यहां सवाल यह है कि क्या मोदी का करिश्मा उस गुस्से को शांत कर सकता है जो 2014 के आम चुनाव में उनके द्वारा दो करोड़ नौकरियां देने के वादे को पूरा न कर पाने की वजह से उठा है।
लखनऊ. उत्तर प्रदेश में भाजपा के महासचिव विजय बहादुर पाठक ने एक बयान में पीएम मोदी के लिए एक नई लाइन इजात करते हुए कहा, "अबकी बार, फिर से मोदी सरकार।" उन्होंने कहा कि बीजेपी इस बार भी चुनाव जीतेगी क्योंकि कोई अन्य पार्टी बीजेपी से ज्याद मेहनती नहीं हैं और न ही कोई नेता है जो मोदी से ज्यादा मेहनत करता हो। पाठक ने कहा कि 2019 के आम चुनाव से महीनों पहले भाजपा जमीनी स्तर पर देश के सबसे अधिक आबादी वाले और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में प्रचार करने जा रही है।
उन्होंने कहा कि राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे राजनीतिक प्रतिद्वंदी मोदी के सामने कुछ नहीं हैं। पीएम मोदी ने यूपी में संत कबीर के पूर्वी जिले में 28 जून को अपनी पहली चुनाव रैली को संबोधित किया था, जबकि तथाकथित विपक्षी दलों का गठबंधन अभी भी जूझ रहा है। उन्होंने कहा, "कुछ नेता छुट्टियां व विदेश यात्राएं कर रहे हैं, लेकिन पीएम मोदी साल के हर दिन काम करते हैं।" यहां सवाल यह है कि क्या मोदी का करिश्मा उस गुस्से को शांत कर सकता है जो 2014 के आम चुनाव में उनके द्वारा दो करोड़ नौकरियां देने के वादे को पूरा न कर पाने की वजह से उठा है। एक अन्य सवाल यह भी है कि क्या उनका हिंदुत्व एजेंडा, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के दलितों और पिछड़े वर्गों के जाति समीकरण को हरा सकता है।
उपचुनाव में मिली हार, लेकिन 2019 के लिए भाजपा तैयार-
मायावती और अखिलेश के साथ आने के बाद बीजेपी ने यूपी में तीन उप-चुनाव में हार का सामना करना पड़ा, लेकिन पार्टी कार्यकर्त इस सोच में पड़े हैं कि क्या ये दोनों आम चुनाव में भी ऐसा ही जादू बिखेर पाएंगे। भाजपा के लिए 2019 चुनाव की राह इतनी आसान नहीं होगी, लेकिन मोदी भी भाजपा का दोबारा परचम लहराने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। वहीं पिछले महीने में उनके भाषणों और सार्वजनिक उपस्थितियों के विश्लेषण से 2019 के लिए सत्तारूढ़ पार्टी की चुनाव रणनीति की एक झलक तो साफ दिख चुकी है। यह साफ इंगित करता है कि 2019 के लिए ईमानदारी से अभियान शुरू हो गया है।
पांच हफ्तों में, मोदी ने किया पांच बार यूपी का दौरा-
पिछले पांच हफ्तों में, मोदी ने पांच बार यूपी का दौरा किया है, हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं की शुरूआत की, किसानों की रैली को संबोधित करते हुए कई उपलब्धियों का दावा किया है। किसी भी पिछली सरकार की तुलना में दोगुनी गति से सड़कों का निर्माण कराया, चार करोड़ महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन प्रदान किया, जिनमें यूपी की 80 लाख महिलाएं शामिल हैं, वहीं यूपी के गांवों में एक करोड़ से अधिक शौचालय बनवाए।
गठबंधन पर हमला-
पिछले महीने मोदी ने यूपी में अपने भाषणों में बार-बार गठबंधन पर हमला किया। संत कबीर नगर में मोदी ने कहा कि सत्ता के लिए लालच इतना है कि उस समय जिसने आपातकाल लगाया था और जो लोग इसका विरोध करते थे, वे आज सत्ता हासिल करने के लिए कंधे से कंधे मिलाकर चल रहे हैं। शाहजहांपुर में उन्होंने कहा कि जब दल के साथ दिल मिलते हैं तो दल दल हो जाता है। और जितना जयादा दल दल होता है, उतना ही अच्छा कमल खिलता है।
भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है यूपी-
2014 में चुनाव मोदी के पीएम पद के उम्मीदवार के रूप में, बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने यूपी में 80 में से 73 सीटों पर शानदार जीत हासिल की। रामजन्मभूमि आंदोलन के दौर भी 1991 में हुए आम चुनाव में भाजपा ने 51 सीटें जीती थी।
2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में मोदी के नेत्रत्व में भाजपा ने 403 विधानसभा सीटों में से 325 सीटों पर फतह हासिल की। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद 1993 के यूपी चुनाव में बीजेपी ने 221 सीटें हासिल की थी। 2014 चुनाव में वाराणसी में सपा, बसपा, कांग्रेस और आप के संयुक्त वोटों से भी लगभग दोगुना वोट (5,16,593) हासिल करने वाली भाजपा के लिए आगामी चुनाव में तारकीय प्रदर्शन से कुछ भी कम करना पार्टी व मोदी के लिए एक झटके के बराबार होगा।
भाजपा के पाठक ने यह कहने से इंकार कर दिया कि सपा और बीएसपी के गठबंधन ने बीजेपी को झटका दिया था, लेकिन उन्होंने यह जरूर कहा कि उनकी पार्टी भविष्य में गठबंधन को ध्यान में रखते हुए रणनीति बना रही थी। "एक जीत एक जीत है और हार एक हार है," उन्होंने कहा। "हम जानते हैं कि एक समस्या है और हम इसे ठीक कर सकते हैं।"
जहां कैराना और फूलपुर बीजेपी के परंपरागत गढ़ नहीं हैं, गोरखपुर 90 के दशक से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का निर्वाचन क्षेत्र था। कुछ बीजेपी कार्यकर्ता सभी तीन निर्वाचन क्षेत्रों, फूलपुर (38%), गोरखपुर (43%) और कैराना (54%) में कम मतदान को उप-चुनाव में हार की वजह बताते हैं। कैराना में नुकसान के बावजूद, बीजेपी ने लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में पांच विधानसभा क्षेत्रों में से दो में जीत हासिल की।
लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर रमेश दीक्षित का कहना है कि, मोदी दीवार पर लेखन देख सकते हैं। उन्होंने रोजगार, विनिर्माण, औद्योगिकीकरण का वादा पूरा न करके लोगों को नाराज किया है, किसान गुस्से में हैं। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण एक समय के बाद काम नहीं करता है। उन्होंने कहा, "बीजेपी को डर है। आप देख सकते हैं कि यूपी में मोदी काफी समय बिता रहे हैं और बिताएंगे।"
सपा-बसपा का क्या होगा आगे-
सपा-बसपा गठबंधन भाजपा के लिए खतरनाक है, दोनों पक्षों ने लगातार तीन उप-चुनावों में बीजेपी को हराया है, फिर भी एक सवाल है कि क्या वे आम चुनाव में जीत का गठबंधन तैयार कर सकते हैं। अपना नाम न बताने की शर्त पर सपा के एक नेता ने कहा कि गठबंधन अभी सिर्फ एक हवा हवाई बात है, इसमें कुछ भी स्पष्ट नहीं है। लेकिन यह होगा और यह सफल रहेगा क्योंकि बीजेपी के खिलाफ लोगों का गुस्सा वास्तविक है। मोदी के लखनऊ दौरे पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए, लेकिन उनके जाने के एक दिन बाद यहां बारिश हुई और शहर में पानी की समस्य बढ़ गई। लखनऊ में तस्वीर देखने लायक थी और लोग इसकी वजह से गुस्से में थे। उन्होंने आगे कहा कि "गठबंधन को मोदी के खिलाफ जाने के लिए एक चेहरे की जरूरत है। जिन लोगों से मैं बात करता हूं वे कहते हैं कि वे एक नया चेहरा चाहते हैं, कांग्रेस की तरफ से।"
