लाखों में होता है किराए की कोख का खेल…जाने कौन सी महिलाएं होती हैं शामिल

जानकारी के लिए बता दें कि किराये की कोख का इंतजाम कोख की दलाली करने वाली एजेंसियां कराती हैं। ये एजेंसियां इस काम के लिए दम्पतियों से 15-18 लाख रुपये वसूलती हैं।

2 min read
Sep 12, 2016
लखनऊ. जहां एक ओर सरकार सरोगेसी (किराये की कोख) पर रोक लगाने पर विचार कर रही है वहीं लखनऊ में सरोगेसी का कारोबार फलफूल रहा है। कुछ महिलाएं मजबूरी वश तो कुछ अन्य कारणों को सरोगेसी का सहारा ले रही हैं और इसके लिए मोटी रकम चुका रही हैं। वैसे तो केंद्र सरकार नए सरोगेसी बिल 2016 में इस बात का इंतजाम कर रही है कि महिला की कोख के व्यावसायिक इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगे। सोचने वाली बात है कि आज के दौर को देखते हुए ये सवाल खड़ा होता है कि क्या किराये की कोख पर रोक लगनी चाहिए या नहीं। इस सवाल का जवाब ढूंढने से पहले व इस बात को समझने भी जरूरी है कि किराये की कोख कितनी सही है या गलत है साथ ही किराये की कोख के कारोबार के अर्थतंत्र और कैसे यह धंधा कैसे चल रहा है।

जानकारी के लिए बता दें कि किराये की कोख का इंतजाम कोख की दलाली करने वाली एजेंसियां कराती हैं। ये एजेंसियां इस काम के लिए दम्पतियों से 15-18 लाख रुपये वसूलती है जिसमें से 5 से 8 लाख रुपये किराये पर कोख देने वाली महिला को दिए जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में दम्पतियों को लगभग बीस लाख रूपय खर्च करने पड़ते हैं।

लखनऊ शहर की बात करें तो यहां 70 से ज्यादा महिलाएं हर साल अपनी कोख बेचती हैं। वहीं हर महीने 6 से आठ सरोगेट मदर बच्चे को दे रही है। सबसे खास बात ये है कि 90 प्रतिशत मामलों में सरोगेट मदर को कोख का किराया दिया जाता है।

किराये की कोख के नुकसान
डॉक्टरों के मुताबिक भले ही मेडिकल साइंस में कहां जाता है क‌ि 6 महीने तक शिशु को मां का दूध और निकटता की जरूरत होती है लेकिन सरोगेट मदर से जन्मे बच्चे को मां का दूध कभी नसीब नहीं होता। पैदा होते ही बच्चे को पैसा दे रहे दंपति ले जाते हैं। जन्म देने वाली मां को अगले दो महीने चिकित्सकीय मदद जरूर दी जाती है, लेकिन भावनात्मक रूप से उसके लिए भी यह मुश्किल समय होता है।

क्या कहना है सरोगेसी सेंटर के संचालकों का
लखनऊ में एक प्रमुख सरोगेसी सेंटर की संचालिका डॉ सुनीता चंद्रा बताती है कि वे हर महीने पांच या छह सरोगेसी के केसेज में डिलीवरी करवा रही हैं। और इनका मानना है कि अगर जरूरतमंद दंपति बच्चे के लिए सरोगेट मदर की मदद चाहें तो उन्हें इससे रोका नहीं जाना चाहिए। कानून बेशक कड़े हो और सरोगेसी के जरिए न महिलाओं का शोषण हो न उन्हें इसका व्यावसायिक उपयोग करने दिया जाए। लेकिन जो महिलाएं अपनी इच्छा से सरोगेट मदद बनने को राजी है, उन्हें एक दफा के लिए इसकी अनुमति मिलना चाहिए।

इन कारणों से भी महिलाएं लेती हैं सरोगेसी का सहारा
डॉ चन्द्रा स्वीकारती हैं कि उनेक पास कई दफा अमीर घरों से ऐसे मामले भी आते हैं जिनमें महिला अपने फिगर को लेकर बच्चे पैदा नहीं करना चाहतीं। कुछ का तो यह भी तर्क होता है कि अपनी लाइफ स्टाइल की वजह से उन्हें नौ महीने तक इस स्ट्रेस से गुजरना ठीक नहीं लगता। डॉ चन्द्रा कहती है कि ऐसे मामलों पर रोक के लिए सख्त बिल लाना ही समाज के लिए हितकर है।
Published on:
12 Sept 2016 06:51 pm
Also Read
View All