
Metabolic Syndrome Impact: मेटाबोलिक सिंड्रोम महज एक बीमारी नहीं है, बल्कि कई स्वास्थ्य समस्याओं का ग्रुप है। यह ऐसी बीमारियों का समूह है, जो दिल की बीमारी, टाइप-2 डायबिटीज और स्ट्रोक का खतरा बढ़ाती हैं। अगर इनमें से कोई भी 3 स्थितियां एक साथ हों तो इसे मेटाबोलिक सिंड्रोम माना जाता है। इसमें उच्च रक्तचाप, उच्च रक्त शर्करा, कमर के आसपास अत्यधिक वसा और उच्च कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड स्तर शामिल है। मेटाबोलिक सिंड्रोम से ग्रसित मरीज को कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, जो लिवर पर गंभीर असर डालती हैं।
मेटाबोलिक सिंड्रोम से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़ रही है। अमेरिका में लगभग एक तिहाई वयस्क इससे ग्रसित हैं। स्वस्थ जीवनशैली में बदलाव से मेटाबोलिक सिंड्रोम के कारण होने वाली गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को धीमा या रोका जा सकता है। मेटाबोलिक सिंड्रोम को सिंड्रोम X', इंसुलिन रेजिस्टेंस सिंड्रोम और डिसमेटाबोलिक सिंड्रोम जैसे नामों से भी जानते हैं।
मेयो क्लिनिक (Mayo Clinic) के मुताबिक, अगर किसी महिला या पुरुष के पेट का अधिक वजन, हाइपरट्राइग्लिसराइडेमिया का हाई लेबल, कम HDL कोलेस्ट्रॉल,हाई ब्लड प्रेशर जैसी दिक्कत है तो यह स्थित मेटाबोलिक सिंड्रोम का क्राइटेरिया पूरा करती है। आमतौर पर मेटाबोलिक सिंड्रोम से पीड़ित लोगों का शरीर सेब के आकार का होता है। यानी उनकी कमर चौड़ी होती है और पेट के आसपास चर्बी काफी ज्यादा होती है।
कमर का अधिक आकार मेटाबोलिक सिंड्रोम का संकेत हो सकता है। इसके अलावा, उच्च रक्त शर्करा वाले लोगों को मधुमेह के लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। इनमें सामान्य से अधिक प्यास लगना, सामान्य से अधिक पेशाब आना, थकान महसूस होना और धुंधली दृष्टि शामिल है। मेटाबोलिक सिंड्रोम का सीधा संबंध अधिक वजन या मोटापे और शारीरिक निष्क्रियता से है।
मेटाबोलिक सिंड्रोम का संबंध इंसुलिन प्रतिरोध नामक स्थिति से भी है। सामान्य तौर पर पाचन तंत्र भोजन को शर्करा में परिवर्तित करता है। अग्न्याशय इंसुलिन नामक हार्मोन बनाता है। इंसुलिन शर्करा को कोशिकाओं में प्रवेश करने में मदद करता है, ताकि इसे ऊर्जा के रूप में उपयोग किया जा सके।
इंसुलिन प्रतिरोध से ग्रस्त लोगों में, कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं देती हैं। इसलिए ग्लूकोज नामक शर्करा कोशिकाओं में आसानी से प्रवेश नहीं कर पाती है। ऐसी स्थिति में ब्लड शुगर का स्तर बढ़ जाता है, भले ही शरीर ब्लड शुगर को कम करने के लिए अधिक इंसुलिन का उत्पादन कर रहा हो।
मुंबई के सैफी हॉस्पिटल में हेपेटोलॉजी और लिवर ट्रांसप्लांट स्पेशलिस्ट डॉ. चेतन कलाल के मुताबिक, लिवर शरीर का मुख्य मेटाबोलिक अंग होता है। यह पाचन तंत्र से गुजरने वाली हर चीज को तोड़ता है, फैट जमा करता है, ब्लड शुगर को कंट्रोल करता है और खून से टॉक्सिन्स को साफ करता है। जैसे-जैसे मेटाबोलिक सिंड्रोम बढ़ता है, लिवर पर दबाव भी बढ़ता है। इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण, हेपेटोसाइट्स (लिवर की कोशिकाओं) में ज्यादा फैट जमा होने लगता है। इस स्टेज को मेटाबोलिक-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) कहा जाता है, जिसे पहले नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज के नाम से जाना जाता था।
मेटाबोलिक सिंड्रोम (जैसे फैटी लिवर या MASLD) के शुरुआती दौर में, लिवर में फैट जमा होने से दबाव बढ़ता है, लेकिन इससे होने वाले नुकसान को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। इस स्टेज पर लिवर के टिश्यू को कोई स्थाई नुकसान नहीं पहुंचता, दूसरे शब्दों में कहें तो नुकसान की भरपाई की जा सकती है। हालांकि, अगर मेटाबोलिक गड़बड़ी का समय पर इलाज न किया जाए तो कुछ मरीजों में यह मेटाबोलिक-एसोसिएटेड स्टीटोहेपेटाइटिस (MASH) में बदल जाता है। इस स्थिति में, फैट से भरे लिवर में सूजन आ जाती है और हेपेटोसाइट्स (लिवर सेल्स) मरने लगती हैं।
इसके अलावा फाइब्रोसिस (स्कार टिशू का जमा होना) लिवर के फंक्शनल टिशू की जगह लेने लगता है। कुछ मरीजों में, फाइब्रोसिस सिरोसिस में बदल जाता है और कुछ छोटे लेकिन खास ग्रुप में, यह हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा (लिवर कैंसर) में बदल जाता है। मेटाबोलिक लिवर डिजीज से होने वाला लिवर कैंसर (जो शराब न पीने या वायरल हेपेटाइटिस के बिना होता है) अब भारत के शहरी क्षोत्रों में 40 से 50 साल के मरीजों में बढ़ रहा है।
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, मेटाबोलिक सिंड्रोम की समस्या काफी आम हो गई है। स्टडी के मुताबिक, भारत के शहरी क्षेत्रों में इसका अधिक असर देखने को मिल रहा है। भारत के शहरी क्षेत्रों में रहने वाले 25 से 38 प्रतिशत वयस्कों को फैटी लिवर की समस्या है और 30 से 50 साल की उम्र के लोगों में यह तेजी से बढ़ रही है। मेटाबोलिक सिंड्रोम से ग्रसित ज्यादातर लोगों को इस समस्या के बारे में पता ही नहीं होता है। लिवर में ज्यादा फैट या शुरुआती स्टेज की फाइब्रोसिस होने के बावजूद, स्टैंडर्ड ALT और AST की रीडिंग सामान्य रेंज में ही रह सकती है।
स्वस्थ जीवनशैली अपनाने से मेटाबोलिक सिंड्रोम पैदा करने वाली स्थितियों से बचाव किया जा सकता है। मेटाबोलिक सिंड्रोम के असर को कम करने के लिए कुछ सामान्य गतिविधियां अपनाई जा सकती हैं। हालांकि, पूरी तरह से स्वस्थ जीवन शैली और उपचार के लिए एक्सपर्ट की राय जरूरी है।