Prateek Yadav Tehrvi 25 may: प्रतीक यादव की तेरहवीं को लेकर सैफई की वर्षों पुरानी परंपरा चर्चा में है। मुलायम सिंह यादव की तेरहवीं नहीं हुई थी, लेकिन अब परिवार ने नई परंपरा की शुरुआत की।
Prateek Yadav Tehrvi Ceremony: प्रतीक यादव की तेरहवीं को लेकर इस समय राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। समाजवादी परिवार और सैफई की वर्षों पुरानी परंपरा के बीच आयोजित हो रहा यह कार्यक्रम कई मायनों में खास माना जा रहा है। खास बात यह है कि मुलायम सिंह यादव के निधन पर जहां तेरहवीं का आयोजन नहीं किया गया था, वहीं अब उनके छोटे बेटे प्रतीक यादव की तेरहवीं आयोजित होने जा रही है। इसे सैफई की पुरानी परंपरा टूटने के रूप में भी देखा जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यादव परिवार और सैफई की सामाजिक परंपराओं को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
उत्तर प्रदेश के सैफई गांव की पहचान सिर्फ राजनीतिक रूप से ही नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक परंपराओं के कारण भी रही है। यहां वर्षों से मृत्यु के बाद तेरहवीं का भोज आयोजित न करने की परंपरा चली आ रही थी। गांव के बुजुर्गों और स्थानीय लोगों का मानना था कि तेरहवीं जैसे बड़े आयोजनों का आर्थिक बोझ गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ता है।
इसके अलावा सैफई के लोगों का यह भी मानना रहा कि शोक के समय भोज और बड़े आयोजन करने की बजाय सादगी और श्रद्धा के साथ दिवंगत आत्मा को याद करना अधिक उचित है। यही वजह रही कि यहां लंबे समय तक मृत्यु के बाद तेरहवीं का आयोजन नहीं किया जाता था।
जब समाजवादी पार्टी के संस्थापक और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का निधन हुआ था, तब भी इस परंपरा को कायम रखा गया था। हालांकि यादव परिवार आर्थिक रूप से बेहद संपन्न और प्रभावशाली है, लेकिन तब भी तेरहवीं का आयोजन नहीं किया गया था। मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद परिवार की ओर से 11वें दिन हवन और श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया था। परिवार के सदस्यों ने शुद्धि संस्कार में भाग लिया था और अखिलेश यादव समेत परिवार के पुरुष सदस्यों ने मुंडन संस्कार भी कराया था। उस समय यह चर्चा हुई थी कि यादव परिवार ने सैफई की परंपरा को सम्मान देते हुए तेरहवीं का आयोजन नहीं किया।
अब जब प्रतीक यादव की तेरहवीं का कार्ड सामने आया है तो लोगों के मन में यही सवाल उठ रहा है कि आखिर वह परंपरा अब क्यों टूट रही है। राजनीतिक और सामाजिक दोनों ही स्तर पर इसे लेकर चर्चाएं तेज हैं। प्रतीक यादव की पत्नी और भाजपा नेता अपर्णा यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर तेरहवीं का कार्ड साझा किया। इस कार्ड के सामने आते ही यह चर्चा शुरू हो गई कि सैफई की वर्षों पुरानी परंपरा अब बदलती नजर आ रही है। तेरहवीं के आयोजन को कुछ लोग बदलते सामाजिक परिवेश से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि यह परिवार की व्यक्तिगत इच्छा और श्रद्धा का विषय है।
बताया गया कि 13 मई को प्रतीक यादव का निधन हार्ट में खून का थक्का जमने की वजह से हुआ था। वह पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन की खबर सामने आते ही राजनीतिक और सामाजिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई थी।
14 मई को उनका अंतिम संस्कार किया गया। उस दौरान उनकी चिता को अपर्णा यादव के पिता अरविंद सिंह बिष्ट ने मुखाग्नि दी थी। उस समय जारी किए गए अंतिम संस्कार के कार्ड में केवल अपर्णा यादव और उनकी दोनों बेटियों के नाम थे। दिलचस्प बात यह रही कि उस कार्ड में अखिलेश यादव या यादव परिवार के अन्य सदस्यों का नाम शामिल नहीं था। इसके बाद परिवार के भीतर दूरियों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं।
अब तेरहवीं के कार्ड में अपर्णा यादव के साथ अखिलेश यादव और उनके बच्चों के नाम शामिल किए गए हैं। इस बदलाव ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। लोग इसे यादव परिवार में एकजुटता और रिश्तों में सुधार के संकेत के रूप में देख रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दुख की इस घड़ी में परिवार एक साथ नजर आ रहा है और यह संदेश समाज में भी सकारात्मक रूप से जा रहा है।
प्रतीक यादव के अस्थि विसर्जन कार्यक्रम के दौरान भी परिवार के कई सदस्य एक साथ दिखाई दिए थे। हरिद्वार में आयोजित कार्यक्रम में शिवपाल यादव के बेटे आदित्य यादव समेत परिवार के अन्य सदस्य अपर्णा यादव के साथ मौजूद रहे। उस समय भी यह चर्चा हुई थी कि परिवार के बीच रिश्तों में नरमी आई है। अब तेरहवीं के कार्ड में सभी प्रमुख नाम शामिल होने से इन चर्चाओं को और बल मिला है।
यादव परिवार उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा और प्रभावशाली परिवार माना जाता है। ऐसे में परिवार से जुड़ी हर गतिविधि राजनीतिक चर्चा का विषय बन जाती है। तेरहवीं के आयोजन और कार्ड में शामिल नामों को लेकर राजनीतिक विश्लेषक अलग-अलग मायने निकाल रहे हैं। कुछ इसे परिवार की निजी भावनाओं से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे राजनीतिक और सामाजिक संदेश के रूप में भी देख रहे हैं।
सैफई की परंपरा वर्षों तक सामाजिक सादगी और सामूहिक सोच का प्रतीक रही है। लेकिन बदलते समय के साथ कई सामाजिक परंपराओं में बदलाव भी देखने को मिल रहे हैं। प्रतीक यादव की तेरहवीं को भी लोग इसी बदलाव के रूप में देख रहे हैं। जहां एक ओर लोग पुरानी परंपराओं को सम्मान देने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर परिवार की व्यक्तिगत आस्था और भावनाओं को भी महत्व दिया जा रहा है।
दुख की इस घड़ी में यादव परिवार का एकजुट नजर आना भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। अपर्णा यादव, अखिलेश यादव और परिवार के अन्य सदस्यों का नाम एक साथ सामने आने को लोग सकारात्मक संकेत मान रहे हैं। प्रतीक यादव की तेरहवीं अब केवल एक धार्मिक संस्कार नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक परंपरा, पारिवारिक रिश्तों और राजनीतिक संदेशों के बीच चर्चा का बड़ा विषय बन चुकी है।