
Kaushal Kishore rally Malihabad: राजधानी से सटे मलिहाबाद और मोहनलालगंज की सियासत में एक बार फिर पूर्व भाजपा सांसद एवं पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री कौशल किशोर की सक्रियता चर्चा में है। लोकसभा चुनाव में हार के बाद अब कौशल किशोर 13 सितंबर को प्रस्तावित ‘आत्मसम्मान रैली’ के जरिए अपने राजनीतिक प्रभाव को नए सिरे से मजबूत करने की कवायद में जुटे नजर आ रहे हैं। उनके हालिया बयानों में भाजपा सरकार के कामकाज को लेकर पिछड़े और दलित वर्गों में कथित नाराजगी का मुद्दा प्रमुखता से उभर रहा है। साथ ही अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए जुटाए गए चंदे को लेकर भी उनके द्वारा सवाल उठाए जाने की बात सामने आ रही है।
कौशल किशोर की प्रस्तावित आत्मसम्मान रैली को राजनीतिक हलकों में महज एक कार्यक्रम के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। इसे उनके समर्थक आधार को फिर से सक्रिय करने और क्षेत्र की राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि रैली का वास्तविक राजनीतिक प्रभाव उसके बाद ही स्पष्ट होगा, लेकिन उससे पहले ही मलिहाबाद से लेकर मोहनलालगंज तक सियासी चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।
कौशल किशोर लगातार यह बात उठाते रहे हैं कि समाज के पिछड़े और वंचित तबकों के बीच सरकार के कामकाज को लेकर असंतोष पैदा हो रहा है। उनके इस रुख को भाजपा की मौजूदा राजनीतिक रणनीति से अलग स्वर के तौर पर देखा जा रहा है। खास तौर पर ऐसे समय में जब 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे राजनीतिक दलों के एजेंडे में जगह बनाने लगी हैं, उनके बयानों ने स्थानीय भाजपा संगठन और विपक्ष दोनों का ध्यान खींचा है।
2024 के लोकसभा चुनाव में मोहनलालगंज सुरक्षित सीट पर भाजपा के कौशल किशोर को समाजवादी पार्टी के आरके चौधरी से हार का सामना करना पड़ा था। इस चुनाव परिणाम ने क्षेत्र में भाजपा की राजनीतिक स्थिति और कौशल किशोर के व्यक्तिगत प्रभाव को लेकर कई सवाल खड़े किए। लंबे समय तक मोहनलालगंज की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले कौशल किशोर के लिए यह हार बड़ा राजनीतिक झटका मानी गई।
इसके बाद से ही क्षेत्र में उनकी राजनीतिक गतिविधियों पर नजर बनी हुई है। अब आत्मसम्मान रैली की घोषणा और भाजपा सरकार की नीतियों पर उनके द्वारा उठाए जा रहे सवालों ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है कि आने वाले समय में कौशल किशोर की राजनीतिक दिशा क्या होगी और वह भाजपा के भीतर किस भूमिका में नजर आएंगे।
कौशल किशोर और उनकी पत्नी से जुड़ा एक मंदिर प्रकरण भी हाल में चर्चा में रहा था। उनकी पत्नी वर्तमान में भाजपा विधायक हैं। श्रावण मास के दौरान क्षेत्र में एक शिव मंदिर के सौंदर्यीकरण के बाद पूजा-अर्चना के लिए मंदिर में प्रवेश नहीं दिए जाने का आरोप कौशल किशोर दंपती की ओर से लगाया गया था। इस घटनाक्रम ने स्थानीय राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया था।
हालांकि घटनाक्रम के अगले दिन स्थिति अलग नजर आई। लखनऊ भाजपा की जिला इकाई और बीकेटी के भाजपा विधायक के साथ कौशल किशोर दंपती ने उसी मंदिर में पूजा-अर्चना की। इस घटनाक्रम के बाद विवाद शांत होता दिखाई दिया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर चर्चाएं लंबे समय तक जारी रहीं।
