
UP Assembly Election 2027: पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के नवनियुक्त कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष एवं सांसद इमरान मसूद और सपा सांसद इकरा हसन के बीच चल रही सियासी बयानबाजी को सिर्फ दो नेताओं की अदावत के तौर पर देखना अधूरा होगा। इसके पीछे आगामी विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस के बीच पश्चिमी यूपी की सीटों का बंटवारा और दोनों दलों की अलग-अलग राजनीतिक जमीन का सवाल है। दरअसल कांग्रेस की ओर से पूर्व सांसद अमीर आलम और उनके बेटे पूर्व विधायक नवाजिश आलम को अपने साथ जोड़ना इस खींचतान को सहारनपुर से आगे शामली-मुजफ्फरनगर के इलाके तक ले गया है।
यही वह केंद्र है जहां इमरान मसूद बनाम इकरा हसन की लड़ाई का नया राजनीतिक अर्थ निकलता है। गत लोकसभा चुनाव में सहारनपुर से इमरान मसूद और कैराना से इकरा हसन जीतकर आए। मुजफ्फरनगर से भी सपा के हरेंद्र मलिक ने जीत दर्ज की। हालांकि विधानसभा का भूगोल इन लोकसभा नतीजों से अलग है। पिछले विधानसभा चुनाव में कैराना सीट सपा के पास थी, जबकि थाना भवन और शामली आरएलडी ने जीती थीं और बुढ़ाना भी आरएलडी के खाते में गया था। सहारनपुर की कई विधानसभा सीटों पर सपा और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला रहा था।
अर्थात आगामी विस चुनाव के लिए दोनों दलों के सामने सवाल यह नहीं है कि पश्चिमी यूपी में किसका एक चेहरा बड़ा है, बल्कि यह है कि गठबंधन हुआ तो किस दल की मौजूदा विधानसभा जमीन को कितनी सीटों में बदला जाएगा।
गत लोकसभा चुनाव में कैराना में इकरा हसन को 5 लाख से ज़्यादा वोट मिले और उन्होंने भाजपा के प्रदीप कुमार को 69 हज़ार से ज़्यादा के अंतर से हराया। सहारनपुर में इमरान मसूद ने करीब साढ़े 5 लाख वोट हासिल कर जीत दर्ज की।
हालांकि इन दोनों लोकसभा सीटों के विधानसभा खंडों में तस्वीर एक जैसी नहीं रही। कैराना लोकसभा क्षेत्र में सपा को सभी विधानसभा खंडों से एक जैसा समर्थन नहीं मिला। नकुड़, गंगोह और कैराना में सपा आगे रही, जबकि थाना भवन में मुकाबला लगभग बराबरी का रहा और शामली में भाजपा आगे रही।
यही अंतर विधानसभा चुनाव के लिए महत्वपूर्ण है। लोकसभा में गठबंधन का वोट एक उम्मीदवार के पीछे गया। विधानसभा में उसी इलाके में अलग-अलग सीटों पर अलग उम्मीदवार, अलग स्थानीय संगठन और अलग सामाजिक समीकरण सामने आए।इसलिए गत लोकसभा परिणाम दोनों दलों को अपनी-अपनी ताकत का आधार तो दे गया लेकिन सीट बंटवारे का सीधा फार्मूला नहीं।
इमरान मसूद की सक्रियता के बीच अमीर आलम और नवाजिश आलम का कांग्रेस में आना पश्चिमी यूपी के राजनीतिक समीकरण में अलग महत्व रखता है। अमीर आलम का पुराना राजनीतिक प्रभाव शामली-मुजफ्फरनगर क्षेत्र से जुड़ा रहा है और उनके बेटे नवाजिश आलम बुढ़ाना से विधायक रह चुके हैं।
इससे कांग्रेस के सामने पश्चिमी यूपी में केवल सहारनपुर का दावा रखने के बजाय शामली और मुजफ्फरनगर के इलाकों में भी राजनीतिक दावेदारी का आधार है।
