पूर्वांचल की लोकप्रिय पारंपरिक मिठाई लौंगलता अब लखनऊ तक अपने स्वाद की पहचान बना चुकी है। बंगाल से प्रभावित इस व्यंजन को देसी घी, मावा, इलायची और चाशनी के मेल से खास बनाया जाता है। त्योहारों और शादियों में इसकी मांग बढ़ती है, और मिठाई प्रेमियों में इसका अलग ही क्रेज़ है।
Purvanchal Taste of UP Launglata: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में अगर किसी पारंपरिक मिठाई का नाम बड़े प्यार से लिया जाता है, तो वह है - लौंगलता। सुनते ही मुंह में घुलती चाशनी, देसी घी की खुशबू और खोये की भरपूर मिठास का एहसास होने लगता है। वाराणसी, मिर्जापुर, जौनपुर, गोरखपुर, प्रयागराज और आजमगढ़ जैसे जिलों में यह सिर्फ मिठाई नहीं, बल्कि त्योहारों, शादियों और पारिवारिक खुशियों की पहचान बन चुकी है। दिलचस्प बात यह है कि लौंगलता का स्वाद भले पूर्वांचल की मिट्टी में रचा-बसा लगता हो, लेकिन इसकी जड़ें पश्चिम बंगाल की मिठाई संस्कृति से जुड़ी मानी जाती हैं। समय के साथ यह मिठाई पूर्वांचल आई, और यहां के देसी स्वाद, घी और मावा के मेल ने इसे एक नया, खास रूप दे दिया।
लौंगलता का मूल नाम ‘लवंग लता’ माना जाता है। ‘लवंग’ यानी लौंग (clove) और ‘लता’ यानी लिपटी या लपेटी हुई परत। इस मिठाई की सबसे खास पहचान है, ऊपर से लौंग लगाकर इसे सील करना। यही लौंग इसका स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ इसे पहचान भी देती है। यह मिठाई भारत के दो सांस्कृतिक क्षेत्रों पूर्वांचल और बंगाल के बीच ऐतिहासिक और खानपान के आदान-प्रदान का एक बेहतरीन उदाहरण है। जैसे-जैसे यह पूर्वांचल पहुंची, यहां के हलवाइयों ने इसमें खोया, देसी घी और इलायची का ऐसा तड़का लगाया कि इसका स्वाद पूरी तरह देसी हो गया। असली स्वाद का राज: अंदर से नरम, बाहर से कुरकुरा लौंगलता का जादू उसके टेक्सचर और फ्लेवर लेयरिंग में छिपा है।
1 बाहरी परत:
मैदे की पतली लोई को बेलकर चौकोर या गोल आकार दिया जाता है। यह परत तलने के बाद सुनहरी और कुरकुरी हो जाती है।
2 भीतरी भरावन:
अंदर भरा जाता है भरपूर मावा (खोया), जिसमें मिलती है इलायची की खुशबू, कभी-कभी काजू-बादाम जैसे मेवे भी।
3 लौंग की सील:
परत को मोड़कर ऊपर से एक लौंग चुभो दी जाती है, जो इसे खोलने से भी रोकती है और हल्की मसालेदार सुगंध भी देती है।
4 देसी घी में तलना:
असल लौंगलता का स्वाद तब आता है जब इसे देसी घी में तला जाए। घी की खुशबू इसकी पहचान है।
तलने के बाद इसे गुनगुनी चीनी की चाशनी में डुबोया जाता है। यही इसे रसदार बनाती है। नतीजा,बाहर से हल्का कुरकुरा, अंदर से नरम और मीठा और बीच-बीच में लौंग व इलायची की खुशबू!
पूर्वांचल में लौंगलता का रिश्ता सीधे त्योहारों से है। शादी-ब्याह में मेहमानों के स्वागत में छठ, दिवाली, होली जैसे पर्वों पर, घर में कोई शुभ अवसर हो, कई परिवारों में यह परंपरा है कि बेटी के ससुराल जाते समय मिठाई के डिब्बे में लौंगलता जरूर रखी जाए। इसे “शुभ” और “भरपूर” मिठास का प्रतीक माना जाता है।
भले यह मिठाई पूर्वांचल की पहचान हो, लेकिन इसकी दीवानगी राजधानी लखनऊ तक पहुंच चुकी है। गोमतीनगर के विवेक खंड-2, पानी की टंकी के पास स्थित ‘बेनीराम प्यारेलाल’ की दुकान पर देसी घी में बनी लौंगलता खास पसंद की जाती है।
यहाँ की लौंगलता का स्वाद इस बात का प्रमाण है कि पारंपरिक मिठाइयाँ भौगोलिक सीमाओं से बड़ी होती हैं- स्वाद जहां अच्छा, वहां लोग खुद खिंचे चले आते हैं।
सर्दी के मौसम में मावा आधारित मिठाइयों की मांग बढ़ जाती है। लौंगलता भी इस मौसम में खास पसंद की जाती है क्योंकि देसी घी शरीर को ऊर्जा देता है,मावा पौष्टिकता बढ़ाता है। मीठा और गर्माहट वाला स्वाद सर्दियों में ज्यादा भाता है। इसलिए कई मिठाई दुकानों पर सर्दियों में लौंगलता की बिक्री सामान्य दिनों से कहीं ज्यादा होती है।
आजकल हलवाई इसमें हल्के बदलाव भी कर रहे हैं, ड्राई फ्रूट्स की ज्यादा भराई। हल्की केसर वाली चाशनी। छोटे “मिनी लौंगलता” संस्करण लेकिन पारखी लोग अब भी वही पारंपरिक देसी घी वाली, लौंग से सील की गई क्लासिक लौंगलता पसंद करते हैं।
लौंगलता यह दिखाती है कि भारत की खाद्य संस्कृति कितनी जीवंत और गतिशील है। एक क्षेत्र की मिठाई दूसरे क्षेत्र में जाकर नई पहचान बना लेती है। पूर्वांचल ने इसे अपनाया, अपने स्वाद से संवारा, और आज यह उसकी पहचान बन गई। यही भारतीय खानपान की खूबसूरती है, स्वाद के साथ इतिहास, परंपरा और भावना भी परोसी जाती है।