लखनऊ

अब भी परिजनों के मोह से आगे नहीं बढ़ पा रहीं मायावती, क्यों नहीं बन पाईं बहुजन की नेता?

पिछले तीन चुनावों में लगातार फेल हुई बसपा में उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव से पहले एक बार फिर उठापटक मची है। मायावती की बहुजन से जुड़ने की कोशिशों की राह में कौन-कौन से रोड़े हैं, समझते हैं।
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Sep 11, 2026
BSP supremo Mayawati brother Anand Kumar, Nephew Ishan Anand
अपने भाई-भतीजों से घिरीं बसपा प्रमुख मायावती (बीच में) बहुजन से हमेशा दूर ही रहीं। (इमेजिंग: एआई)

उत्तर प्रदेश में कुछ ही महीनों में विधान सभा चुनाव होने हैं। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुखिया मायावती का कहना है कि वह राज्य में पांचवी बार बसपा की सरकार बनाने के लिए तैयारी में जुटी हैं। लेकिन, चुनाव से पहले उनकी पार्टी में जैसी उथल-पुथल है, उसे देखते हुए लगता है कि मायावती के लिए तैयारी उम्मीद से ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहने वाली है। उनके सामने चुनौती पहले से ही गंभीर है, क्योंकि बसपा के पास उत्तर प्रदेश में एक भी विधायक-सांसद नहीं है। 2007 के बाद हुए सभी विधान सभा चुनावों में पार्टी लगातार नीचे ही गिरती गई है।

विधानसभा चुनाव वर्षकुल सीटेंवोट शेयर (%)मुख्य कारण
200720630.43%ब्राह्मण-दलित गठबंधन की सफलता।
20128025.95%सत्ता विरोधी लहर और भ्रष्टाचार के आरोप।
20171922.23%मोदी लहर और गैर-जाटव वोटों का बिखराव।
20220112.88%द्विध्रुवीय चुनाव (BJP vs SP) में अप्रासंगिक हुई बसपा।
2024 (LS)009.39%गठबंधन न करना और कैडर की निष्क्रियता।

बीते कुछ वर्षों में राज्य की चुनावी लड़ाई दो-ध्रुवीय हो चुकी है। इसमें बसपा को अपने लिए नए सिरे से जगह बनानी होगी।

मायावती थीं एयरपोर्ट पर सीधे प्लेन तक गाड़ी ले जाने वालीं इकलौती पूर्व सीएम

एक समय ऐसा था जब मायावती देश की इकलौती पूर्व सीएम हुआ करती थीं, जिनकी गाड़ी को दिल्ली एयरपोर्ट पर विमान तक जाने की छूट थी। यह सुविधा उनका रुतबा बयान करने के लिए काफी है। तभी वह भारी बहुमत के साथ एक बार फिर पूर्व से मौजूदा सीएम बन गईं थीं। 2007 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में बसपा के 206 विधायक जीते थे। 30 फीसदी से ज्यादा वोट बसपा को मिले थे। उनके पास लोक सभा के 17 सांसद हुआ करते थे। उनकी हैसियत केंद्र की सरकार हिला देने तक की थी।

मायावती बतौर सीएम कार्यकाल की अवधिदिनसमर्थन/गठबंधन
पहली बार3 जून 1995 – 18 अक्टूबर 1995137 दिनभाजपा के बाहरी समर्थन से
दूसरी बार21 मार्च 1997 – 21 सितंबर 1997184 दिनभाजपा के साथ (6-6 महीने का रोटेशन फॉर्मूला)
तीसरी बार3 मई 2002 – 29 अगस्त 20031 वर्ष, 118 दिनभाजपा और अन्य दलों के समर्थन से
चौथी बार13 मई 2007 – 15 मार्च 20124 वर्ष, 307 दिनबसपा का पूर्ण बहुमत (सोशल इंजीनियरिंग)

