लखनऊ से नेताजी सुभाष चंद्र बोस का गहरा नाता रहा। कांग्रेस अध्यक्ष बनने से लेकर छात्र आंदोलनों, ऐतिहासिक भाषणों और आज़ाद हिंद फौज तक, जानिए कैसे लखनऊ ने उनके विचारों को नई ताकत दी।
Intro: लखनऊ का स्वतंत्रता आंदोलन से गहरा नाता रहा है। इस कड़ी में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम खास तौर पर जुड़ा है। आज़ादी की लड़ाई के दौरान लखनऊ में उनके विचारों, भाषणों और मौजूदगी ने छात्रों से लेकर आम लोगों तक को नई दिशा दी।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का लखनऊ से रिश्ता सिर्फ एक पड़ाव भर नहीं था। बल्कि यह शहर उनके राजनीतिक सफर का अहम हिस्सा बना। साल 1928 में लखनऊ में हुई ऑल पार्टीज कॉन्फ्रेंस के दौरान इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना हुई। इस संगठन की शुरुआत उन युवा राष्ट्रवादियों ने की थी जो कांग्रेस की ‘डोमिनियन स्टेटस’ की मांग से संतुष्ट नहीं थे। और भारत के लिए पूरी आज़ादी चाहते थे। सुभाष चंद्र बोस ने जवाहरलाल नेहरू और एस. श्रीनिवास अयंगर जैसे नेताओं के साथ इस मांग का खुलकर समर्थन किया।
1930 के दशक की शुरुआत में भी बोस का लखनऊ से नाता जुड़ा रहा। ब्रिटिश हुकूमत की हिरासत में रहते हुए। जब वह टीबी से पीड़ित थे। तब उनका इलाज लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में हुआ। इस बात का जिक्र उनके चयनित लेखन में भी मिलता है। इसके बाद 20 नवंबर 1938 को, कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने के बाद नेताजी का लखनऊ आगमन ऐतिहासिक बन गया। बंगाली क्लब में उनका भव्य स्वागत किया गया। जहां बड़ी संख्या में लोग उन्हें देखने और सुनने पहुंचे। इसी दौरान लखनऊ से जुड़े कई लोग, जो आगे चलकर आज़ाद हिंद फौज का हिस्सा बने।
लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों पर भी नेताजी का खास असर था। ब्रिटिश सेंसरशिप के बावजूद छात्र चोरी-छिपे रेडियो पर उनके भाषण सुनते थे। 1939 में, जब उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की, तो लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय हॉल में उनका भाषण हुआ। ‘नेताजी जिंदाबाद’ के नारों से गूंजते इस कार्यक्रम में उन्होंने अंग्रेजी में ओजस्वी भाषण दिया, जिसे लोग आज भी याद करते हैं।
अमीनाबाद के झंडेवाला पार्क में हुई उनकी जनसभा भी ऐतिहासिक रही। कहा जाता है कि जब उन्होंने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा लगाया। तो उसकी गूंज दूर तक सुनाई दी। यहीं उन्होंने कहा था कि भारत अपना संविधान खुद बनाएगा। किसी विदेशी ताकत के दबाव में नहीं। आज भी उत्तर प्रदेश राज्य अभिलेखागार में नेताजी से जुड़े पत्र और दस्तावेज सुरक्षित हैं। जो लखनऊ और सुभाष चंद्र बोस के इस ऐतिहासिक रिश्ते की गवाही देते हैं।