यही सपा के लिए भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि पिछले विस चुनाव में जिन विधानसभा क्षेत्रों में सपा या उसके सहयोगी मजबूत थे, उनमें से कुछ पर कांग्रेस के नए राजनीतिक दावेदार सामने आ सकते हैं। गठबंधन की बातचीत में यदि कांग्रेस इन चेहरों और उनके पुराने चुनावी प्रभाव को आधार बनाती है तो सपा के मौजूदा दावों के साथ सीधा टकराव पैदा होगा।
इकरा हसन के राजनीतिक प्रभाव का केंद्र कैराना है। उनका परिवार लंबे समय से इस इलाके की राजनीति में सक्रिय रहा है। लोकसभा चुनाव में उनकी जीत ने कैराना को सपा के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र बनाए रखा। हालांकि कांग्रेस की हालिया सक्रियता का दायरा सहारनपुर से शामली और मुजफ्फरनगर तक बढ़ता है तो मुकाबला केवल इमरान और इकरा के बीच नहीं रहेगा।
कांग्रेस के लिए चुनौती यह होगी कि लोकसभा चुनाव की सफलता को विधानसभा संगठन और सीटों में कैसे बदला जाए। सपा के सामने दूसरी चुनौती यह होगी कि गत लोकसभा की सफलता और विधानसभा के आधार पर वह गठबंधन में ज़्यादा से ज़्यादा सीटें अपने पास रखना चाहती है। यही वजह है कि पश्चिमी यूपी में सामने आ रही बयानबाजी को सीटों के संभावित बंटवारे से जोड़कर देखा जा रहा है।
पिछले विधानसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी के कई इलाकों में सपा और उसके सहयोगियों का मजबूत प्रदर्शन रहा। सहारनपुर की बेहट, सहारनपुर ग्रामीण जैसी सीटों पर सपा जीती, जबकि कैराना सपा के खाते में गई। हालांकि थाना भवन, शामली और बुढ़ाना आरएलडी ने जीते।
लोकसभा चुनाव के बाद गठबंधन का स्वरूप बदल चुका है। अब कांग्रेस के पास सहारनपुर की लोकसभा जीत का आधार है और सपा के पास कैराना व मुजफ्फरनगर की जीत का आधार। इसलिए सीट शेयरिंग में पश्चिमी यूपी की कुछ सीटें दोनों दलों के लिए स्वाभाविक रूप से प्राथमिकता वाली हैं। अंतिम सीट समझौता अभी नहीं हुआ है, इसलिए दोनों ही दलों में जोड़-आजमाईश जारी है।
ग्रेस की तरफ से सीटों पर जल्द फैसला करने का दबाव लगातार सामने आया है। कांग्रेस प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने हाल में कहा कि पार्टी सभी 403 सीटों पर तैयारी कर रही है और अक्टूबर तक सपा के साथ सीट बंटवारे की बातचीत पूरी करने की इच्छा है।
दूसरी तरफ सपा विधानसभा चुनाव के लिए अपने संगठन और संभावित उम्मीदवारों की तैयारी कर रही है। सीट बंटवारे पर अभी अंतिम फार्मूला सामने नहीं आया है।
इसका सीधा असर पश्चिमी यूपी की उन सीटों पर पड़ेगा, जहां दोनों दल अपने-अपने राजनीतिक आधार का दावा कर रहे हैं।दरअसल यही गठबंधन का मूल पेंच है, एक दल लोकसभा के ताजा प्रदर्शन को आधार बना रहा है, दूसरा विधानसभा स्तर के पुराने संगठन और अपने मौजूदा राजनीतिक नेटवर्क को।
पश्चिमी यूपी की इस लड़ाई को केवल मुस्लिम मतदाताओं के नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा के रूप में नहीं देखा जा सकता, यह विधानसभा चुनाव का पूरा समीकरण नहीं है। यहां मुस्लिम मतदाताओं के साथ जाट, गुर्जर, दलित, पिछड़े और अन्य सामाजिक समूहों का क्षेत्रवार प्रभाव है। इसके अलावा आरएलडी का राजनीतिक आधार भी कई सीटों के समीकरण को प्रभावित करता है।
पिछले विस चुनाव में थाना भवन, शामली और बुढ़ाना जैसी सीटों पर आरएलडी की जीत और लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी की सीटों पर अलग-अलग दलों को जीत मिली। ऐसे में यहां गठबंधन का गणित केवल दो दलों के वोट जोड़ने से पूरा होता नज़र नहीं आ रहा। इसलिए सपा-कांग्रेस के बीच सीटों की बातचीत में अब संगठन की ग्राउंड पर मजबूती को आधार बनाने की कोशिश हो रही है।
यदि कांग्रेस को उसके दावेदार क्षेत्रों में पर्याप्त सीटें नहीं मिलतीं तो उसे अपने हालिया लोकसभा प्रदर्शन को विधानसभा में विस्तार देने की चुनौती होगी। यदि सपा पश्चिमी यूपी में अपनी मजबूत सीटें छोड़ती है तो उसे अपने संगठन और मौजूदा दावेदारों को समायोजित करना होगा। दोनों स्थितियों का असर उम्मीदवार चयन और स्थानीय कार्यकर्ताओं की भूमिका पर पड़ेगा।
पश्चिमी यूपी में सपा-कांग्रेस के बीच मौजूदा खींचतान का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है। लोकसभा चुनाव दोनों दलों ने साथ मिलकर लड़ा और पश्चिमी यूपी में कई सीटों पर विपक्षी गठबंधन को सफलता मिली। अब आगामी विस चुनाव में प्रत्येक सीट पर उम्मीदवार अलग होगा। इसलिए यह तय करना चुनौती हो गया है कि किस क्षेत्र में किस दल का उम्मीदवार गठबंधन के साझा वोट को बेहतर तरीके से समेट सकता है।
यही कारण है कि इमरान मसूद और इकरा हसन के बीच बयानबाजी से ज्यादा महत्वपूर्ण अब वह राजनीतिक तैयारी है जो दोनों दल अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में कर रहे हैं।
अमीर आलम और नवाजिश आलम का कांग्रेस में आना इसी कड़ी का असर है। इसके बाद पश्चिमी यूपी में कांग्रेस की दावेदारी सहारनपुर से आगे बढ़कर शामली-मुजफ्फरनगर की उन सीटों तक पहुंच गई है, जहां सपा और उसके सहयोगियों का पहले से राजनीतिक आधार है।अर्थात विस चुनाव से पहले पश्चिमी यूपी में सवाल अब इमरान बनाम इकरा का नहीं है। सवाल यह है कि सपा-कांग्रेस गठबंधन हुआ तो पश्चिमी यूपी का राजनीतिक नक्शा दोनों दलों के बीच किस तरह बांटा जाएगा। यही सीटों का भूगोल आगे गठबंधन की जमीन भी तय करेगा।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने सपा नेतृत्व की भूमिका और गठबंधन में कांग्रेस की हिस्सेदारी को लेकर सवाल उठाए। उनका जोर इस बात पर रहा कि गठबंधन में सीटों का बंटवारा समय रहते और सम्मानजनक हिस्सेदारी के साथ होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस को पश्चिमी यूपी में अपनी राजनीतिक ताकत के अनुरूप जगह मिलनी चाहिए।
सपा सांसद इकरा हसन ने इमरान मसूद के बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए अखिलेश यादव को विपक्ष का प्रमुख चेहरा बताया। उन्होंने कांग्रेस नेताओं को गठबंधन में रहते हुए बयानबाजी में संयम बरतने का संदेश दिया और कहा कि भाजपा के खिलाफ मुकाबले में विपक्षी एकता जरूरी है।