मलिहाबाद की राजनीति में इस समय सबसे अधिक चर्चा कौशल किशोर की पत्नी के आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भी है। क्षेत्रीय राजनीतिक संकेतों और चर्चाओं के आधार पर यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा नेतृत्व उन्हें लगातार चौथी बार टिकट देगा या नहीं। हालांकि पार्टी की ओर से इस संबंध में अभी कोई अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं हुआ है, इसलिए टिकट को लेकर चल रही चर्चाओं को फिलहाल राजनीतिक अटकलों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
भाजपा में चुनावी टिकट का अंतिम फैसला संगठन और पार्टी नेतृत्व की रणनीति, स्थानीय समीकरण, जीत की संभावना तथा सामाजिक समीकरणों सहित कई पहलुओं को ध्यान में रखकर किया जाता है। ऐसे में मौजूदा चर्चाओं को अंतिम निर्णय मानना जल्दबाजी होगी। फिर भी क्षेत्र में टिकट को लेकर उठ रही चर्चाएं इस बात का संकेत जरूर देती हैं कि 2027 से पहले मलिहाबाद की राजनीति में कई स्तरों पर समीकरण बदल सकते हैं।
कौशल किशोर का राजनीतिक सफर भी क्षेत्रीय राजनीति में उनकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। शुरुआती दौर में निर्दलीय विधायक के रूप में चुनाव जीतने के बाद उन्होंने धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की। बाद में भाजपा से जुड़कर उन्होंने संगठन और चुनावी राजनीति में अपनी जगह बनाई और मोहनलालगंज से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।
केंद्र की भाजपा सरकार में उन्हें केंद्रीय राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी मिली। इस दौरान मोहनलालगंज क्षेत्र में उनकी राजनीतिक सक्रियता और संगठन में प्रभाव दोनों बढ़े। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली हार ने उनके राजनीतिक सफर में एक नया मोड़ ला दिया। अब आत्मसम्मान रैली के जरिए वह किस तरह की राजनीतिक जमीन तैयार करते हैं, इस पर क्षेत्र के राजनीतिक जानकारों की नजर है।
कौशल किशोर की ओर से अयोध्या मंदिर के चंदे से जुड़े सवाल उठाए जाने की चर्चा भी उनके मौजूदा राजनीतिक तेवर को महत्वपूर्ण बनाती है। मंदिर निर्माण से जुड़ी भावनाएं उत्तर प्रदेश की राजनीति में बेहद संवेदनशील मुद्दा रही हैं। ऐसे में चंदे को लेकर कोई भी सवाल राजनीतिक बहस को जन्म दे सकता है।
हालांकि ऐसे आरोपों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि तथा संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना आवश्यक है। राजनीतिक मंचों से लगाए गए आरोपों को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उन्हें संबंधित नेता के बयान या आरोप के रूप में देखना ही उचितहोगा।
13 सितंबर की प्रस्तावित आत्मसम्मान रैली इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यह उस समय होने जा रही है जब उत्तर प्रदेश की राजनीति 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर धीरे-धीरे बढ़ रही है। रैली में जुटने वाली भीड़, उठाए जाने वाले मुद्दे और कौशल किशोर के भाषण का राजनीतिक संदेश आने वाले दिनों की दिशा का संकेत दे सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि कौशल किशोर भाजपा के भीतर रहकर अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाते हैं या फिर क्षेत्रीय मुद्दों को आधार बनाकर अपनी अलग राजनीतिक पहचान को मजबूत करने की कोशिश करते हैं। मलिहाबाद और मोहनलालगंज में भाजपा के सामाजिक समीकरण, 2024 के लोकसभा चुनाव का परिणाम और 2027 के विधानसभा चुनाव की संभावनाएं-इन सभी के बीच उनकी प्रस्तावित रैली को आने वाले राजनीतिक संघर्ष की शुरुआती तस्वीर के तौर पर देखा जा रहा है ।