बसपा ने कहा ये-
बुंदेलखंड क्षेत्र के माणिकपुर के पूर्व बीएसपी नेता चंद्रभान सिंह पटेल ने कहा कि पार्टी कार्यकर्ता आदेशों का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "हम बसपा राष्ट्रीय नेतृत्व के अनुरूप काम करेंगे, लेकिन अभी गठबंधन की बात तक नहीं हुई है। "हमें गठबंधन की ज़रूरत क्यों है? बीएसपी भाजपा को अपने आप ही हरा सकती है।"
2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने एक भी सीट नहीं जीती, जब्कि सपा ने उत्तर प्रदेश में पांच सीटें जीतीं। बीएसपी का वोट शेयर 2009 में 27.42 प्रतिशत से घटकर 2014 में 19.63% हो गया था, जबकि बीजेपी को वोट प्रतिशत 17.5 से बढ़कर 42.34 प्रतिशत हो गया। सपा का वोट शेयर 22.35 से 23.26 प्रतिशत बढ़ा था।
सपा-बसपा के लिए चुनौती-
यदि सपा और बसपा एक साथ रहते हैं, तो उनके लिए अन्य बाधाएं भी हैं, जिनमें लोकसभा सीटों को बांटना, कार्यकर्ताओं को अपने पारंपरिक दुश्मनों के लिए प्रचार करना और मतदाताओं को अपने वोटों को दूसरी पार्टी के प्रत्याशी को ट्रांफसर करने जैसी चुनौती शामिल है। बसपा और कांग्रेस मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए सीट साझा करने से पहले ही शर्तों के दौर से गुजर रहे हैं। वैसे तो यह लोकसभा चुनाव है, और क्षेत्रीय दलों के लिए सीट साझा करने की व्यवस्था करना आसान हो सकता है, लेकिन वास्तविक परीक्षण वोटों का एक-दूसरे के लिए ट्रांसफर करना बड़ी चुनौती है।
दोनों पार्टियां ऐसे आईं साथ-
1993 में सपा और बसपा पहली बार भाजपा को यूपी में रोकने के लिए साथ आए थे, लेकिन 1995 में मायावती ने गठबंधन तोड़ दिया था। इसके बाद गेस्ट हाउस कांड कौन भूल सकता है। आज दो दशकों के बाद भी उसकी बात कभी मायावती द्वारा तो कभी गठबंधन को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करती भाजपा द्वारा दोहरा ही दी जाती है।
1995 से 2002 के बीच, मायावती भाजपा के समर्थन से तीन बार मुख्यमंत्री बनीं। फिर 1999 में जब केंद्र में वाजपेयी सरकार गिर गई थी, तो मुलायम सिंह यादव ने पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की 272 से अधिक सीटों की वाली घोषणा को बाद कांग्रेस को साथ छोड़ दिया था। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा ने फिर गठबंधन किया और उसका अंजाम सबके सामने है।
लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति प्रोफेसर दीक्षित का मानना है कि दो क्षेत्रीय दल अपने मतभेदों को पीछे छोड़ सकते हैं। "मायावती गोरखपुर और फुलपुर नहीं गई, लेकिन अखिलेश यादव गए, वहीं बीएसपी कार्यकर्ताओं ने सपा के लिए प्रचार भी किया। अखिलेश यादव कैराना नहीं गए, लेकिन सपा कार्यकर्ताओं ने आरएलडी के लिए प्रचार किया। दीक्षित ने आगे कहा कि "जब लोग गुस्सा होते हैं, तो वो बीजेपी को हराने के लिए कोई न कोई बहाना ढूंढ ही लेंगे। 2014 में लोगों ने मोदी के लिए नहीं बल्कि कांग्रेस को हराने के लिए वोट किया था। 2019 में वही वोट भाजपा के खिलाफ होगा।"
लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर आशुतोष मिश्रा ने कहा, "बीएसपी ने पिछले कुछ महीनों में सपा के साथ काम करने से क्या हासिल किया है। सिर्फ एक एमएलसी सीट। तो, लाभान्वित कौन है?" उन्होंने कहा, "अखिलेश यादव जो भी ऑफर देंगे, मोदी उसमें उनसे ज्यादा ही देंगे"।