
NASA, Poland and Dubai Medical Research: कोविड-19 की दूसरी और तीसरी लहर में पूरी दुनिया ने देखा-ऑक्सीजन,वेंटिलेटर, स्टेरॉयड और एंटीबायोटिक होने के बावजूद मरीज नहीं बच रहे थे और आईसीयू में भर्ती होते ही 48 घंटे में मल्टी ऑर्गन फेल हो रहे थे, मगर मगर नासा की मानद वैज्ञानिक, पोलैंड और दुबई के आईसीयू विशेषज्ञों की टीम ने 1000 मरीजों पर 3 साल रिसर्च कर मेडिकल हेल्थ की दुनिया में कमाल कर दिया है। जयपुर मूल के भारतवंशी चिकित्सक डॉ. मयंक वत्स ने दुबई से patrika.com के साथ फोन पर की गई एक्सक्लूसिव बातचीत में यह खुलासा किया। डॉ. मयंक वत्स ने बताया: कोविड के 90% गंभीर लक्षण हिस्टामाइन के ओवरडोज जैसे ही हैं।
न्यूरो-आर्किटेक्चर एक्सपर्ट और नासा की मानद वैज्ञानिक विंची पावर नैप, ड्रीम्स स्पेस की इनोवेटर मैग्डेलेना फिल्सेक, दुबई के रशीद अस्पताल के वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्ट और इंटेंसिविस्ट जयपुर मूल के डॉ. मयंक वत्स और पोलैंड की वारसो यूनिवर्सिटी की अन्ना स्करजिनियर्ज-प्लुटेका की टीम ने बताया कि कोविड-19, SIRS और सेप्सिस में मौत का सबसे बड़ा कारण मास्ट कोशिकाओं से निकलने वाला हिस्टामाइन का तूफान है और इसका इलाज हमारे घर में पहले से मौजूद है - एंटीहिस्टामाइन गोली।
टीम का यह यह शोध अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल्स में प्रकाशित हुआ है और विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित यूरोप और मध्य पूर्व के कई बड़े सम्मेलनों में प्रस्तुत किया जा चुका है। डब्ल्यूएचओ और यूरोपीय क्रिटिकल केयर सोसाइटी में इस पेपर की खूब सराहना हुई है। कई देशों ने अब अपने कोविड प्रोटोकॉल में H1 और H2 ब्लॉकर जोड़ने पर विचार शुरू कर दिया है। पोलैंड की अन्ना स्करजिनियर्ज-प्लुटेका का कहना है कि ये शोध दिखाता है कि कैसे एलर्जी की एक साधारण दवा, जीवन रक्षक बन सकती है और साइंस को अब बक्सों से बाहर निकलना होगा।
हिस्टामाइन और एंटी हिस्टामाइन रिसर्च को ऐसे समझें। (कंटेंट: मेडिकल जर्नल्स, विजुअल डिजाइन: ChatGPT)
उनका यह रिसर्च फिल्सेक एम वत्स एम स्कार्ज़िंस्का-प्लुटेका ए. _कोविड-19 में हिस्टामाइन स्टॉर्म और एंटीहिस्टामाइन की भूमिका विषय पर इंटरनेशनल मेडिकल जर्नल, डब्ल्यूएचओ ग्लोबल कॉन्फ्रेंस ऑन कोविड-19 थेरेप्यूटिक्स जिनेवा और यूरोपियन सोसाइटी ऑफ इंटेंसिव केयर मेडिसिन बर्लिन में धूम मचा चुका है। क्लिनिकल डेटा राशिद हॉस्पिटल दुबई, पल्मोनोलॉजी और आईसीयू विभाग से लिया गया है।
जब महामारी के संबंध में पूरी दुनिया एक क्रांतिकारी खोज की प्रतीक्षा कर रही थी। एसएआरएस -कोव-2 संक्रमण रोकने और कोविड रोगियों के उपचार में सुधार लाने वाली चिकित्सा पद्धतियों की पहचान करना वैश्विक स्तर पर सबसे जरूरी काम था। इस शोध में उन्होंने पहले लक्षणों से लेकर वेंटिलेटर तक पहुंचे गंभीर मरीजों तक, कोविड 19 का तंत्र समझा। उसके बाद उन्होंने एक संभावित प्रक्रिया की पहचान की जो अतिप्रतिरक्षित प्रणालीगत सूजन प्रतिक्रिया सिंड्रोम एसआईआरएस को जन्म देती है।
पोलैंड और दुबई के आईसीयू में 1000 मरीजों पर यह अध्ययन किया गया।
रिसर्च टीम में शामिल थे:
वे मरीज कौन थे: गंभीर कोविड-19 के वो मरीज मैकेनिकल वेंटिलेशन पर थे और जिनमें मल्टीपल ऑर्गन डिस्फंक्शन शुरू हो चुका था।
नतीजा: ग्रुप A में रिकवरी तेज थी, अंगों की खराबी कम थी, और मृत्यु दर भी कम थी।
आपने साइटोकिन स्टॉर्म का नाम सुना होगा। लेकिन ये हिस्टामाइन स्टॉर्म है।
स्टेप 1: मास्ट कोशिका क्या है?
