Mango Farming: लखनऊ के मलिहाबाद में आंधी-तूफान से आम की फसल को भारी नुकसान हुआ। 3500 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित, 20-30 प्रतिशत फसल झड़ी, बागवानों ने सरकार से मुआवजे की मांग उठाई।
Mango Crop Damage: उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध मलिहाबाद आम पट्टी एक बार फिर मौसम की मार से जूझ रही है। शनिवार देर रात आई तेज आंधी और हल्की बारिश ने बागवानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। करीब 3500 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले आम के बागों में लगे छोटे फलों का भारी नुकसान हुआ है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार 20 से 30 प्रतिशत तक फसल प्रभावित हुई है, जबकि यदि मौसम का यही रुख जारी रहा तो नुकसान 50 से 60 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
मलिहाबाद, माल और काकोरी विकास खंडों में फैले इस क्षेत्र को प्रदेश की “आम की राजधानी” कहा जाता है। यहां के दशहरी आम की देश-विदेश में पहचान है। इस वर्ष बागवानों को बेहतर उत्पादन की उम्मीद थी, क्योंकि पेड़ों पर इस बार अच्छी संख्या में छोटे फल लगे थे। लेकिन अचानक आए तूफान ने इन उम्मीदों को गहरा झटका दिया।
शनिवार रात चली तेज हवाओं की रफ्तार 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे तक आंकी गई। इसके साथ हुई हल्की बारिश ने स्थिति को और खराब कर दिया। तेज हवा के झोंकों से बड़ी संख्या में छोटे आम के फल टूटकर जमीन पर गिर गए।
रविवार सुबह जब बागवान अपने बागों में पहुंचे तो जमीन पर बिखरे छोटे-छोटे आमों को देखकर उनकी मायूसी साफ झलक रही थी। कई बागों में पेड़ों के नीचे गिरे फलों की मोटी परत दिखाई दी, जो इस नुकसान की गंभीरता को बयां कर रही थी।
माल क्षेत्र के प्रमुख बागवान कुंवर माधवेन्द्र देव सिंह ने बताया कि उनके बाग में ही करीब दो लाख रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। वहीं मलिहाबाद के अकरम, जिनके पास लगभग 50 बीघे का बाग है, ने बताया कि उन्हें करीब ढाई लाख रुपये की क्षति का अनुमान है।
बागवानों का कहना है कि इस अवस्था में गिरे छोटे आम किसी भी काम के नहीं रहते। न तो इन्हें बाजार में बेचा जा सकता है और न ही इनका अन्य उपयोग संभव है। ऐसे में यह सीधा आर्थिक नुकसान है, जिसकी भरपाई करना आसान नहीं है।
मार्च के तीसरे सप्ताह से ही मौसम का मिजाज अस्थिर बना हुआ था। अप्रैल की शुरुआत से ही तेज हवाएं चलने लगी थीं, जिससे बागवानों में पहले से ही चिंता थी। हालांकि, उन्हें उम्मीद थी कि स्थिति संभल जाएगी, लेकिन शनिवार रात की आंधी ने उनकी आशंकाओं को सच साबित कर दिया।
केंद्रीय कृषि विज्ञान केंद्र के निदेशक और कृषि वैज्ञानिक डॉ. डी. दामोदर के अनुसार, इस समय आम के फल ‘शैशव अवस्था’ में होते हैं, जो बेहद संवेदनशील चरण होता है। इस दौरान आंधी, बारिश या ओलावृष्टि से फलों का गिरना सामान्य है, लेकिन तेज हवाएं होने पर नुकसान का स्तर काफी बढ़ जाता है।
उन्होंने बताया कि नमी बढ़ने के कारण पेड़ों की टहनियों और डंठलों पर फफूंद जनित रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है। इससे छोटे फल काले पड़कर तेजी से गिरने लगते हैं, जिससे नुकसान और अधिक बढ़ सकता है।
डॉ. दामोदर ने बागवानों को सलाह दी है कि वे पौध वृद्धि नियामकों और फफूंदनाशक दवाओं का छिड़काव करें। इससे फलों के गिरने की दर को कुछ हद तक कम किया जा सकता है और फसल को बचाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि समय रहते उचित कदम उठाने से नुकसान को सीमित किया जा सकता है, हालांकि पूरी तरह बचाव संभव नहीं है।
इस भारी नुकसान के बाद बागवानों ने सरकार से मुआवजे की मांग की है। उनका कहना है कि लगातार बदलते मौसम के कारण उनकी आय पर गंभीर असर पड़ रहा है और ऐसे में सरकारी सहायता बेहद जरूरी है। स्थानीय किसानों ने प्रशासन से मांग की है कि क्षेत्र का सर्वे कराकर नुकसान का सही आकलन किया जाए और प्रभावित बागवानों को जल्द से जल्द आर्थिक सहायता दी जाए।
मलिहाबाद की आम पट्टी न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था का आधार है, बल्कि यह प्रदेश के निर्यात में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है। यदि फसल का नुकसान इसी तरह जारी रहा, तो इसका असर आम की उपलब्धता और कीमतों पर भी पड़ सकता है। मलिहाबाद व्यापारी सुबोध का मानना है कि उत्पादन में कमी आने से बाजार में आम की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे उपभोक्ताओं पर भी असर पड़ेगा।
फिलहाल बागवानों की नजरें आसमान पर टिकी हुई हैं। वे मौसम के स्थिर होने का इंतजार कर रहे हैं, ताकि आगे और नुकसान से बचा जा सके। हर गुजरता दिन उनके लिए चिंता और उम्मीद दोनों लेकर आ रहा है।