मायावती जब भारी बहुमत से जीत कर, अपने दम पर सीएम बनीं तो उनका रुतबा कई गुना बढ़ गया था। तब राजनीतिक पंडितों ने उनके और बसपा के बारे में कई बड़ी-बड़ी भविष्यवाणियां की थीं। किसी ने उन्हें 2009 के लोक सभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताया था तो किसी ने कहा था कि वह कांग्रेस से ज्यादा बड़ा खतरा बीजेपी के लिए बनेंगी। लेकिन ये सब बातें तात्कालिक और काल्पनिक साबित हुईं।

मायावती का वो फॉर्मूला जो पहली और आखिरी बार हुआ था हिट

2007 में मायावती जिस ऊंचाई पर पहुंची थीं, वह चरम साबित हुई और उसके बाद से वह लगातार उतार पर ही हैं। 2007 में मायावती ने नया प्रयोग किया था। अपने कोर वोट बैंक के साथ अगड़ी जातियों को भी साधा था। पहले मनुवादी बता कर ब्राह्मणों/अगड़ी जातियों का विरोध करने वाली मायावती ने 2007 में ब्राह्मणों को चुनाव में टिकट दिया। उनकी सोशल इंजीनियरिंग का असर यह रहा कि सपा से मुस्लिम, आरएलडी से जाट और बीजेपी से अगड़ी जाति के वोटर्स टूट कर बसपा के खेमे में गए। कोर दलित मतदाताओं का साथ तो रहा ही। मायावती ने न किसी पार्टी से गठबंधन किया था और न ही मैनिफेस्टो दिया था। फिर भी लगभग हर तीसरा वोट बसपा को ही मिला था। लेकिन, उनका यह प्रयोग काठ की हांडी साबित हुआ, जो चूल्हे पर एक ही बार चढ़ती है।

बहुजन की नेता क्यों नहीं बन सकीं मायावती

मायावती का राजनीति में उभार हुआ तो दलितों को ऐसा लगा था कि उनके बीच की एक महिला नेता बन कर उभरी है और उन्हें एक आवाज मिली है। इसलिए उन्होंने बसपा को वोट दिया। 2007 में नायाब 'सोशल इंजीनियरिंग' के जरिये मायावती ने वोट तो समाज के दूसरे वर्ग का भी ले लिया। लेकिन सारा आभामंडल अपने इर्द-गिर्द ही बुने रखा। उनका यह स्टाइल नया नहीं था, लेकिन 2007 के बाद यह और मजबूत ही होता गया। इसका उन्हें आगे चल कर खामियाजा भुगतना पड़ा। जहां वह अपने कोर वोट बैंक के अलावा सपा के मुस्लिम और भाजपा के अगड़ी जाति के वोटर्स छीनने में कामयाब रही थीं, वहीं आगे चल कर उनके पारंपरिक वोटर भी साथ नहीं रहे।

बहुजन नहीं, अपने जनों की पार्टी बना दी बसपा को

मायावती जब से सीएम बनीं, तब से बसपा पर अकेले की पकड़ बनाए रखीं। कांशीराम के नहीं रहने के बाद तो पार्टी पर एक तरह से उनका सम्पूर्ण एकाधिकार हो गया। पार्टी के ढलान का दौर शुरू होने के बाद भी उनका यही रवैया रहा। जब सवाल उनकी विरासत को आगे ले जाने का उठा, तब भी उन्हें पार्टी का कोई सिपाही नहीं, बल्कि अपने परिवार के लोग ही नजर आए।

10 सितंबर, 2026 को भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से निष्कासित करने की जानकारी देते हुए मायावती ने जो ट्वीट किया, उसमें उन्होंने लिखा कि आकाश को पार्टी की सफलता से ज्यादा निजी व पारिवारिक स्वार्थ का मोह है। सच यह है कि खुद मायावती ने ऐसा संकेत बहुत ही कम दिया है कि वह पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए व्यक्ति और परिवार से आगे उठ कर काम करने की मिसाल खड़ी कर रही हैं।

अध्यक्ष के तौर पर मायावती खुद पार्टी सुप्रीमो हैं और भाई आनंद कुमार को उपाध्यक्ष बना रखा है। उसी भाई के एक बेटे को संयोजक बना रखा था, जिसे अब पार्टी से हटा दिया है और दूसरे बेटे ईशान आनंद को हाल ही में सेक्टर 1 का इंचार्ज बना कर बड़ी ज़िम्मेदारी दी है। बता दें कि मायावती ने बसपा को दो सेक्टर में बांट रखा है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को छोड़ कर बाकी राज्यों के लिए यह व्यवस्था है। एक सेक्टर में 10 राज्यों का क्लस्टर रखा गया है। इस लिहाज से संगठन में ईशान का पद काफी महत्व वाला है।

मायावती ने पहले आकाश को राष्ट्रीय संयोजक बना कर आगे बढ़ाया, फिर ईशान को आगे बढ़ाने लगीं। समझा जाता है कि बसपा का मौजूदा घमासान असल में परिवार की अंदरूनी लड़ाई का नतीजा है।

साधारण परिवार की होकर भी असाधारण जीवनशैली

मायावती का जन्म बड़े साधारण परिवार में हुआ था। उनका जन्म 15 जनवरी, 1956 को गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) जिले के बादलपुर में हुआ था। उनके पिता डाक विभाग में कर्मचारी थे। जब वह दो साल की थीं तो उनके पिता परिवार को लेकर दिल्ली के इंद्रपुरी में रहने के लिए आ गए थे। 1977 में मायावती ने शिक्षक की नौकरी कर ली। लेकिन वह इससे संतुष्ट नहीं थीं। वह काफी आगे जाना चाहती थीं। उन्होंने बीजेपी के केंद्रीय नेताओं से संपर्क बढ़ाना शुरू किया। 1977 के आम चुनाव में उन्होंने जनता पार्टी के लिए काम किया। 1980 में उनकी मुलाक़ात कांशीराम से हुई। वहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई।

1984 में 19 अप्रैल को मायावती बसपा की संस्थापक सदस्य बनीं। उन्होंने कांशीराम पर भी अपना जबरदस्त प्रभाव बना लिया था। ऐसा बहुत कम होता था कि मायावती की बात कांशीराम टाल दें।

1984, 1985 और 1987 में हारने के बाद 1989 में मायावती पहली बार बिजनौर से लोक सभा पहुंचीं। 1991 में वह फिर हार गईं। 1992 में बुलंदशहर से उपचुनाव जीत कर फिर लोक सभा पहुंचने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं रहीं। उल्टा बूथ कैप्चर करने के आरोप में गिरफ्तार कर ली गईं। तब 1993 में वह राज्य सभा गईं। 1995 में वह पहली बार मुख्यमंत्री बनीं।

बसपा 1984 में बनी। करीब 10 साल बाद वह उत्तर प्रदेश की राजनीति में अच्छी स्थिति में आ गई थी। लेकिन, यह स्थिति दो दशक भी कायम नहीं रह सकी। 2007 के बाद से पार्टी लगातार नीचे जा रही है, जबकि उसके समय की बनी कई पार्टियां आज अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में हैं।

पार्टी कब बनी बनाने वाले / प्रमुख नेताबनने का आधार/संदर्भ
भारतीय जनता पार्टी (BJP)1980अटल बिहारी वाजपेयी, एल.के. आडवाणीजनता पार्टी से अलग होकर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के विचार पर गठन।
तेलुगु देशम पार्टी (TDP)1982एन.टी. रामा राव (NTR)आंध्र प्रदेश में "तेलुगु गौरव" के मुद्दे पर क्षेत्रीय पहचान की शुरुआत।
बहुजन समाज पार्टी (BSP)1984मान्यवर कांशीरामदलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों (बहुजन) के राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए।
समाजवादी पार्टी (SP)1992मुलायम सिंह यादवजनता दल के टूटने के बाद सामाजिक न्याय और लोहियावादी समाजवाद पर आधारित।
समता पार्टी 1994नीतीश कुमार, जॉर्ज फर्नांडिस जनता दल में एक और टूट का नतीजा। बाद में जदयू में इसका विलय हो गया।
राष्ट्रीय जनता दल (RJD)1997लालू प्रसाद यादवजनता दल से अलग होकर बिहार में "सामाजिक न्याय" और धर्मनिरपेक्षता का मोर्चा।
बीजू जनता दल (BJD)1997नवीन पटनायकबीजू पटनायक की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए ओडिशा में गठित।
तृणमूल कांग्रेस (TMC)1998ममता बनर्जीकांग्रेस से अलग होकर पश्चिम बंगाल में वामपंथ के विरोध में एक क्षेत्रीय शक्ति।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP)1999शरद पवार, पी.ए. संगमाकांग्रेस नेतृत्व (सोनिया गांधी के विदेशी मूल) के मुद्दे पर अलग होकर महाराष्ट्र में प्रभाव बनाया।
जम्मू और कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी (JKNPP)1982भीम सिंहजम्मू और कश्मीर के लोगों के अधिकारों पर केंद्रित।
इंडियन नेशनल लोक दल (INLD)1996चौधरी देवी लाल1996 में देवी लाल ने हरियाणा लोक दल नाम से इसकी स्थापना की थी। 1998 में इसका मौजूदा नाम रखा गया।