हमारे शरीर में खासकर फेंफड़ों, नाक, त्वचा और पेट में मास्ट कोशिकाएं होती हैं। ये शरीर की पहली रक्षा पंक्ति हैं। इनके अंदर हिस्टामाइन के पैकेट भरे होते हैं।
स्टेप 2: ट्रिगर क्या करता है?
जब एसएआरएस-कोव-2 वायरस फेंफड़ों में जाता है तो ये मास्ट कोशिकाओं को "धोखा" देकर एक्टिव कर देता है। ऐसे में कोशिका फट जाती है और एक साथ हजारों हिस्टामाइन बाहर फेंक देती है। इसे ही हिस्टामाइन स्टॉर्म कहते हैं।
स्टेप 3: हिस्टामाइन क्या नुकसान करता है?
हिस्टामाइन शरीर में H1, H2, H3, H4 नाम के 4 तरह के रिसेप्टर से चिपकता है। और फिर शुरू होता है तांडव:
H1 खांसी, सांस की नली सिकुड़ना - ब्रोंकोस्पाज्म, एलर्जी और सिरदर्द।
H2 पेट में एसिड बढ़ना, बीपी गिरना व दिल की धड़कन तेज।
H3 दिमाग में थकान, चक्कर, न्यूरोलॉजिकल समस्या।
H4 सूजन बढ़ाना, इम्यून सिस्टम को और भड़काना।
नतीजा: फेंफड़ों में पानी भरना - एडिमा, खून गाढ़ा होकर क्लॉट बनना, ऑक्सीजन लेवल गिरना, बुखार, दस्त और आखिर में SIRS और सेप्सिस।
ये सबसे नया पॉइंट है। शोध में यह तथ्य सामने आया कि आईसीयू में वेंटिलेटर से दी जाने वाली हवा भी मरीज की समस्या बढ़ाती है।
अगर हिस्टामाइन ही दिक्कत है तो इलाज *एंटीहिस्टामाइन है।
नासा वैज्ञानिक विंची पावर नैप, ड्रीम्स स्पेस की इनोवेटर मैग्डेलेना फिल्सेक, दुबई में सीनियर पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. मयंक वत्स और पोलैंड की अन्ना स्करजिनियर्ज-प्लुटेका ऐसे स्टडी की। (कंटेंट: मेडिकल जर्नल्स, विजुअल डिजाइन: ChatGPT)
इस शोध की प्रासंगिकता सिर्फ कोविड तक सीमित नहीं है। ये रिसर्च थ्योरी 3 जगह काम आ सकती है:
रिसर्च डेटा: जिन मरीजों को एंटीहिस्टामाइन मिला, उनमें SIRS का स्कोर कम था, उन्हें आईसीयू में कम दिन लगे, और ऑर्गन फेल्योर 40% तक कम हुआ।
अगली वायरल महामारी: अगर कोई नया वायरस आए और SIRS करे, तो तुरंत एंटीहिस्टामाइन प्रोटोकॉल शुरू किया जा सकता है।
गंभीर बैक्टीरियल सेप्सिस: बैक्टीरिया भी मास्ट कोशिकाओं को एक्टिव करते हैं। वहां भी ये थ्योरी लागू होगी।
ICU प्रोटोकॉल: वेंटिलेटर चलाने का तरीका बदलना। हवा को गर्म और नम रखना।
मेडिकल रिसर्च टीम ने हिस्टामाइन के मरीजों को वेंटिलेटर पर रखने के प्रभावों का अध्ययन किया ।( कंटेंट: मेडिकल जर्नल्स, विजुअल डिजाइन: ChatGPT)
कोविड-19 ने हमें सिखाया कि वायरस सिर्फ फेंफड़े पर हमला नहीं करता। वो हमारे इम्यून सिस्टम को ही पागल कर देता है। अगर भविष्य में कोई महामारी आए, तो शायद डॉक्टर सबसे पहले मरीज को ऑक्सीजन के साथ एक एंटीहिस्टामाइन की गोली भी देंगे। और शायद हजारों लाखों जानें बच जाएंगी।
