
Mahasamund Medical College: महासमुंद मेडिकल कॉलेज में इस वर्ष 125 नए मेडिकल छात्रों का दाखिला तो तय हो गया, लेकिन कॉलेज की असली परीक्षा अब शुरू होगी। नेशनल मेडिकल कमिशन (एनएमसी) ने नए शैक्षणिक सत्र के लिए मेडिकल कॉलेज को मान्यता तो दे दी है, लेकिन साथ ही 45 दिनों की सख्त समय-सीमा तय करते हुए फेकल्टी, अस्पताल की चिकित्सा सुविधाओं और अधोसंरचना में व्यापक सुधार के निर्देश दिए हैं।
स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि निर्धारित अवधि में कमियां दूर नहीं होने पर एनएमसी एक्ट-2019 की धारा 26(ए), 26(सी) और 26(एफ) के तहत कार्रवाई की जा सकती है। यानी प्रवेश की मंजूरी के साथ कॉलेज को सुधार का अंतिम अवसर भी मिला है।
यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मेडिकल कॉलेज लंबे समय से शिक्षकों की भारी कमी, अधूरे निर्माण कार्य, सीमित चिकित्सा संसाधनों और छात्रावास जैसी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहा है। एनएमसी के निरीक्षण में इन्हीं कमियों को गंभीरता से दर्ज किया गया। इसके बावजूद विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित न हो, इसलिए इस बार प्रवेश की अनुमति दी गई, लेकिन सुधार की जवाबदेही भी तय कर दी गई।
कॉलेज में सबसे बड़ी समस्या फैकल्टी की है। कई विभाग नियमित शिक्षकों के बिना संचालित हो रहे हैं। अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों और आवश्यक संसाधनों की कमी का असर न केवल मरीजों के इलाज पर पड़ रहा है, बल्कि मेडिकल विद्यार्थियों की क्लीनिकल और प्रायोगिक पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है।
महासमुंद मेडिकल कॉलेज (Mahasamund Medical College) की सबसे गंभीर समस्या शिक्षकों की कमी है। प्राध्यापक के 24 स्वीकृत पदों में केवल 7 कार्यरत हैं, जबकि 17 पद खाली हैं। सह-प्राध्यापक के 33 पदों में 13, सहायक प्राध्यापक के 46 में 26, सीनियर रेजिडेंट के 44 में 25 तथा प्रदर्शक के 26 में 8 पद रिक्त हैं। कुल मिलाकर दर्जनों पद वर्षों से खाली पड़े हैं। इसका सीधा असर मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। कई विभाग सीमित शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं। एक ही शिक्षक को पढ़ाई, अस्पताल की ड्यूटी, शोध कार्य और प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभानी पड़ रही हैं। अब 125 नए विद्यार्थियों के जुडऩे के बाद यह दबाव और बढ़ेगा।
कॉलेज प्रबंधन ने रिक्त पदों पर भर्ती और संसाधनों के विस्तार के लिए कई बार शासन को प्रस्ताव भेजे हैं, लेकिन अब तक नियुक्तियों पर निर्णय नहीं हो पाया है। अधोसंरचना की स्थिति भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। दिसंबर 2025 तक पूरा होने का लक्ष्य रखने वाला मेडिकल कॉलेज विस्तार कार्य अब तक अधूरा है। नए छात्रावास का निर्माण लगभग पूरा होने के बावजूद बिजली उपकेंद्र शुरू नहीं होने से उसका संचालन अटका हुआ है।
नए सत्र में 125 विद्यार्थियों के आने के बाद आवास और अन्य सुविधाओं पर दबाव और बढ़ने की आशंका है। इस बार एनएमसी ने कॉलेज का ऑनलाइन मूल्यांकन किया। रिपोर्ट में कई कमियों का उल्लेख करते हुए सुधार की समयसीमा तय की गई है। अब कॉलेज प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अगले डेढ़ महीने में कागजों से निकलकर जमीन पर बदलाव दिखाई दे। मेडिकल कॉलेज के प्रो. अलख राम वर्मा ने बताया कि नए शैक्षणिक सत्र के लिए कॉलेज को मान्यता मिल गई है। उन्होंने कहा कि फैकल्टी भर्ती और अधोसंरचना का विकास शासन स्तर का विषय है। इस संबंध में शासन को आवश्यक प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं।
नए मेडिकल छात्रों के लिए सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्या छात्रावास है। मेडिकल कॉलेज परिसर में हॉस्टल तैयार है, लेकिन बिजली उपकेंद्र शुरू नहीं होने के कारण उसे अब तक उपयोग में नहीं लाया जा सका है। दूसरी ओर शहर में विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त किराये के मकान उपलब्ध नहीं हैं। अधिकांश सरकारी भवन पहले से उपयोग में हैं। यदि नए सत्र से पहले बिजली व्यवस्था शुरू नहीं हुई तो बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को निजी आवास ढूंढना पड़ेगा।
एनएमसी हर वर्ष मेडिकल कॉलेजों का निरीक्षण कर कमियां दूर करने के सुझाव देती है, लेकिन महासमुंद मेडिकल कॉलेज में कई मूलभूत समस्याएं वर्षों से बनी हुई हैं। विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी, सीमित उपकरण, अधूरा अधोसंरचना विकास और अस्पताल में संसाधनों की कमी का असर मरीजों और मेडिकल छात्रों दोनों पर पड़ रहा है। मेडिकल शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा क्लीनिकल प्रशिक्षण होता है। पर्याप्त मरीज, आधुनिक सुविधाएं नहीं मिलने से शिक्षा प्रभावित होती है।