KGMU लखनऊ में लिवर रोगों के इलाज में बड़ी पहल की गई है। यहां पहली बार लिवर प्रेशर मापने की वैज्ञानिक प्रक्रिया शुरू की गई, जिससे अब दवाओं की डोज लिवर के दबाव के आधार पर तय की जा सकेगी। इससे गंभीर लिवर मरीजों के इलाज में बेहतर और तेज परिणाम मिलने लगे हैं।
KGMU Introduces Liver Pressure Measurement Technique: किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU ) ने लिवर रोगों के इलाज के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। अब यहां लिवर प्रेशर मापने की आधुनिक और वैज्ञानिक प्रक्रिया की शुरुआत कर दी गई है, जिससे गंभीर लिवर रोगियों के उपचार में क्रांतिकारी बदलाव आने की उम्मीद है। इस नई तकनीक के जरिए अब दवाओं की डोज मरीज के लिवर प्रेशर के आधार पर तय की जा सकेगी, जिससे इलाज अधिक सटीक, प्रभावी और सुरक्षित होगा।
केजीएमयू के जनरल मेडिसिन विभाग द्वारा पहली बार हेपेटिक वेनस प्रेशर ग्रेडिएंट (HVPG) मापने की प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया। यह परीक्षण लिवर के भीतर दबाव की सटीक जानकारी देता है, जो लिवर सिरोसिस और पोर्टल हाइपरटेंशन जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में बेहद अहम माना जाता है। अब तक लिवर रोगों का इलाज अधिकतर मरीज के लक्षणों के आधार पर किया जाता था, लेकिन इस नई जांच से बीमारी की गंभीरता को वैज्ञानिक रूप से मापा जा सकेगा।
यह प्रक्रिया पहली बार केजीएमयू में शुरू की गई है, जिसे लखनऊ और आसपास के क्षेत्रों के लिए एक बड़ी चिकित्सा उपलब्धि माना जा रहा है। इससे पहले मरीजों को इस जांच के लिए दिल्ली या अन्य बड़े महानगरों में जाना पड़ता था, जिससे समय और आर्थिक बोझ दोनों बढ़ जाते थे। केजीएमयू में यह सुविधा शुरू होने से न केवल मरीजों को राहत मिलेगी, बल्कि प्रदेश के अन्य मेडिकल संस्थानों के लिए भी यह एक नई दिशा तय करेगी।
इस नई तकनीक का सफल प्रयोग लखनऊ निवासी 40 वर्षीय एक मरीज पर किया गया, जो लिवर की गंभीर बीमारी से पीड़ित था। मरीज को पीलिया, पेट में पानी भरना (एसाइटिस) और खून की उल्टियों जैसे गंभीर लक्षण थे। जांच में यह भी सामने आया कि मरीज लंबे समय से अत्यधिक शराब का सेवन कर रहा था, जिसके कारण उसका लिवर बुरी तरह प्रभावित हो चुका था। मरीज को केजीएमयू के जनरल मेडिसिन विभाग में भर्ती किया गया, जहां उसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी।
मरीज का इलाज वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. सुधीर वर्मा की निगरानी में किया गया। डॉक्टरों की टीम ने मरीज की स्थिति को देखते हुए HVPG जांच कराने का निर्णय लिया। इस जांच के माध्यम से लिवर के भीतर के दबाव को मापा गया, जिससे बीमारी की वास्तविक गंभीरता का पता चला। HVPG रिपोर्ट के आधार पर मरीज को दी जाने वाली दवाओं की मात्रा और प्रकार में बदलाव किया गया।
डॉक्टरों के अनुसार, लिवर प्रेशर की सटीक जानकारी मिलने के बाद दवाओं की डोज को संतुलित किया गया, जिससे इलाज ज्यादा प्रभावी साबित हुआ। पहले जहां केवल लक्षणों के आधार पर दवाएं दी जाती थीं, वहीं अब रोग की जड़ तक पहुंचकर उपचार संभव हो पाया। इसका नतीजा यह रहा कि मरीज के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार देखा गया। पेट में पानी कम हुआ, खून की उल्टियां बंद हुईं और पीलिया के लक्षणों में भी उल्लेखनीय सुधार आया।
चिकित्सकों का कहना है कि यह तकनीक गंभीर लिवर रोगियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। खासतौर पर उन मरीजों के लिए, जिन्हें पोर्टल हाइपरटेंशन, लिवर सिरोसिस या बार-बार खून की उल्टियों की समस्या होती है। HVPG जांच से यह तय किया जा सकता है कि मरीज को दवाओं से लाभ होगा या उसे आगे चलकर लिवर ट्रांसप्लांट जैसी जटिल प्रक्रिया की आवश्यकता पड़ सकती है।
अब तक लिवर रोगियों का इलाज मुख्य रूप से लक्षणों के आधार पर किया जाता था, जिससे कई बार इलाज अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाता था। लेकिन लिवर प्रेशर की माप से डॉक्टर बीमारी की गंभीरता को पहले ही समझ सकते हैं और उसी अनुसार इलाज की रणनीति तैयार कर सकते हैं। इससे अनावश्यक दवाओं से बचाव होगा और मरीज को सटीक इलाज मिल सकेगा।
केजीएमयू प्रशासन और मेडिसिन विभाग के लिए यह उपलब्धि गर्व की बात मानी जा रही है। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से केजीएमयू उत्तर भारत में लिवर रोगों के इलाज का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरेगा। डॉक्टरों का कहना है कि आने वाले समय में इस प्रक्रिया को और अधिक मरीजों पर लागू किया जाएगा और लिवर रोगों से जुड़ी रिसर्च को भी बढ़ावा मिलेगा।