लखनऊ

UGC 2026 के नए नियमों पर भाजपा एमएलसी की आपत्ति, शिक्षा व्यवस्था में जातीय तनाव की चेतावनी

UGC के नए नियमों को लेकर सियासत और शिक्षा जगत में हलचल तेज हो गई है। भाजपा एमएलसी देवेन्द्र प्रताप सिंह ने आयोग को पत्र लिखकर चेताया है कि प्रस्तावित प्रावधान सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचा सकते हैं और इससे उच्च शिक्षा व्यवस्था में जातीय तनाव बढ़ने की आशंका है।

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Jan 25, 2026
UGC के नए नियमों पर भाजपा Mlc देवेन्द्र प्रताप सिंह की आपत्ति (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

UGC Rules: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा वर्ष 2026 के लिए प्रस्तावित नए नियमों को लेकर सियासत और शिक्षा जगत में बहस तेज हो गई है। भाजपा के विधान परिषद सदस्य (MLC) देवेन्द्र प्रताप सिंह ने यूजीसी को एक विस्तृत चिट्ठी लिखकर इन नियमों पर गंभीर आपत्ति जताई है। उन्होंने आशंका व्यक्त की है कि यदि इन नियमों को वर्तमान स्वरूप में लागू किया गया, तो इससे देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो सकती है और समाज में जातीय संघर्ष को बढ़ावा मिल सकता है।

देवेन्द्र प्रताप सिंह ने अपनी चिट्ठी में कहा है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग-2026 का यह निर्णय सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचाने वाला है। उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था का मूल उद्देश्य समाज को जोड़ना और समान अवसर प्रदान करना होना चाहिए, लेकिन प्रस्तावित नियम इसके उलट प्रभाव डाल सकते हैं। इससे समाज में गहरी खाई पैदा होगी और विश्वविद्यालयों व उच्च शिक्षा संस्थानों में पठन-पाठन का स्वस्थ माहौल समाप्त हो जाएगा।

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उन्होंने यह भी आशंका जताई कि इन नियमों के दुरुपयोग की पूरी संभावना है। किसी भी छात्र के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए, चाहे वह किसी भी वर्ग या जाति से संबंधित हो। देवेन्द्र प्रताप सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दलित और पिछड़े वर्ग के छात्रों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सामान्य वर्ग के छात्रों को असुरक्षित महसूस न करना पड़े। उनके अनुसार, यूजीसी द्वारा बनाए गए नए नियम सामान्य वर्ग के उत्पीड़न का एक सशक्त हथियार बन सकते हैं।

भाजपा एमएलसी ने यह भी उल्लेख किया कि भारतीय न्याय संहिता में पहले से ही ऐसे कृत्यों के लिए पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं। ऐसे में समता समिति (इक्वलिटी कमेटी) के गठन का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने मांग की है कि इस प्रावधान को तत्काल निरस्त किया जाए। उनका कहना है कि यदि समिति का गठन किया भी जाना है, तो उसका उद्देश्य भर्तियों और पदोन्नति में आरक्षित वर्ग के चयन को सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि शिक्षा परिसरों में नए विवादों को जन्म देना।

देवेन्द्र प्रताप सिंह ने अपनी चिट्ठी में केवल आपत्तियां ही नहीं उठाईं, बल्कि उच्च शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई ठोस सुझाव भी दिए हैं। उन्होंने कहा कि भारत को उच्च शिक्षा को शोध का केंद्र बिंदु बनाना होगा। अनुसंधान में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि विश्वस्तरीय रिसर्च और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जा सके। इसके लिए साझा प्रयोगशालाओं, शोध परिसरों और उत्कृष्टता केंद्रों का निर्माण जरूरी है।

उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार और निजी क्षेत्र के आपसी सहयोग से उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में बड़े कदम उठाए जा सकते हैं। शोध संस्थानों में प्रतिस्पर्धी वेतन, अकादमिक स्वायत्तता और शोध के अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसके साथ ही, विदेशों में कार्यरत भारतीय प्रतिभाओं को सम्मान पूर्वक भारत वापस लाने की नीति बनाई जानी चाहिए, ताकि देश का रिसर्च इकोसिस्टम और अधिक मजबूत हो सके।

भाजपा एमएलसी ने बड़े विश्वविद्यालयों, बड़े शोध समूहों और साझा प्रयोगशालाओं की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि टीम आधारित शोध संस्कृति को बढ़ावा देकर ही आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। इसके लिए राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जुड़े शोध कार्यों पर विशेष ध्यान देना होगा और उद्योगों के साथ मिलकर योजनाओं को जमीन पर उतारना होगा।

देवेन्द्र प्रताप सिंह ने पेटेंट, स्टार्टअप और सामाजिक प्रभाव वाले शोध कार्यों को बढ़ावा देने की भी वकालत की। उन्होंने कहा कि उत्कृष्ट अनुसंधान के लिए अधिक कोष आवंटित किया जाना चाहिए, ताकि नवाचार को प्रोत्साहन मिल सके और देश वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सके।

उन्होंने अपनी चिट्ठी के अंत में कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का एक ही और अंतिम लक्ष्य होना चाहिए,ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और शोध के ऐसे उत्कृष्ट केंद्र विकसित करना जो एक आत्मनिर्भर, सक्षम और शक्तिशाली राष्ट्र के निर्माण में योगदान दे सकें। शिक्षा व्यवस्था को किसी भी प्रकार के जातीय या सामाजिक तनाव से दूर रखते हुए उसे राष्ट्र निर्माण का मजबूत आधार बनाना ही समय की मांग है। यूजीसी के नए नियमों को लेकर उठी यह आवाज आने वाले दिनों में शिक्षा नीति और राजनीति,दोनों ही क्षेत्रों में व्यापक चर्चा का विषय बनने की संभावना है।

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