इन पार्टियों की मौजूदा स्थिति इस टेबल में दी गई है:

पार्टी सरकार में स्थिति (States)लोकसभा (2024) चुनाव में वोट %अंतिम विधानसभा चुनाव प्रदर्शन (प्रमुख राज्य)वर्तमान स्थिति
भाजपा (BJP)19 राज्यों में (सत्ता/गठबंधन)36.56%ओडिशा: 78 सीटें (जीत), हरियाणा: 48 सीटें (जीत), बिहार: 89 सीटें (गठबंधन की जीत)केंद्र में सत्तारूढ़; राज्यों में सबसे मजबूत पकड़।
सपा (SP)0 (UP में मुख्य विपक्ष)4.58%UP (2022): 111 सीटें (32.06% वोट शेयर)लोकसभा 2024 में 37 सीटों के साथ तीसरी बड़ी पार्टी।
TMC15 साल बाद 2026 में पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर4.37%बंगाल (2026): 215 से 80 सीटें (47.9% से 41.1 % वोट शेयर)2026 चुनाव के बाद टूट, बंगाल में कमजोर हुई पार्टी।
TDP1 (आंध्र प्रदेश)1.98%आंध्र (2024): 135 सीटें (जीत, 45.6% वोट)आंध्र प्रदेश में भारी बहुमत; केंद्र में महत्वपूर्ण सहयोगी।
RJD0 (बिहार में विपक्ष)1.57%बिहार (2025):* 25 सीटें (विपक्ष में)बिहार विधानसभा में बड़ी पार्टी होने के बावजूद सत्ता से बाहर।
BJD0 (ओडिशा में विपक्ष)1.46%ओडिशा (2024): 51 सीटें (सत्ता से बाहर)24 साल बाद सत्ता गँवाई; नवीन पटनायक विपक्ष के नेता।
NCP (SP)0 (महाराष्ट्र विपक्ष)0.92%महाराष्ट्र (2024 चुनाव) से पहले पार्टी टूट गई थी। शरद पवार खेमे को झटका लगा। इससे पहले के चुनाव में महाविकास अघाड़ी में कांग्रेस के साथ अच्छा प्रदर्शन किया था।अब शरद पवार गुट पर अजीत पवार खेमा भारी है और महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ है।
बसपा (BSP)02.04%UP (2022): 1 सीट (12.8% वोट शेयर)राष्ट्रीय स्तर पर वोट शेयर और सीटों में भारी गिरावट।

मायावती जिस तरह एक साधारण पृष्ठभूमि से निकली नेता हैं, सार्वजनिक जीवन में उन्होंने इसके उलट आभामंडल बनाया। आम जनता, नेता, कार्यकर्ता से दूरी बना कर रखना, भारी सुरक्षा के साथ चलना, शाही अंदाज में जीना…ये सब उन्हें बहुजन के दिलों से दूर करता गया। उनकी जीवनशैली आज भी बहुत हद तक उसी तर्ज पर कायम है।

Updated on:
11 Sept 2026 05:10 pm
Published on:
11 Sept 2026 04:01 pm