बेटा जब अपने मां-बाप से कहता है, अगर अब पानी नहीं मिला तो मेरा दम निकल जाएगा, गला सूख रहा है, अपने कलेजे के टुकड़े को तपड़ते देख मां की ममता इस कदर व्याकुल हो उठी कि लाडले की प्यास बुझाने के लिए जंगल की ओर चली पड़ी, एक किमी. दूर मिले तालाब से एक लोटा पानी लाई और उसे उबालने के बाद अपने बेटे की प्यास शांत की।
यह कोई काल्पनिक नहीं बल्कि महासमुंद विकासखंड के ग्राम पंचायत लोहारडीह के आश्रित आदिवासी बाहुल्य गांव घोंघीबाहरा की एक हकीकत दास्तां हैं। जहां चम्पा बाई ने अपने बेटे की प्यास बुझाने के लिए जंगल में निकल पड़ी थी और पानी लाने के बाद उसने गांव वासियों को तालाब का ठिकाना बताया।
चम्पा बाई के जलस्रोत की खोज से ग्रामीणों में खुशी की लहर दौड़ गई। लेकिन एक किमी. दूर तालाब से पानी लाना, सबसे बड़ी दुश्वारी थी, क्योंकि वहां जंगली जानवरों की भी आमद रहती है। इसके बाद भी कुछ लोगों ने तालाब से पानी लाने के लिए गांव बैठक बुलाई, जहां निर्णय हुआ कि बैलगाड़ी से सामूहिक रूप से पानी लाया जाएगा। इसके बाद कुछ शुल्क चुकाने के बाद लोग बराबर-बराबर हिस्से में पानी बांट लेंगे। इस काम की जिम्मेदारी पानी की खोज करने वाली चम्पाबाई, लेनदास और ठाकुर राम को सौंपी गई।
इसके बाद बैलगाड़ी पर हर रोज सुबह वे तीनों जंगल के तालाब की ओर निकल जाते हैं और पानी लाकर लोगों में बांट देते हैं। बैलगाड़ी से वह सुबह व शाम करीब तीन चक्कर लगाते हैं, क्योंकि गांव में यही एक मात्र साधन है, जो एक बार में पानी की जरूरत को पूरा नहीं कर पाता है। उन्होंने बताया कि तालाब का पानी कीचडय़ुक्त हो गया है, फिर भी क्या करें मजबूरी है। पानी को छानने के बाद इसे उबालते हैं, इसके बाद इसे पीने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
1400 आबादी वाले गांव में एक भी बोर इस समय चालू हालत में नहीं है, जिससे गांव के लोगों को पानी के लिए कई किमी तक चक्कर लगाना पड़ता है। इसके लिए कई बार लोगों ने जिला पंचायत और पीएचई विभाग से बोर कराने के लिए गुहार लगाई थी लेकिन नतीजा सिफर रहा। गांव के आसपास के नाली-नाले सूख गए हैं। लेकिन इधर, कोडार से पानी छोडऩे से गांव के लोगों को राहत मिली है।
ग्राम लोहारडीह के सरपंच सुमृती भारती ने कहा कि गांव में शीघ्र ही बोर करवाया जाएगा, इसके लिए जनपद पंचायत के जरिए पीएचई विभाग को पत्र भेजा गया है, यहां सभी बोर फेल हो गए हैं।