
Raksha Bandhan Brother-Sister Emotional Story: रक्षाबंधन केवल भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने का पर्व नहीं, बल्कि उस रिश्ते की याद दिलाने वाला दिन है, जिसमें भाई-बहन एक-दूसरे के सुख-दुख में जीवनभर साथ खड़े रहने का संकल्प लेते हैं। इसी रिश्ते की एक भावुक और मानवीय मिसाल मंडला जिले में देखने मिलती है, जहां 64 वर्षीय मुकेश वर्मा अपनी 50 वर्षीय दिव्यांग बहन अंजली को आज भी उसी तरह सहेजकर रखते हैं, जैसे वह बचपन में आठ साल की थी।
आर्थिक परेशानियों के बावजूद दोनों भाई-बहन के बीच का यह प्रेम शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है।मुकेश ने विवाह नहीं किया। माता पिता के निधन के बाद पिछले 16 वर्षों से वह अपनी छोटी बहन अंजली के साथ ही रह रहे हैं। अंजली दिव्यांग हैं और उनके लिए रोजमर्रा के कई काम आसान नहीं हैं। ऐसे में मुकेश ने भाई होने की जिम्मेदारी को केवल एक रिश्ते तक सीमित नहीं रखा, बल्कि बहन की जिंदगी का सहारा बन गए है।
मुकेश अपनी बहन की देखभाल के साथ घर की पूरी जिम्मेदारी भी संभालते हैं। महाराजपुर के ज्वाला जी वार्ड में किराये के मकान में रह रहे हैं। भोजन बनाने से लेकर बहन को खिलाने, बर्तन धोने, कपड़े धोने और घर की साफ-सफाई तक का काम वह खुद करते हैं। बहन की जरूरतों का ध्यान रखना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। मुकेश के लिए अंजली आज 50 साल की महिला नहीं, बल्कि वही छोटी बहन है जिसे उन्होंने बचपन से अपनी आंखों के सामने बड़ा होते देखा है। यही वजह है कि उम्र बढ़ने के बाद भी उनके व्यवहार में बहन के प्रति वही स्नेह और सुरक्षा की भावना दिखाई देती है, जो बचपन में थी। मुकेश एमकॉम तक की पढ़ाई की है।
पहले सहकारी बैंक में सुपरवाइजर के पद पर काम कर चुके हैं। नौकरी के दौरान स्वास्थ्य संबंधी परेशानी बढ़ने के कारण उनका काम प्रभावित हुआ और संस्था ने उन्हें नौकरी से अलग कर दिया। समय से पहले नौकरी छूटने के कारण उन्हें पेंशन का लाभ नहीं मिल सका। नौकरी छूटने के बाद आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती चली गई। इसके बावजूद मुकेश ने बहन का साथ नहीं छोड़ा। आज दोनों भाई-बहन किराये के मकान में रहते है और सीमित संसाधनों में अपना जीवन चला रहे हैं।
अंजली को सामाजिक सुरक्षा पेंशन के रूप में 16 हजार रुपए प्रतिमाह मिलते है। यह राशि उनके दिव्यांग पिता को मिलने वाली पेंशन का 30 प्रतिशत है। यह राश भी कुछ वर्ष पूर्व ही है। इसी सीमित राशि और मुकेश की व्यवस्था के सहारे दोनों भाई-बहन अपना जीवन यापन कर रहे हैं। मुकेश का एक और छोटा भाई राजेश वर्मा भी है, जो अपने परिवार के साथ दूसरे शहर में रहता है। पिता शिक्षा विभाग में थे माता-पिता के निधन के बाद दिव्यांग बहन को पिता की पेंशन दिलाने के लिए छोटे भाई राजेश वर्मा को काफी दौडधूप करनी पड़ी। पेंशन शुरू होने से काफी राहत मिली है। रक्षाबंधन पर जब बहनें भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है, तब मुकेश और अंजली का रिश्ता इस पर्व का एक अलग ही अर्थ सामने रखता है। यहां रक्षा का वादा केवल एक दिन की रस्म नहीं, बल्कि 16 वर्षों से निभाया जा रहा जीवनभर का साथ है। मुकेश ने अपनी बहन के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है और आर्थिक कठिनाइयों के बीच भी उसके चेहरे पर खुशी बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
माहिष्मति घाट पर आयोजित होने वाली मां नर्मदा जी की महाआरती दोनों भाई-बहन के जीवन का खास हिस्सा बन चुकी है। मुकेश अपनी बहन को साइकिल पर बैठाकर प्रतिदिन घाट तक ले जाते हैं। बहन को मां नर्मदा की महाआरती के दर्शन कराने के बाद वापस घर लेकर आते हैं। उम्र और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद भाई का यह सिलसिला लगातार जारी है। महाआरती के बाद दोनों घाट पर संचालित निशुल्क भोजन व्यवस्था माई की रसोई में भोजन करते हैं। मुकेश बताते हैं कि बहन के साथ रहने में उन्हें कभी बोझ महसूस नहीं हुआ। बहन की जरूरतों को पूरा करना उनके लिए जिम्मेदारी से ज्यादा अपनापन है।