लखनऊ

UGC Bill 2026 In Hindi: क्यों लाए गए नए नियम? सबसे ज्यादा परेशानी किस बात से; वो 9 प्वाइंट जिन्हें जानना बेहद जरूरी!

UGC Bill Kya Hai: UGC ने नए नियम क्यों लागू किए हैं? सबसे ज्यादा परेशानी किस बात से है? जानिए 9 आसान प्वाइंट में सबकुछ।

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Jan 28, 2026
UGC Bill Kya Hai: जानिए 9 आसान प्वाइंट में सबकुछ।

UGC Bill: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को एक नया नियम लागू किया है। यह नियम “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations 2026” वाली हेडिंग के नीचे जो कुछ लिखा हुआ है उसकी वजह से ज्यादातर लोगों में असहमति है। जिसके चलते देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं।

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जगह-जगह हो रहा प्रदर्शन

दिल्ली में UGC मुख्यालय के बाहर इस नियम के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया गया। लखनऊ में भी छात्र सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने सरकार पर भेदभावपूर्ण नीति अपनाने का आरोप लगाया और नियम को वापस लेने की मांग की।

प्वाइंट 1: UGC के इस नए नियम के मायने

इस बीच सरकार की ओर से इस मामले पर पहला आधिकारिक बयान सामने आया है। जिसमें कहा गया है कि किसी के साथ भी अन्याय नहीं होने दिया जाएगा। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने यह बयान दिया, लेकिन प्रदर्शन कर रहे छात्रों और शिक्षकों को इसमें किसी तरह की ठोस राहत नजर नहीं आई। नतीजतन, उनकी चिंताएं अब भी बनी हुई हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि UGC के इस नए नियम के मायने क्या हैं और इसमें ऐसा क्या है, जिसने छात्रों से लेकर टीचर्स और प्रोफेसरों तक को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है।

प्वाइंट 2: क्या है नियम का मुख्य उद्देश्य

UGC का कहना है कि इस नए नियम का मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव और असमानता पर प्रभावी तरीके से रोक लगाना है। नियम के तहत सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को इक्विटी सेंटर (Equity Center), **इक्विटी स्क्वॉड ( Equity Squad) और इक्विटी कमेटी (Equity Committee) का गठन करना अनिवार्य होगा। इसके अलावा, शिकायतों के निपटारे के लिए 24×7 हेल्पलाइन की व्यवस्था भी की जाएगी। UGC ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है। ऐसी स्थिति में UGC संबंधित संस्थान की मान्यता रद्द कर सकता है या उसे मिलने वाला फंड रोक सकता है।

प्वाइंट 3: नए नियम का पालन करना सभी शिक्षा संस्थानों के लिए जरूरी

UGC के मुताबिक, साल 2020 से 2025 के बीच पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों से जुड़े भेदभाव की शिकायतों में 100 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई है। UGC ने यह भी बताया कि रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट की ओर से की गई टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए ही यह नया नियम तैयार किया गया है। ये नए नियम साल 2012 में लागू पुराने दिशा-निर्देशों की जगह लाए गए हैं, जो अब तक केवल सलाहात्मक प्रकृति के थे। इसके उलट, Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations 2026 को सभी उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए अनिवार्य बनाया गया है और इसका पालन करना अब जरूरी होगा।

प्वाइंट 4: UGC के नए नियमों के बारे में

नए नियमों के तहत हर कॉलेज और विश्वविद्यालय (University) में एक ‘इक्विटी कमेटी’ का गठन अनिवार्य होगा। यह कमेटी भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि किसी भी छात्र या कर्मचारी के साथ अन्याय ना हो। कमेटी में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), दिव्यांग और महिला प्रतिनिधियों की मौजूदगी अनिवार्य होगी। पिछले साल फरवरी में इन नियमों का ड्राफ्ट सार्वजनिक किया गया था। साथ ही इस पर आम लोगों और संस्थानों से सुझाव भी मांगे गए थे।

ये नियम सुप्रीम कोर्ट (SC) के उस निर्देश के बाद लाए गए हैं, जिसमें कोर्ट ने रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान UGC को नए और प्रभावी नियम बनाने को कहा था। याचिकाओं में 2012 के नियमों को कमजोर और उदासीन बताया गया था, क्योंकि वे केवल कागजों तक सीमित थे और उनके अमल को लेकर कोई ठोस व्यवस्था नहीं थी। हर संस्थान में इसके साथ ही एक ‘इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर’भी बनाया जाएगा, जो कमजोर और वंचित वर्गों के छात्रों को पढ़ाई, फीस से जुड़ी सहायता के साथ-साथ सामाजिक और मानसिक सहयोग प्रदान करेगा।

प्वाइंट 5: क्यों लाए गए नए नियम?

