
Share Market Fall Reason: भारतीय शेयर बाजार आज मंगलवार को भारी गिरावट के साथ बंद हुआ है। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक सेंसेक्स आज 0.72 फीसदी या 561 अंक की गिरावट के साथ 77,054 पर बंद हुआ है। वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 0.66 फीसदी या 158 अंक की गिरावट के साथ 24,052 पर बंद हुआ है। सबसे अधिक गिरावट रियल एस्टेट, सरकारी बैंक, ऑटो, आईटी और फाइनेंशियल शेयरों में दर्ज हुई है। इससे पहले पिछले तीन कारोबारी सत्रों में बाजार में बढ़त दर्ज हुई थी। आज निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 0.44 फीसदी और स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 1 फीसदी गिरकर बंद हुई है।
इस समय बाजार के लिए सबसे बड़ी चिंता मिडिल ईस्ट की स्थिति है। अमेरिका और ईरान के बीच टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने लगातार तीसरी रात ईरान पर हमले किए हैं। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े ईरानी व्यापार पर नई रोक लगाने का ऐलान किया है। वहीं, हूती विद्रोहियों ने भी सऊदी अरब पर मिसाइलें दागी हैं। ऐसे हालात से दुनिया भर के निवेशक जोखिम लेने से बच रहे हैं।
भूराजनीतिक तनाव का सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिख रहा है। ब्रेंट क्रूड दोपहर 2 बजकर 45 मिनट पर 4.84 फीसदी चढ़कर 87.28 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड करता दिखा। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 से 90 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ता है, महंगाई पर दबाव आता है और सरकार की वित्तीय स्थिति पर भी असर पड़ता है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, अगर ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 84-85 डॉलर के आसपास बना रहता है तो भारत के भुगतान संतुलन और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। इससे बाजार में निवेशकों का सेंटीमेंट डाउन है।
जून में भारत की खुदरा महंगाई बढ़कर 4.38 फीसदी पर पहुंच गई। यह जनवरी 2025 के बाद पहली बार है, जब महंगाई आरबीआई के 4 फीसदी के लक्ष्य से ऊपर निकली है। पेट्रोल-डीजल और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी इसकी प्रमुख वजह रही। बाजार को डर है कि अगर महंगाई लगातार ऊंची रहती है तो आगे चलकर ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख अपनाया जा सकता है। महंगाई फिलहाल आरबीआई की 2 से 6 फीसदी की तय सीमा के भीतर है। हालांकि, मौसम और अल नीनो जैसे जोखिमों पर नजर रखना जरूरी होगा।
महंगाई के साथ-साथ भारत का व्यापार घाटा भी चिंता बढ़ा रहा है। जून में देश का व्यापार घाटा बढ़कर 30.43 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो पिछले पांच महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। आईसीआरए की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर के मुताबिक, ऊंची कमोडिटी कीमतों के कारण आयात बिल तेजी से बढ़ा। हालांकि, निर्यात में भी बढ़ोतरी हुई, लेकिन उसकी रफ्तार आयात से कम रही। उन्होंने कहा कि मिडिल ईस्ट की स्थिति और कच्चे तेल की कीमतों पर नजर रखना जरूरी है। वित्त वर्ष 2027 में चालू खाते का घाटा जीडीपी के कम से कम 1 फीसदी तक पहुंच सकता है।
उधर, शुरुआती कारोबार में रुपया भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 42 पैसे टूटकर 96.10 पर पहुंच गया। अगर रुपये पर दबाव बढ़ता है तो विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी तेज हो सकती है। अमेरिकी 10 ईयर बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी भी विदेशी निवेश प्रवाह के लिए चुनौती बन सकती है।
अब बाजार की अगली दिशा काफी हद तक कंपनियों के अप्रैल-जून तिमाही नतीजों पर निर्भर करेगी। निवेशक सिर्फ मुनाफे के आंकड़े नहीं, बल्कि कंपनियों के भविष्य को लेकर दिए जाने वाले संकेतों पर भी नजर रखेंगे। एक्सपर्ट्स का मानना है कि मिडिल ईस्ट संकट और महंगे कच्चे तेल की वजह से कंपनियों की कमाई पर दबाव बढ़ सकता है। कुछ जानकारों का अनुमान है कि कॉरपोरेट आय में मजबूत सुधार वित्त वर्ष 2027 की तीसरी तिमाही से पहले देखने को नहीं मिलेगा।