IAS Abhishek Prakash Big Court Decision : लखनऊ हाईकोर्ट ने सोलर प्रोजेक्ट से जुड़े चर्चित भ्रष्टाचार मामले में निलंबित आईएएस अभिषेक प्रकाश को बड़ी राहत दी है। अदालत ने चार्जशीट, तलबी आदेश और आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। शिकायतकर्ता द्वारा गलती मानने के बाद केस खत्म हुआ, जिससे उनकी बहाली की संभावनाएं अब तेज हो गई हैं।
IAS Abhishek Prakash as High Court Quashes Corruption Case: उत्तर प्रदेश की नौकरशाही से जुड़ा एक चर्चित मामला कानूनी मोड़ पर समाप्त होता दिख रहा है। लखनऊ हाईकोर्ट ने सोलर प्रोजेक्ट से जुड़े कथित रिश्वत प्रकरण में निलंबित आईएएस अधिकारी अभिषेक प्रकाश के खिलाफ दर्ज आपराधिक केस को रद्द कर दिया है। अदालत के इस फैसले के बाद प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है और उनकी सेवा में संभावित बहाली को लेकर चर्चाएँ शुरू हो गई हैं। यह मामला बीते महीनों में राज्य की नौकरशाही को झकझोर देने वाले प्रकरणों में गिना जा रहा था। अब न्यायालय के आदेश के बाद स्थिति पूरी तरह बदलती नजर आ रही है।
यह प्रकरण एक सोलर मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट से जुड़ा था, जिसमें कथित रूप से कमीशन या रिश्वत मांगने के आरोप लगाए गए थे। शिकायत के आधार पर 20 मार्च 2025 को एफआईआर दर्ज की गई थी। बाद में इस मामले की जांच एसटीएफ (स्पेशल टास्क फोर्स) को सौंपी गई थी। जांच के बाद 15 मई 2025 को चार्जशीट दाखिल की गई और 17 मई को संबंधित अदालत ने तलबी आदेश जारी किया था। यह घटनाक्रम प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया था।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि दर्ज तथ्यों के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) के तहत अपराध बनना स्थापित नहीं होता। अदालत ने यह भी माना कि आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे। महत्वपूर्ण बात यह रही कि शिकायतकर्ता की ओर से अदालत में यह स्वीकार किया गया कि शिकायत ‘गलतफहमी’ में दर्ज हुई थी। इसी आधार पर न्यायालय ने एफआईआर से उपजे आपराधिक कार्यवाही को निरस्त किया।15 मई 2025 की चार्जशीट रद्द की ,17 मई का तलबी आदेश भी निरस्त कर दिया। अदालत के इस आदेश के बाद संबंधित आपराधिक कार्यवाही विधिक रूप से समाप्त मानी जाएगी।
इस केस में आईएएस अधिकारी अभिषेक प्रकाश के साथ निकांत जैन का नाम भी जुड़ा था। हाईकोर्ट के फैसले से दोनों को कानूनी राहत मिली है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि जब उच्च न्यायालय किसी मामले में प्रथम दृष्टया अपराध न बनने की बात स्वीकार कर लेता है, तो वह संबंधित अधिकारियों के लिए बड़ी राहत मानी जाती है।
सूत्रों के अनुसार, जांच में कथित कमीशन मांग से जुड़े आरोपों को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेजी या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके। अदालत ने यह भी माना कि आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों के बीच स्पष्ट कानूनी आधार स्थापित नहीं हुआ। हालांकि, अदालत ने अपने आदेश में तथ्यों के कानूनी पहलू पर विचार किया, न कि प्रशासनिक निर्णयों की वैधता पर।
मामला समाप्त होने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल अभिषेक प्रकाश की प्रशासनिक स्थिति को लेकर उठ रहा है। चूँकि वे निलंबन की स्थिति में थे, ऐसे में विभागीय स्तर पर उनकी बहाली पर विचार किए जाने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, अंतिम निर्णय राज्य सरकार के स्तर पर लिया जाएगा। प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि कोर्ट के आदेश की प्रति मिलने और विधिक राय लेने के बाद आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी।