लखनऊ

यूपी सरकार के नेताओं ने अटका रखी थी टाटा मोटर्स की फाइल, धमकी के बाद मिली हरी झंडी

2008 में सिंगूर आंदोलन के कारण टाटा मोटर्स को नैनो प्लांट गुजरात के साणंद ले जाना पड़ा। उसी दौरान उत्तर प्रदेश में भी कंपनी को दिक्कतें आईं। टाटा मोटर्स ब्राज़ील की मार्कोपोलो के साथ लखनऊ में बस प्लांट लगाना चाहती थी, क्योंकि डीटीसी से सीएनजी बसों का बड़ा ऑर्डर मिला था।
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Updated: 19 Jan 2026, 11:24 AM IST
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2008 में मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं।

पश्चिम बंगाल के सिंगूर में जिन दिनों आंदोलन चल रहा था और इसकी वजह से टाटा मोटर्स को नैनो कार का प्लांट वहां से साणंद (गुजरात) ले जाना पड़ा, उन्हीं दिनों उत्तर प्रदेश में भी कंपनी को एक कारख़ाना लगाने में मुश्किल आ रही थी। यह बात साल 2008 की है। टाटा मोटर्स ब्राज़ील की कंपनी मार्को पोलो के साथ मिल कर बस बनाने के लिए लखनऊ में प्लांट लगाना चाह रही थी। कंपनी को दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) से बस का बड़ा ऑर्डर मिला था। डीटीसी को पुरानी बसों को हटा कर सीएनजी बसें लाने का आदेश मिला हुआ था।

टाटा मोटर्स ने लखनऊ में कारख़ाना लगाने के लिए जरूरी औपचारिकताएं पूरी कीं। लेकिन, उत्तर प्रदेश सरकार के अफसर प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ा क्लीयरेंस दे ही नहीं रहे थे। अफसरों ने प्रक्रिया या कागजात से जुड़ी जो भी कमियां बताईं, कंपनी ने सब पूरी कर दीं। फिर भी काम नहीं हो रहा था।

टाटा समूह पर लिखी शशांक शाह की किताब Tata Group From Trochbearers to Trailblazers के मुताबिक इस मामले को लेकर टाटा मोटर्स का एक अफसर यूपी के मुख्य सचिव से भी मिला था। उन्होंने देरी पर तो चिंता जताई, लेकिन कुछ भी कर पाने से हाथ खड़े कर दिए। उन्होंने कहा, 'मैं आपकी मुश्किल समझ सकता हूं, लेकिन मैं आपकी समस्या आगे रखने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता।'

इस बीच कुछ नेताओं की ओर से टाटा मोटर्स से संपर्क साधा जा रहा था। वे कंपनी से कुछ 'लाभ' चाहते थे। उधर, कंपनी को नुकसान हो रहा था। दिल्ली सरकार का उस पर भारी दबाव था। बस देने में देरी के चलते जुर्माना भी भरना पड़ रहा था।

टाटा सर्विसेज के एमडी टीआर डूंगाजी दो बार खुद यूपी सरकार के अफसरों से मिल चुके थे और साफ कह चुके थे कि कानून से इतर जाकर वे कुछ नहीं कर पाएंगे। दो बार मुख्यमंत्री से मिलने का वक्त मांगा गया, लेकिन उधर से मना कर दिया गया। मंजूरी का इंतजार करते-करते 4-5 महीने बीत गए थे। अफसर शर्मसार हो रहे थे। हर बार पूछने पर वे यही कहते कि आपकी तरफ से सारे कागजात दुरुस्त हैं, हमें समझ नहीं आ रहा कि फिर मंजूरी क्यों रुकी है! अंततः यूपी सरकार को टाटा मोटर्स की ओर से साफ संदेश दिया गया कि अगर ऐसा ही रहा तो सिंगूर की तरह लखनऊ से भी कारख़ाना कहीं और ले जाना पड़ेगा। ऐसा हुआ तो नुकसान यूपी सरकार का ही होगा। आखिरकार, छह महीने बाद अफसरों को मंजूरी देनी ही पड़ी।

बता दें कि 2006 में पश्चिम बंगाल के सिंगूर में टाटा मोटर्स को देश की सबसे सस्ती कार 'नैनो' बनाने के लिए जमीन दी गई थी। लेकिन, इसका बड़ा विरोध हुआ था। अंततः 2008 में कंपनी ने सिंगूर में प्लांट नहीं लगाने का निर्णय लिया था और गुजरात के साणंद से उत्पादन शुरू किया था। (पूरी कहानी जानने में रुचि हो तो यहां क्लिक करें)

टाटा को सिंगूर में जमीन दिए जाने के खिलाफ हुए आंदोलन के 20 साल बाद आज एक बार फिर सिंगूर चर्चा में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 जनवरी को सिंगूर में रैली की और भाजपा इसे 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बनाने का संकेत दे रही है।

Modi in Singur: सिंगूर मुद्दे का एक फायदा तो नरेंद्र मोदी 2008 में उठा चुके हैं, लेकिन इस बार निशाना ममता सरकार है। (फोटो डिज़ाइन: पत्रिका)
Updated on:
19 Jan 2026, 11:24 AM IST
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