Lucknow में आयोजित संगोष्ठी में विद्वानों ने सनातन धर्म, वेद और विज्ञान के संबंधों पर चर्चा की। वक्ताओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृत के महत्व को रेखांकित किया।
Vedas and Science Sanskrit Seminar: राजधानी Lucknow में भारतीय ज्ञान परंपरा, सनातन धर्म और वेद-विज्ञान के विभिन्न आयामों पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए विद्वानों और संस्कृत के प्रख्यात अध्येताओं ने वेदों की वैज्ञानिकता, संस्कृत भाषा के महत्व और भारतीय संस्कृति के मूल तत्वों पर विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में Laxminivas Pandey, कुलपति Kameshwar Singh Darbhanga Sanskrit University तथा Sanskrit Bharati के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपने व्याख्यान में सनातन धर्म के आलोक में वेद और विज्ञान के गहरे संबंधों को स्पष्ट किया।
अपने वक्तव्य में प्रो. लक्ष्मीनिवास पाण्डेय ने कहा कि सनातन धर्म और वेद-विज्ञान भारतीय संस्कृति की आधारशिला हैं। इनके बिना भारतीयता की कल्पना अधूरी है। उन्होंने बताया कि वेदों में प्रकृति, ब्रह्मांड, ऊर्जा और जीवन के कई ऐसे सिद्धांत वर्णित हैं जिन्हें आधुनिक विज्ञान आज भी समझने और प्रमाणित करने का प्रयास कर रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि वैदिक साहित्य केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि इनमें जीवन, समाज, प्रकृति और विज्ञान से जुड़े अनेक ज्ञान भंडार मौजूद हैं। वेदों की परंपरा हजारों वर्षों से मौखिक रूप से संरक्षित रही है, जो विश्व की सबसे अद्भुत ज्ञान परंपराओं में से एक है।
प्रो. पाण्डेय ने वेदपाठ की परंपरा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि प्राचीन काल में वेदों के संरक्षण के लिए आठ प्रकार की पाठ पद्धतियां विकसित की गई थीं। इनमें जटा, माला, घन आदि प्रमुख हैं। इन पद्धतियों का उद्देश्य यह था कि यदि किसी एक पद्धति में गलती हो जाए तो दूसरी पद्धति के माध्यम से उसे तुरंत सुधारा जा सके। इस तरह वेदों का शुद्ध रूप सुरक्षित बना रहा। उन्होंने कहा कि यह पूरी व्यवस्था बिना किसी सरकारी संरक्षण के आम जनमानस के सहयोग से विकसित और संरक्षित हुई थी, जो भारतीय समाज की ज्ञान के प्रति आस्था को दर्शाती है।
कार्यक्रम के दौरान प्रो. पाण्डेय ने संस्कृत भाषा के अध्ययन और प्रसार पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की कुंजी है। उन्होंने यह भी बताया कि कोई भी व्यक्ति किसी भी उम्र में संस्कृत सीख सकता है। यदि संस्कृत को व्यापक स्तर पर पढ़ाया और सिखाया जाए तो भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक आसानी से पहुंचाया जा सकता है।
कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक और लौकिक मंगलाचरण से हुई। ज्ञानेन्द्र तिवारी ने वैदिक मंगलाचरण प्रस्तुत किया जबकि जाह्नवी पाण्डेय ने लौकिक मंगलाचरण के माध्यम से कार्यक्रम का शुभारंभ किया। अखिल भारतीय संस्कृत परिषद के मंत्री Prayag Narayan Mishra ने वाचिक स्वागत करते हुए संगोष्ठी के विषय का सारगर्भित परिचय प्रस्तुत किया और सभी विद्वानों का स्वागत किया।
इस अवसर पर परिषद के अध्यक्ष Chandrabhooshan Tripathi ने वेदों की वर्तमान समय में प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि इनमें मानव जीवन को दिशा देने वाले अनेक सिद्धांत मौजूद हैं। इसी क्रम में Lucknow University के संस्कृत-प्राकृत भाषा विभाग के अध्यक्ष Abhimanyu Singh ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन Ashok Kumar Shatapathi ने सफलतापूर्वक किया।
सम्पूर्ति सत्र में Sampurnanand Sanskrit University के वेद-वेदांग संकाय प्रमुख Mahendra Kumar Pandey ने वेद और विज्ञान के संबंधों पर अपने विचार प्रस्तुत किए। इसी प्रकार संस्कृत विद्या धर्मविज्ञान संकाय के अध्यक्ष Sheetla Prasad Pandey ने भी वेदों के वैज्ञानिक पक्षों को रोचक ढंग से समझाया। वहीं University of Allahabad के संस्कृत विभाग से आए Anil Pratap Giri ने वेद और विज्ञान के दार्शनिक संदर्भों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रमाणित करने का प्रयास किया। उन्होंने नई शिक्षा नीति 2020 में वैदिक अध्ययन की संभावनाओं को भी रेखांकित किया और कहा कि इस नीति के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा प्रणाली में बेहतर स्थान मिल सकता है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष के रूप में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री के ओएसडी Ravi Kishore Trivedi ने सभी विद्वानों के विचारों की सराहना की। उन्होंने वैदिक उदाहरणों के माध्यम से यह बताया कि प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणाली कितनी वैज्ञानिक और व्यवस्थित थी।
इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न हिस्सों से विद्वानों और शोधार्थियों ने भाग लिया। जयपुर, बेंगलुरु, वृंदावन, दिल्ली और गोरखपुर से आए विद्वानों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में लगभग सौ से अधिक विद्वान, शोधार्थी और श्रोता उपस्थित रहे। इसमें संस्कृत विभाग के कई प्राध्यापक, शोध छात्र और संस्कृत प्रेमी शामिल हुए।
कार्यक्रम के अंत में सभी विद्वानों ने भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और संवर्धन के लिए मिलकर कार्य करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि वेद, संस्कृत और भारतीय दर्शन केवल अतीत की धरोहर नहीं हैं, बल्कि भविष्य के लिए भी मार्गदर्शक हैं। यदि इन्हें सही ढंग से समझा और पढ़ाया जाए तो यह आधुनिक समाज को नई दिशा दे सकते हैं। कार्यक्रम के समापन पर सौरभ तिवारी ने शांति पाठ प्रस्तुत किया और सभी विद्वानों व प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। इस संगोष्ठी ने यह संदेश दिया कि भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी हजारों वर्ष पहले थी, और इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।