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लखनऊ के इस फिल्मकार ने कांस में मचाया धमाल, हाथ रिक्शा चालकों का बया करेंगे दर्द

लखनऊ के इस फिल्मकार ने कांस में मचाया धामाल, रवींद्र नाथ टैगोर के विरासत का बया करेंगे दर्द
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Apr 26, 2018
lucknow

लखनऊ. बेबस बुजुर्गों की बेकस आह को आवाज देती शार्ट फिल्म 'छोटी सी गुजारिश' की लोकप्रियता का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। युवा फिल्मकार प्रज्ञेश के पटकथा लेखन और निर्देशन में तैयार शार्ट 'फिल्म छोटी सी गुजारिश', अब तक लेखन, निर्देशन, और अभिनय में 13 अंतराष्ट्रीय पुरस्कार हासिल कर कांस फिल्म फेस्टिवल में भी स्थान प्राप्त कर चुकी है।

वेदना को वाणी प्रदान करने में सिद्धस्त फिल्मकार प्रज्ञेश अब कोलकाता के हाथ रिक्शा चालकों के खामोश दर्द को परदे पर जीवंत करने की तैयारी कर रहे हैं। टीएनवी फिल्म्स के बैनर तले अपनी नई प्रस्तावित फिल्म के विषय में बताते हुये प्रज्ञेश कहते हैं कि कोलकाता की काली सड़कों पर बैलगाड़ी में जोते हुये बैलों की मानिंद इंसान को ढोता, हाथ रिक्शा चालक, है मेरी आगामी फिल्म 'हेरिटेज आफ द थ्राल' का विषय।

हैरत है, हाथ रिक्शा को रवींद्र नाथ टैगोर के कोलकाता की पहचान और विरासत बताया जाता है। आखिर 21वीं सदी में भी इंसान के गुलाम होने का अहसास करा देने वाले हाथ रिक्शा कैसे कोलकाता की समृद्ध विरासत का हिस्सा हो सकते हैं? हाथ रिक्शा चालकों की फटी बेवाइयों से रिसता लहू, इस फिल्म के माध्यम से अतुल्य भारत के सभ्य समाज से रूबरू कराएगा।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में लगभग सभी प्रकार की कु-प्रथाओं, जैसे सती प्रथा, सिर पर मैला ढोने की प्रथा, बंधुआ मजदूरी, बाल विवाह आदि का विरोध हुआ, कानून बने और कु-प्रथाएं समाप्त हुई। अमानवीयता की प्रत्येक स्तर पर अस्वीकार्यता ही एक जनतांत्रिक देश में जनपक्षधरता के जिंदा होने का अहसास कराती है। विडंबना है कि सर्वहारा की वकालत करते भद्र बंगाल में इंसान को ढोने वाली हाथ रिक्शा परम्परा का अब तक वजूद में होना, सरकार के साथ-साथ समाज के जनपक्षीय नजरिये पर भी सवाल खड़ा करता है। ऐसे ही अनेक सवालों को आवाज देती फिल्म हेरिटेज आफ द थ्राल जल्द ही अपने दर्शकों के लिये उपलब्ध होगी। फिल्म का प्रदर्शन उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और उत्तराखंड में होगा।

बता दें कि निर्देशक प्रज्ञेश लघु फिल्मों को सामाजिक बुराइयों के विरूद्ध संघर्ष में महत्वपूर्ण माध्यम मानते हैं। उन्होने सामाजिक समस्याओं को आवाज देती हुई अनेक लघु फिल्मों जैसे नीयती, आई एट माई हसबैंड, सलमान इस इन्नोसेंट, द लूजर, डार्कनेस, 24 आवर्स, चमेली आदि का निर्माण किया है। कुछ फिल्मों को राष्ट्रीय स्तर पर सराहना भी मिली है।

स्वयं को फिल्म विधा में नवांकुर मानने वाले प्रज्ञेश सार्थक सिनेमा-समृद्ध सिनेमा -रचनात्मक सिनेमा के विषय में अपने विचार साझा करते हुये कहते हैं कि मौजूदा वक्त में समाज को प्रभावित करने वाली सबसे कलात्मक विधा सिनेमा है। सिनेमा अर्थात एक ऐसी विधा, जिसमें मनोरंजन है, संदेश है, सीख है, सवाल है, समाधान है, गीत है, संगीत है वह सब कुछ समाहित है, जो मानव सोच सकता है। इसमें कल्पना की अनन्त गहराइयां हैं तो यथार्थ के कैलाश भी हैं। अत: सिनेमाकार का धर्म है कि वह अपने वक्त का आईना बनता रहे। मनोरंजन की गुदगुदी के साथ ही यदि संदेश की गुनगुनाहट दर्शकों को महसूस हो जाये, तो समझिए सिनेमा का धर्म पूरा हुआ। फिल्मकार का प्रयास कामयाब हुआ।

प्रज्ञेश सरकार से अपील करते हुए कहते हैं कि, यह खुशी की बात है कि उत्तर प्रदेश सरकार फीचर फिल्म निर्माण हेतु अनुदान प्रदान कर रही है। लेकिन सरकार यदि शार्ट फिल्मों के निर्माण हेतु भी वित्तीय सहायता प्रदान करने की नीति बना दे तो निश्चित ही सामाजिक बुराइयों से संघर्ष में बड़ी मदद मिलेगी और नये फिल्मकारों, कलाकारों के लिये भी अवसर सृजित होंगे।

Published on:
26 Apr 2018 05:28 pm
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