
Digital Heritage: भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और बौद्धिक धरोहर को संरक्षित करने की दिशा में उत्तर प्रदेश ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। ज्ञान भारतम् मिशन के तहत प्रदेश के 71 जिलों से अब तक 12 लाख 20 हजार 432 से अधिक दुर्लभ और ऐतिहासिक पांडुलिपियों का विवरण ज्ञान भारतम् पोर्टल पर अपलोड किया जा चुका है। यह उपलब्धि न केवल उत्तर प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से सदियों पुराने ज्ञान को सुरक्षित रखने की दिशा में राज्य तेजी से आगे बढ़ रहा है।
संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने मंगलवार को इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि ज्ञान भारतम् मिशन के तहत चल रहे व्यापक सर्वेक्षण और डिजिटलीकरण अभियान ने प्रदेश को पांडुलिपि संरक्षण के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल कर दिया है। उन्होंने कहा कि यह अभियान आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान, संस्कृति और इतिहास के अनमोल खजाने को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।
ज्ञान भारतम् पोर्टल पर अपलोड की गई पांडुलिपियों के आंकड़ों के अनुसार वाराणसी प्रदेश में पहले स्थान पर है। यहां से कुल 3 लाख 12 हजार 724 पांडुलिपियों का विवरण दर्ज किया गया है। धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विश्व प्रसिद्ध वाराणसी सदियों से ज्ञान और शिक्षा का केंद्र रहा है। यही कारण है कि यहां बड़ी संख्या में दुर्लभ ग्रंथ और पांडुलिपियां संरक्षित रूप में उपलब्ध हैं।
वाराणसी की पांडुलिपियों में वेद, उपनिषद, दर्शन, आयुर्वेद, चिकित्सा विज्ञान, धर्मशास्त्र, ज्योतिष, कर्मकांड, तंत्र, कृषि विज्ञान और भगवान बुद्ध से संबंधित दुर्लभ साहित्य शामिल है। विशेष रूप से संस्कृत भाषा में लिखित ऋग्वेद संहिता, ऋग्वेद पदपाठ, ऐतरेय ब्राह्मण, ऐतरेय आरण्यक भाष्य, रुद्री, शांति मंत्र, पवमान सूक्त तथा शुक्ल यजुर्वेद से संबंधित पांडुलिपियां भारतीय ज्ञान परंपरा की महानता को दर्शाती हैं।
पांडुलिपियों के संरक्षण और सूचीकरण के मामले में अयोध्या और रामपुर भी अग्रणी जिलों में शामिल हैं। अयोध्या से 2 लाख 44 हजार 644 पांडुलिपियों का विवरण पोर्टल पर दर्ज किया गया है, जबकि रामपुर से 2 लाख 32 हजार 735 पांडुलिपियों की जानकारी अपलोड की गई है।
इसके अतिरिक्त प्रयागराज से 90 हजार 114, सिद्धार्थनगर से 58 हजार 6, सहारनपुर से 41 हजार 235, मथुरा से 39 हजार 765 और लखनऊ से 34 हजार 758 पांडुलिपियों का विवरण प्राप्त हुआ है। यह आंकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि उत्तर प्रदेश का लगभग हर क्षेत्र किसी न किसी रूप में प्राचीन ज्ञान और सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षक रहा है।
ज्ञान भारतम् मिशन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल बड़े शहरों या संस्थानों की ही भागीदारी नहीं है, बल्कि छोटे जिलों और निजी संग्रहकर्ताओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बलिया, इटावा, सीतापुर, गोरखपुर, मऊ, आगरा और फर्रुखाबाद जैसे जिलों ने हजारों पांडुलिपियों की जानकारी उपलब्ध कराई है।
महोबा, उन्नाव, बागपत, फिरोजाबाद, अलीगढ़, आजमगढ़, बाराबंकी, ललितपुर, जालौन और कानपुर नगर से भी बड़ी संख्या में पांडुलिपियां सामने आई हैं। इसके अलावा गाजीपुर, संभल, सोनभद्र, प्रतापगढ़, कुशीनगर, बस्ती, मुजफ्फरनगर, कन्नौज, चित्रकूट और अंबेडकरनगर जैसे जिलों का योगदान भी उल्लेखनीय रहा है। यह तथ्य दर्शाता है कि उत्तर प्रदेश के गांवों, मंदिरों, मठों, पुस्तकालयों और निजी संग्रहों में आज भी ज्ञान की अनगिनत धरोहरें सुरक्षित हैं।