दरअसल, रोहित वेमुला और पायल तड़वी मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने UGC को भेदभाव रोकने के लिए ठोस और प्रभावी नियम बनाने का निर्देश दिया था। इसके बाद ही UGC ने ये नए नियम तैयार किए हैं। नियमों में साफ किया गया है कि इनका उद्देश्य धर्म, नस्ल, लिंग, जन्मस्थान, जाति या दिव्यांगता के आधार पर होने वाले हर तरह के भेदभाव को खत्म करना है। खास तौर पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांग व्यक्तियों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को रोकना और उच्च शिक्षण संस्थानों में पूर्ण समानता सुनिश्चित करना इनका मकसद है।

2012 के नियम केवल सलाहात्मक थे, जबकि 2026 के नए नियम अनिवार्य और बाध्यकारी होंगे। अब सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को इन नियमों के तहत इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर, इक्विटी कमेटी, 24×7 हेल्पलाइन और प्रभावी निगरानी तंत्र बनाना ही होगा।

प्वाइंट 6: UGC के नए नियमों पर विरोध क्यों?

इन नए नियमों को लेकर देश के कई हिस्सों में विरोध देखने को मिल रहा है। खासतौर पर जनरल कैटेगरी से जुड़े कुछ लोगों का कहना है कि ये प्रावधान उनके हितों के अनुकूल नहीं हैं। इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी एक याचिका दायर की गई है।

याचिका में दलील दी गई है कि नियमों में ‘जाति-आधारित भेदभाव’ की परिभाषा को मुख्य रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित कर दिया गया है। इससे जनरल कैटेगरी के छात्रों और कर्मचारियों को किसी भी तरह के भेदभाव की स्थिति में संस्थागत सुरक्षा नहीं मिल पाएगी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस तरह के प्रावधान खुद उनके लिए भेदभावपूर्ण साबित हो सकते हैं, इसी वजह से इन नियमों का विरोध किया जा रहा है।

रेगुलेशन 3(e) में ‘भेदभाव’ को धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्मस्थान और दिव्यांगता के आधार पर किसी भी तरह के अनुचित या पक्षपातपूर्ण व्यवहार के रूप में परिभाषित किया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस तरह की परिभाषा के कारण जनरल या गैर-आरक्षित वर्ग के छात्र और शिक्षक, यदि वे जाति के आधार पर उत्पीड़न या पक्षपात का सामना करते हैं, तो उन्हें संस्थागत संरक्षण और प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था से वंचित किया जा सकता है।

प्वाइंट 7: क्या है नियमों में भेदभाव की परिभाषा

नियमों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के साथ धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान या दिव्यांगता के आधार पर किसी भी तरह का अनुचित या पक्षपातपूर्ण व्यवहार किया जाता है, तो उसे भेदभाव माना जाएगा। हालांकि आलोचकों का कहना है कि भेदभाव की यह परिभाषा पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, जिससे इसके मनमाने इस्तेमाल और दुरुपयोग की आशंका भी जताई जा रही है।

प्वाइंट 8: क्या जिम्मेदारी संस्थानों पर होगी?

नियमों के तहत किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान के प्रमुख की जिम्मेदारी होगी कि कैंपस में किसी भी तरह का भेदभाव ना हो। शिकायत दर्ज कराने के लिए ऑनलाइन पोर्टल और हेल्पलाइन की व्यवस्था की जाएगी। यदि कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है और उसे UGC की विभिन्न योजनाओं से बाहर भी किया जा सकता है। इसके अलावा हर उच्च शिक्षण संस्थान (HEI) में एक इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर बनाना जरूरी होगा, जो शैक्षणिक और सामाजिक काउंसलिंग के साथ-साथ कैंपस में विविधता को बढ़ावा देगा। इस सेंटर के तहत गठित इक्विटी कमेटी में ओबीसी, एससी, एसटी, दिव्यांग (PwD) और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा। यह कमेटी भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच करेगी और उनके समाधान की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगी।

प्वाइंट 9: किस बात से सबसे ज्यादा परेशानी

इन नियमों के खिलाफ जारी प्रदर्शन और विरोध में एक बड़ी चिंता भी शामिल है। आलोचकों का कहना है कि नए नियमों में ‘झूठी शिकायतों’ से निपटने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है और इक्विटी कमेटी में जनरल कैटेगरी के प्रतिनिधित्व का जिक्र भी नहीं किया गया है। इसका मतलब है कि यदि विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है, तो कमेटी के सदस्य अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर एकतरफा निर्णय कर सकते हैं। इस पहलू को नियमों में पर्याप्त रूप से नहीं देखा गया है।

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