इस टीम की खोज बताती है कि एसएआरएस -कोव-2 फेफड़ों में मास्ट कोशिकाओं को ट्रिगर कर के हिस्टामाइन का तूफान छोड़ता है। यही हिस्टामाइन आगे साइटोकिन्स, TNFα, IL-1, IL-6 को एक्टिव करता है और कई अंगों में सूजन और क्षति लाता है। रिसर्च के मुताबिक हिस्टामाइन H1, H2, H3, H4 रिसेप्टर्स को प्रभावित करके "हिस्टामाइन इनटॉलरेंस HIT पैदा करता है। इसके लक्षण बिल्कुल कोविड के गंभीर लक्षणों जैसे हैं: सांस की तकलीफ, ब्रोंकोस्पाज्म, खांसी, ब्लड क्लॉट, कम ऑक्सीजन, तेज धड़कन, बीपी गिरना, बुखार, सिरदर्द, फेफड़ों, हार्ट, गुर्दे व लिवर में सूजन।
वेंटिलेटर से दी जाने वाली बहुत ठंडी, सूखी या हाई प्रेशर वाली हवा भी मास्ट कोशिकाओं को एक्टिव कर के फिर से हिस्टामाइन छोड़ती है।
जिन गंभीर कोविड मरीजों को शुरुआत में ही नियमित और सही खुराक में एंटीहिस्टामाइन दिया गया, उनकी बेहतर रिकवरी हुई और शरीर अंगों की शिथिलता भी कम हो गई। उनका शोध कहता है कि इस तंत्र की खोज से लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है।
रिसर्च टीम में शामिल दुबई में सेवाएं दे रहे पल्मोनोलॉजिस्ट जयपुर मूल के प्रोफेसर डॉ. मयंक वत्स। (फोटो डिजाइन:पत्रिका)
हमने 1000 से ज़्यादा मरीज़ों पर एंटी हिस्टामाइन का ट्रायल किया, जिसके नतीजे शानदार रहे और मरीज़ बहुत अच्छी तरह ठीक हुए। ये एंटीहिस्टामाइन दवाएं भारत में एंटी-एलर्जिक और एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाओं के तौर पर आसानी से उपलब्ध हैं और किसी भी फ़ार्मेसी से खरीदी जा सकती हैं। समय की कमी के कारण हमारी टीम को भारत सरकार से संपर्क करने का समय और मौका नहीं मिल पाया।
हम और भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के ज़िम्मेदार अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश करेंगे ताकि बीमार मरीज़ों के इलाज में इस दवा को शामिल किया जा सके। खास बात यह है कि 10 दिन के इलाज के लिए दवा की अनुमानित लागत लगभग 20 से 30 रुपये होगी। गरीब मरीज़ इसे सरकारी फ़ार्मेसी और अस्पताल से मुफ़्त में ले सकते हैं।
-प्रोफ़ेसर डॉ. मयंक वत्स, इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजिस्ट और क्रिटिकल केयर मेडिसिन, दुबई व पोलैंड।
(डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट केवल प्रमाणित मेडिकल रिसर्च और संबंधित डॉक्टरों के वक्तव्यों पर आधारित है। इसे किसी भी प्रकार की स्व-चिकित्सा (Self-Medication) का आधार न बनाएं। कोई भी दवा लेने से पहले रजिस्टर्ड चिकित्सक की पर्ची और सलाह अनिवार्य है।)