
Aparna Prateek Yadav Family Secret Deal: समाजवादी पार्टी के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे प्रतीक यादव के इंस्टाग्राम अकाउंट से किए गए एक पोस्ट ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में खलबली मचा दी है। पोस्ट में प्रतीक ने अपनी पत्नी और भाजपा नेत्री अपर्णा यादव पर गंभीर आरोप लगाते हुए रिश्ते तोड़ने की बात कही। इस सार्वजनिक बयान के बाद न सिर्फ राजनीतिक गलियारों में बल्कि यादव परिवार के भीतर भी पुराने सवाल और समझौते एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं।
सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अपर्णा यादव ने 19 जनवरी 2022 को भाजपा की सदस्यता ली थी और ठीक तीन साल बाद, उसी तारीख को प्रतीक यादव ने अलगाव का ऐलान किया। सियासी हलकों में इसे संयोग से ज्यादा रणनीति माना जा रहा है। इस घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह महज व्यक्तिगत निर्णय है या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक गणना भी छिपी है।
यादव परिवार में मतभेदों की कहानी तब तेज हुई जब मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना यादव की एंट्री हुई। वरिष्ठ पत्रकारों के मुताबिक, इसी दौर में अखिलेश यादव और मुलायम सिंह के रिश्तों में तनाव बढ़ा। अखिलेश की नाराजगी और परिवार के भीतर सत्ता के संतुलन को लेकर उठे सवालों ने सपा के अंदर भी हलचल पैदा कर दी थी।
इस पारिवारिक और राजनीतिक खींचतान को थामने की जिम्मेदारी उस वक्त अमर सिंह ने उठाई। उन्होंने साधना यादव को परिवार में स्वीकार कराने के साथ-साथ अखिलेश यादव को मनाने में भी अहम भूमिका निभाई। इसी दौरान एक ऐसा समझौता हुआ जिसने यादव परिवार की सियासत और निजी जीवन दोनों की दिशा तय कर दी।
बताया जाता है कि इस समझौते के तहत अखिलेश यादव को मुलायम सिंह की राजनीतिक विरासत का वारिस माना गया, जबकि साधना यादव के बेटे प्रतीक यादव को राजनीति से दूर रहने का वादा करना पड़ा। इसके अलावा, उस समय की संपत्तियों को दोनों भाइयों में बराबर बांटने की बात भी तय हुई। पार्टी से जुड़े करीबी सूत्रों का दावा है कि साधना यादव के परिवार के खर्चों की जिम्मेदारी भी पार्टी के स्तर पर ली गई थी।
अपर्णा यादव शुरू से ही सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका चाहती थीं। परिवार के भीतर उनकी तुलना अक्सर डिंपल यादव से की जाती रही, जिन्हें पार्टी में एक मजबूत और सम्मानित स्थान हासिल है। अपर्णा भी उसी तरह सियासी पहचान और अधिकार चाहती थीं, जिससे परिवार और पार्टी के भीतर उनके इरादों को लेकर मतभेद बढ़ते गए।
अपर्णा की जिद पर मुलायम सिंह यादव ने 2017 में उन्हें पार्टी का टिकट दिलवाया, लेकिन वह चुनाव हार गईं। इसके बाद अपर्णा ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव नहीं चाहते थे कि वह जीतें, जबकि अखिलेश ने खुद उनके लिए प्रचार किया था। यह विवाद परिवार के भीतर राजनीतिक खाई को और गहरा कर गया।
2022 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने स्पष्ट कर दिया कि अपर्णा को न तो टिकट दिया जाएगा और न ही उनके फैसलों में कोई दखल होगा। इस निर्णय को अपर्णा ने अपने राजनीतिक भविष्य के लिए झटका माना। इसके बाद उनके भाजपा के संपर्क में आने और पार्टी में शामिल होने की चर्चाएं तेज हो गईं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2014 के बाद से ही अपर्णा यादव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तारीफ करती रही थीं। योगी सरकार बनने के बाद उनकी कई मुलाकातें भी चर्चा में रहीं। उनके कुछ बयानों ने सपा नेतृत्व को असहज किया, जिससे यह संकेत मिला कि वह पहले से ही नए सियासी मंच की तैयारी कर रही थीं।
अपर्णा और प्रतीक की शादी 2011 में हुई थी और यह एक प्रेम विवाह था। दोनों की मुलाकात स्कूल के दिनों में हुई और बाद में उन्होंने इंग्लैंड में साथ पढ़ाई की। अपर्णा की रुचि संगीत में भी रही है और उनका एक म्यूजिकल एल्बम सैफई महोत्सव में खुद मुलायम सिंह यादव ने जारी किया था, जिससे उनकी पहचान एक सांस्कृतिक चेहरे के रूप में भी बनी।
प्रतीक यादव ने हमेशा राजनीति से दूरी बनाए रखी और खुद को बिजनेस और फिटनेस से जुड़े कामों तक सीमित रखा। लखनऊ में उनका प्रीमियम जिम और वेलनेस से जुड़ा कारोबार उनकी अलग पहचान बनाता है। यह भी कहा जा रहा है कि वह अब तक उस पुराने समझौते पर कायम हैं, जिसमें उन्हें सियासत से दूर रहने की शर्त दी गई थी।