1970–80 के दशक में चंबल की बीहड़ों से उभरी फूलन देवी को ‘बैंडिट क्वीन’ कहा गया। बाद में उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़ा, जेल से बाहर आकर लोकतांत्रिक राजनीति में कदम रखा और समाजवादी पार्टी से सांसद बनीं।
Phoolan Devi Story: चंबल की बीहड़ घाटियां आज भी फूलन देवी के नाम से कांपती हैं। 1970 के दशक में एक पतली-दुबली लड़की राइफल कंधे पर टांगे, लाल साड़ी में घूमती थी। आंखों में आग, आवाज में गुर्राहट। पुलिस के लिए वह सबसे खतरनाक डकैत थी, जिसका इनाम लाखों में था। अमीर जमींदारों और ठाकुरों के लिए मौत का दूसरा नाम। फूलन देवी-चंबल की खुंखार बैंडिट क्वीन!
गांव से बीहड़ तक का सफर शुरू हुआ अपमान से। ठाकुर डाकुओं श्रीराम और लालाराम ने उसके साथी विक्रम मल्लाह को मार डाला और फूलन को बेहमई गांव में बंधक बनाकर दिनों तक सामूहिक अत्याचार किया। जब वह छूटी, तो उसकी आंखों में सिर्फ बदला था। अपना गिरोह बनाया। सब मल्लाह और पिछड़े जाति के डाकू। वे रातोंरात गांवों पर धावा बोलते, ठाकुरों के घर लूटते, पुलिस थानों को चुनौती देते। फूलन की बंदूक कभी खाली नहीं होती थी। गरीबों को लूट का माल बांटती, लेकिन दुश्मनों पर कोई रहम नहीं।
सबसे खूंखार वार 14 फरवरी 1981 को बेहमई में हुआ। फूलन अपने गिरोह के साथ गांव पहुंची। पूरे गांव के ठाकुर पुरुषों को लाइन में खड़ा किया। चिल्लाई “ये वो हैं जिन्होंने मुझे जिंदा जलाया था!” फिर गोलीयों की बौछार। 22 लाशें एक साथ गिरीं। पूरे देश में सनसनी। पुलिस ने हजारों जवानों के साथ बीहड़ घेर लिए, लेकिन फूलन फुर्र हो जाती। वह चंबल की रानी बन चुकी थी -खुंखार, बेरहम, अजेय।
1983 में इंदिरा गांधी की अपील और मध्यप्रदेश के सीएम अर्जुन सिंह के सामने फूलन ने शर्तों के साथ सरेंडर किया। 11 साल जेल में रहीं, जहां 48 केस चलते रहे। 1994 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने केस वापस लिए और वे रिहा हुई। जेल से निकलकर फूलन ने नया जीवन चुना, उम्मेद सिंह से शादी की और 1996 में समाजवादी पार्टी से मिर्जापुर की सांसद बनीं। गरीबों, दलितों और महिलाओं की आवाज बनीं, लेकिन बदले की आग कभी नहीं बुझी। फूलन देवी को 25 जुलाई 2001 को दिल्ली में उसके घर के गोली मारकर हत्या कर दी गई।