचाए रखने की है। मुस्लिम मतदाताओं के बीच सपा की बहुत मजबूत पकड़ है। अखिलेश यादव को लगता है कि अगर एआईएमआईएम को गठबंधन में शामिल किया गया तो वह अपने ही घर में एक नए राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को खड़ा कर लेंगे। सपा की रणनीति यही है कि भाजपा को हराने के लिए मुस्लिम मतदाता एकजुट होकर सिर्फ समाजवादी पार्टी को ही वोट दें।
उत्तर प्रदेश में AIMIM और बहुजन समाज पार्टी (BSP) के बीच संभावित गठबंधन को लेकर भी सियासी गलियारों में काफी चर्चा है। इसे दलित मुस्लिम या 'भीम मीम' समीकरण के तौर पर देखा जा रहा है। इसका मकसद दलित और मुस्लिम मतदाताओं को एक मंच पर लाकर भाजपा और सपा के सामने तीसरा बड़ा विकल्प तैयार करना है। हालांकि, बसपा सुप्रीमो मायावती की ओर से अभी तक इस पर कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला है। मायावती फिलहाल अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति पर ही चल रही हैं। दलित और मुस्लिम वोटों का एकमुश्त ट्रांसफर होना भी इतना आसान नहीं है।
बिहार का चुनाव यह साफ बताता है कि किसी पार्टी को अपनी ताकत दिखाने के लिए पूरे राज्य में मजबूत होने की जरूरत नहीं होती। यदि किसी खास इलाके में उसका प्रभावशाली वोट बैंक है तो वह कई सीटों के नतीजे पलट सकती है। यूपी में ओवैसी के सामने यही रणनीति अपनाने की चुनौती होगी। अगर AIMIM मुस्लिम बहुल सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारती है तो वह सपा की जीत की संभावनाओं को जरूर प्रभावित कर सकती है। अब देखना दिलचस्प होगा कि 2027 में यूपी का मुस्लिम वोटर अखिलेश के साथ खड़ा रहता है या फिर ओवैसी को एक नए विकल्प के रूप में चुनता है।