ज्ञान भारतम् मिशन के दौरान कई ऐसी दुर्लभ पांडुलिपियां सामने आई हैं जिन्होंने इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का विशेष ध्यान आकर्षित किया है। इनमें लगभग 250 वर्ष पुरानी चित्रयुक्त श्रीमद्भगवद्गीता प्रमुख है। इस पांडुलिपि में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और उपदेशों से संबंधित सुंदर चित्रों के साथ गीता के श्लोक अंकित हैं।
इसके अलावा वर्ष 1867 ईस्वी की अत्यंत लघु आकार वाली श्रीमद्भगवद्गीता भी विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। छोटे आकार के बावजूद इसमें गीता के सभी 700 श्लोक चित्रों सहित सुरक्षित रूप में उपलब्ध हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी पांडुलिपियां न केवल धार्मिक महत्व रखती हैं, बल्कि उस समय की कला, लेखन शैली और पुस्तक निर्माण तकनीक की भी जानकारी देती हैं।
मिशन के दौरान वर्ष 1640 ईस्वी की हरिवंश पुराण पांडुलिपि भी सामने आई है। हरिवंश पुराण को महाभारत का अंतिम अठारहवां पर्व माना जाता है और इसका भारतीय धार्मिक साहित्य में विशेष महत्व है।
इसी प्रकार वर्ष 1840 ईस्वी की विष्णु पुराण पांडुलिपि भी संरक्षित की गई है। इसमें भगवान विष्णु से संबंधित विभिन्न कथाओं, धार्मिक सिद्धांतों और सांस्कृतिक मान्यताओं का विस्तृत वर्णन मिलता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी पांडुलिपियां भारतीय धर्म, इतिहास और दर्शन के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
ज्ञान भारतम् मिशन के अंतर्गत लगभग 200 वर्ष पुरानी ताड़पत्र पर लिखित ‘पुरुषोत्तम माहात्म्य’ पांडुलिपि भी मिली है। ताड़पत्र पर लेखन भारतीय परंपरा की एक प्राचीन विधा रही है और इस माध्यम से हजारों वर्षों तक ज्ञान का संरक्षण किया जाता रहा।
पुरुषोत्तम माहात्म्य में भगवान श्रीकृष्ण की उपासना, धार्मिक अनुष्ठानों और आध्यात्मिक मान्यताओं का विस्तार से वर्णन मिलता है। ताड़पत्रों पर लिखित ऐसी पांडुलिपियां आज बेहद दुर्लभ मानी जाती हैं और उनका संरक्षण सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि ज्ञान भारतम् मिशन का उद्देश्य केवल पांडुलिपियों की खोज करना नहीं, बल्कि उनका वैज्ञानिक संरक्षण, डिजिटलीकरण और दस्तावेजीकरण भी है। मिशन के तहत संस्थागत और निजी संग्रहों में सुरक्षित पांडुलिपियों का सूचीकरण किया जा रहा है ताकि उनकी जानकारी स्थायी रूप से सुरक्षित रह सके।
उन्होंने बताया कि इस अभियान के माध्यम से पांडुलिपियों का भाषाई अध्ययन, अनुवाद, अनुसंधान और प्रकाशन भी किया जाएगा। इससे देश-विदेश के शोधकर्ताओं को भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने और उस पर अध्ययन करने में सहायता मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल माध्यम में उपलब्ध कराई जा रही ये पांडुलिपियां आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान का एक विशाल स्रोत साबित होंगी। इससे न केवल भारतीय इतिहास, दर्शन, साहित्य और विज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर नए शोध को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि दुनिया भर के विद्वानों को भी भारतीय ज्ञान परंपरा तक आसान पहुंच प्राप्त होगी।
ज्ञान भारतम् मिशन के माध्यम से उत्तर प्रदेश आज अपनी हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को आधुनिक तकनीक से जोड़ते हुए उसे सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। यह पहल न केवल प्रदेश बल्कि पूरे देश के लिए गौरव का विषय बनती जा रही है।