
पत्रिका इनडेप्थ स्टोरी
लखनऊ. योगी आदित्यनाथ सरकार ने प्रदेश में अवैध बूचडख़ाने बंद करा दिए। अब इसकी वजह से लावारिस हो गए गोवंश खुद सरकार के लिए परेशानी का सबब बन गए हैं। बड़ी तादात में गोवंश सडक़ पर आ गए हैं। अब मुख्यमंत्री अपील कर रहे हैं कि संत समाज और अन्य लोग सामने आएं। वे गोवंश की रक्षा के लिए गोशालाएं बनाएं। सभी जिलों में हजारों की संख्या में आवारा घूम रहे अन्ना जानवरों के लिए सरकारी खर्च पर इतने अभयारण्य बनाया जाना संभव नहीं है। इसलिए आमजन की भागीदारी का आह्वान किया जा रहा है। मुख्यमंत्री का कहना है कि अयोध्या हो कोई और शहर सडक़ों पर गायें लावारिस होकर क्यों घूमती हैं? साधु संत इसमें भी आगे आएं। सभी साधु और संत गोशाला बनाएं और 5-10 गायें जरूर पालें। संत समाज गो समिति बनाए और हर गृहस्थ से एक गो माता का खर्च दान में ले। सवाल है क्या हर गृहस्थ इसके लिए तैयार होगा जब जिला पंचायतों और नगर निगमों के कई बार के टेंडर निकालने के बाद गोशालाओं के संचालन के लिए स्वंयसेवी संस्थाएं या लोग सामने नहीं आ रहे हैं। कुल मिलाकर गोवंश बचाने का बहुत शोर है लेकिन गोरक्षक सामने नहीं आ रहे।
गोशालाओं का संचालन बड़ी समस्या
आवारा गाय-बैल और सांड़ हर दिन दर्जनों दुर्घटना की वजह बन रहे हैं। इसलिए योगी सरकार सभी नगर पंचायत और बड़े पंचायतों में गोशालाएं खोल रही है। डीएम के नेतृत्व में बनी समितियां इसे चलाएंगी। लेकिन इसके संचालन के लिए कोई सामने नहीं आ रहा है। पीलीभीत, लखीमपुरखीरी, लखनऊ, बाराबंकी, इलाहाबाद सहित कई जिलों में बीते एक पखवाड़े में आवारा पशुओं से टक्कर से दर्जन भर से ज्यादा एक्सीडेंट हो चुके हैं। इन दुर्घटनाओं में आधा दर्जन से ज्यादा की मौत और कई दर्जन से ज्यादा लोग घायल हो गए। बाराबंकी में तो हाई वे पर एक गाय को बचाने के चक्कर में पूरी गाड़ी ही नहर में गिर पड़ी और पांच लडक़ों की मौत हो गई। सरकार ने ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ जुर्माने का नियम लागू किया है, जिससे लोग अपने पालतू पशुओं को सडक़ों पर ना छोड़ें। लेकिन कितने लोगों से यह जुर्माना वसूला गया इसका भी कोई आंकड़ा नहीं है।
सरकारी प्रयास नाकाफी
राज्य सरकार घुमंतू जानवरों के संरक्षण के लिए गो-सदन खोल रही है। एक गोसदन के लिए करीब 15 लाख दिए जा रहे हैं। लेकिन यह पशु राहत केंद्र नाकाफी साबित हो रहे हैं। कुल मिलाकर सरकारी कार्यक्रमों की उपलब्धियों की कागज़ी फेहरिस्त तो लंबी चौड़ी है लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसका असर न के बराबर है। मुख्यमंत्री के आदेश पर प्रमुख सचिव ने एक आदेश जारी किया था। जिसके तहत 10 दिन के भीतर सभी नगर निगमों को एक विशेष अभियान चलाकर सडक़ पर घूमने वाली आवारा गायों को पकड़ कर गोशाला पहुंचाना था। इसके तहत कितनी गाएं पकड़ी गयीं, इसका कोई आंकड़ा सरकार के पास नहीं है।
कांजी हाउसों के पास बजट नहीं
लावारिश गायों और सांड़ों को नगर निगम या पंचायतों के पास इन्हें रखने का कोई स्थायी ठिकाना नहीं है। कांजी हाउस हैं लेकिन इनके पास कोई बजट नहीं है। लिहाजा चारे की समस्या के चलते नगर निगम इन्हें पकड़ता है, लेकिन उन्हें फिर छोडऩा पड़ता है क्योंकि ना तो उनके पास इतनी जगह ना ही इतना चारा।
सडक़ दुर्घटनाओं का बड़ा कारण
हाल ही की घटना है। बांदा के नरैनी ब्लॉक के कालिंजर निवासी दादू और प्रदीप कुमार की 'अन्ना पशुओं' को बचाने के चक्कर में जान चली गई। एक बस की टक्कर में दोनों की मौके पर ही मौत हो गयी। यह एक शहर की बात नहीं है। हर शहर में अन्ना पशुओं के कारण आए दिन हादसे हो रहे हैं। सडक़ों पर अवारा पशुओं के घूमने और बेफिक्र बैठने से जाम की समस्या खड़ी हो रही है।
गांवों में हिंसक हुए गोवंश, ले रहे जान
गांवों में तो और बुरा हाल है। किसान पशुओं को पास के जंगल या फिर रात के अंधेरे में अन्य गांवों में छोड़ आते हैं, इन पशुओं को 'अन्ना पशु' कहा जाता है। इन अन्ना पशुओं काझुंड एकाएक खड़ी फसलों पर धावा बोलता है। देखते ही देखते फसलें चट कर ली जाती हैं। फसल बचाने के चक्कर और पशुओं को भगाने में अन्ना पशुओं हमले में किसान घायल हो रहे हैं। उन्हें दोहरा नुकसान हो रहा है।
लड़ाई-झगड़े की वजह
दूसरे के खेतों को चरते और सडक़ों पर घूमते हैं अन्ना पशुु। इससे आए दिन एक दूसरे गांव के बीच झगड़े हो रहे हैं। पशुओं को खुला छोड़ देने पर खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद हो रही हैं। ये खेतों में बची फसलों को साफ़ कर रहे हैं। किसान को अपनी फसलें बचाने के लिए दोहरी मेहनत करनी पड़ रही है। पहले वे नील गायों से जूझते थे अब लाठियां लेकर अन्ना पशुओं को एक गांव से दूसरे गांव भगाने के लिए जूझते हैं। ऐसे में एक-दूसरे गांव के बीच मनमुटाव भी बढ़ा है।