Lucknow Pride Ride: लखनऊ की सड़कों पर आयोजित प्राइड राइड ने शहर को इंद्रधनुषी रंगों में रंग दिया। हजरतगंज से 1090 चौराहे तक निकली इस साइकिल रैली में प्रतिभागियों ने समान अधिकार, सामाजिक स्वीकार्यता और गरिमा के साथ जीने की मांग उठाई। यह आयोजन उत्सव के साथ संवाद और जागरूकता का मंच भी बना।
Lucknow Pride Ride Paints City in Rainbow Colors,: आज नवाबी शहर लखनऊ सिर्फ अपनी तहज़ीब और ऐतिहासिक पहचान से नहीं, बल्कि इंद्रधनुषी रंगों में सजे साहस, आत्मसम्मान और प्रेम के संदेश से भी चमक उठा। शहर की सड़कों पर आयोजित प्राइड राइड केवल एक साइकिल रैली नहीं थी,यह एक संवाद था, एक शांत लेकिन गूंजती हुई मांग, जो कह रही थी: “हमें देखा जाए, हमें सुना जाए, और हमें स्वीकार किया जाए। हजरतगंज की प्रतिष्ठित गलियों से लेकर 1090 चौराहे की ऊर्जावान हलचल तक, सैकड़ों प्रतिभागियों ने साइकिलों, झंडों और नारों के साथ यह स्पष्ट किया कि यह केवल परेड नहीं, बल्कि एक साझा धड़कन थी,एक ऐसे समाज की धड़कन, जो विविधता को अपनाना सीख रहा है।
प्राइड राइड का उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं था। हर पैडल के साथ प्रतिभागियों ने नागरिक अधिकारों, समानता और गरिमा के साथ जीने की स्वतंत्रता का संदेश दिया। इंद्रधनुषी झंडे हवा में लहराते रहे और पोस्टरों पर लिखे संदेश-“Love is Love”, “Acceptance Matters”, “Equal Rights for All”-रास्ते भर लोगों का ध्यान आकर्षित करते रहे। कई राहगीर रुककर इस दृश्य को देख रहे थे, कुछ ने मुस्कुराकर समर्थन जताया, तो कुछ ने मोबाइल कैमरों में इन रंगीन पलों को कैद किया। यह दृश्य दर्शाता था कि समाज में बदलाव की प्रक्रिया धीमी सही, लेकिन जारी है।
रैली का प्रमुख पड़ाव 1090 चौराहा रहा, जो युवाओं और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र माना जाता है। यहाँ प्रतिभागियों ने छोटे-छोटे समूहों में चर्चा की,विषय थे मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक स्वीकार्यता, परिवार का समर्थन और कानूनी अधिकार। एक प्रतिभागी ने कहा, “हम सिर्फ दिखने के लिए नहीं आए हैं, हम यह बताने आए हैं कि हम भी इसी समाज का हिस्सा हैं। हमें अलग नहीं, बराबर समझा जाए।”
इस आयोजन की खास बात यह रही कि इसे टकराव नहीं, संवाद का रूप दिया गया। आयोजकों का कहना था कि प्राइड राइड का मकसद समाज से दूरी बनाना नहीं, बल्कि पुल बनाना है। लोगों को यह समझाना कि LGBT समुदाय भी उसी तरह सपने देखता है, रिश्ते बनाता है और सम्मान के साथ जीना चाहता है। रास्ते भर स्वयंसेवक लोगों को पर्चे बांटते रहे, जिनमें लैंगिक पहचान, यौन अभिविन्यास और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी बुनियादी जानकारी दी गई थी।
इंद्रधनुषी झंडा यहाँ केवल एक प्रतीक नहीं था, बल्कि साहस की कहानी था। कई प्रतिभागियों के लिए यह पहला सार्वजनिक कार्यक्रम था, जहां वे अपनी पहचान के साथ खुले तौर पर सामने आए। चेहरे पर रंग, हाथों में झंडे और आँखों में आत्मविश्वास,यह दृश्य बताता था कि यह खुशी संघर्ष के बाद मिली है। एक युवती ने भावुक होकर कहा, “आज पहली बार मैं खुद को छिपाए बिना सड़कों पर चल पा रही हूँ। यह आज़ादी छोटी नहीं है।
भारत में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर हुए कई वर्ष हो चुके हैं, लेकिन सामाजिक स्वीकार्यता की राह अब भी लंबी है। ऐसे आयोजन इस दूरी को कम करने का प्रयास हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि दृश्यता (visibility) से ही संवाद शुरू होता है और संवाद से बदलाव।
इस बार राइड में कुछ परिवार भी शामिल हुए,माता-पिता अपने बच्चों के साथ आए थे। यह दृश्य विशेष था, क्योंकि यह दर्शाता है कि धीरे-धीरे परिवार भी समर्थन का स्तंभ बन रहे हैं। एक पिता ने कहा, “हम यहां अपने बेटे के साथ खड़े हैं। हमें उस पर गर्व है।
लखनऊ, जो परंपरा और आधुनिकता का संगम है, अब सामाजिक विविधता के मुद्दों पर भी खुलकर बात करने लगा है। यह प्राइड राइड इसी बदलाव की निशानी थी। शहर की पहचान में अब इंद्रधनुष के रंग भी शामिल हो रहे हैं। राइड के दौरान हँसी, संगीत और नारों के बीच एक सकारात्मक ऊर्जा महसूस की जा सकती थी। यह केवल विरोध नहीं, बल्कि उम्मीद का उत्सव था,एक ऐसे भविष्य की उम्मीद, जहाँ पहचान छिपानी न पड़े।